वेलाश का टर्टल फेस्टिवल

Tripoto
29th Dec 2017
Photo of वेलाश का टर्टल फेस्टिवल by Hari Shankar Sharma

कोंकण तट महाराष्ट्र पर ईयर एन्ड

वेलाश , केलशी

दिसंबर का महीना था तारीख रही होगी 29 दिसंबर 2017 . मित्रों ने तय किया नया साल समुद्र किनारे मनाया जाए। विकल्पों पर विचार हुआ । फिर निर्णय हुआ कि महाराष्ट्र के कोंकण तट पर जाया जाए । एक मित्र उसी इलाके के रहने वाले थे । उन से चर्चा की और निर्णय हुआ कि कोंकण तट पर बसे हुए श्रीवर्धन चलें । वँहा जाने का एक आकर्षण यह भी था कि श्रीवर्धन के निकट ही एक ऐसा गांव था जहां पर हर साल टर्टल उत्सव मनाया जाता है । वेलाश नामक इस गांव में प्रवासी कछुए अपने अंडे रेत में छुपा कर चले जाते हैं और समय आने पर अंडों से बच्चे निकल कर एक साथ हजारों की संख्या में समुद्र की ओर भागते हैं । बस यही देखने लोग कोंकण के सुदूर तट के छोटे से गांव में एकत्रित होते हैं । यहां की पंचायत ने धीरे-धीरे इस फेस्टिवल को वर्ल्ड वाइड फैला दिया है यू टूब पर काफी सामग्री मिल जाती है । छोटे से गांव में देश विदेश के पर्यटकों को देखकर आप आश्चर्य में पड़ जाएंगे । लोग परवाह नही करते कि यहां पर कोई विशेष सुविधा है या नहीं । न हो तो भी लोग यहां आने के लिए उतने ही तैयार रहते हैं जितने की कि बड़े हिल स्टेशन पर जाने के लिए .

संयोग से चंद्रमोहन जी उस समय वेलाश में ही प्रवास कर रहे थे । इस कारण से अंततः कोंकण जाना हुआ । मित्र जिनमें श्री अनिल , श्री मनोहर व श्री सत्येंद्र् शामिल थे 30 दिसंबर की रात में इंदौर से निजी वाहन लेकर निकल पड़े । मैं यहां कहूं कि मुझे ज्यादा शौक नहीं है तो शायद आत्म प्रशंसा होगी किंतु यह था कि बाकी तीनों को खा-पी कर के लम्बी तान के सोना था सो आगे की सीट हमेशा की तरह मुझे ऑफर हुई . सच रात भर मुंबई पहुंचने तक वाहन चालक के साथ रतजगा किया. बीच-बीच में कई बार खुद चाय पी ड्राइवर को पिलाई. जैसे तैसे सुबह 6:00 बजे कल्याण पहुंचे . कल्याण से श्रीवर्धन जाने के लिए पनवेल वाला रास्ता पकड़ना था . इस हिसाब से पूरे मुंबई को क्रॉस करके दूसरे किनारे जाना था . बिना गूगल बाबा की मेहरबानी के महानगर को पार करना कठिन था . मोबाइल की बैटरी बैठ रही थी फिर भी जैसे तैसे मुंबई के बाहर निकले . सुबह उठकर वडापाव का नाश्ता किया और पनवेल से होकर कोकण का रास्ता पकड़ लिया. रात भर की थकान, जागरण था और रास्ता निर्माणाधीन था , कुछ कठिन सा लग रहा था . जैसे तैसे दोपहर 2:00 बजे तक श्रीवर्धन पहुंचे . पता लगा आराम नहीं करना है खाना खाकर रात में वेलाश पहुंचना है . इसी बीच चंद्र मोहन जी ने अपनी मौसी के घर ले जाकर श्रीवर्धन में कोंकणी लंच करवाया और निकल पड़े . रास्ते में बताया कि वेलाश के लिए 25 किलोमीटर का रास्ता तय करके स्ट्रीमर लेना है और दूसरे किनारे जाकर भी 15 किलोमीटर चलना है , तब जाकर वेलाश पहुंचेंगे . पहाड़ी रास्ते में वाहन की गति कमी होती है पहुंचते-पहुंचते रात हो गई . दिसंबर का महीना था रात उतर आई थी . थकान के मारे लग रहा था कैसे जल्दी बिस्तर पर पहुंचे और नींद लगे लेकिन नींद अभी और दूर थी जितना दूर वेलास था . एक बात थी दिसम्बर में जितनी ठण्ड उत्तर में होती है उतनी तटीय क्षेत्रो में नही होती है हमारे ठण्ड के कपडे भार लग रहे थे . रात करीब 8:00 बजे वेलाश पहुंचे .जहां चंद्र मोहन जी ने हमारे रुकने की व्यवस्था की थी वह परंपरागत घर था और पता लगा कि उस घर में केवल पुरुषों का राज है खाना हमें ही बनाना था . दुबले और दो आषाढ़ , ठीक है सफर में यह सब चीजें चलती ही है . सभी मित्रों ने मिलकर फटाफट खाना बनाया खाया और सो गए.

भोर में नींद खुली घर के बाहर निकले तो देखा आकृतप्रकृति का खजाना सामने है .घर के सामने नारियल के पेड़ , सुपारी के पेड़ , तरह-तरह की क्यारियों में नर्सरी के लिए उगाये जा रहा है विभिन्न पौधे और कुछ कुछ धान के खेत नजर आ रहे हैं . जहां ठहरे थे वह घर पहाड़ काट कर बनाया घर था . यंहा घर एक ही तरह के बनाए जाते हैं बाहर दालान होता है अंदर एक दो कमरे और पीछे शौचालय की व्यवस्था .चंद्र मोहन जी के तीन भतीजे वेलाश में ही रहते हैं और तीनों घर आए मेहमानों की सेवा में ह्रदय से जुड़ गए . सुबह-सुबह घर से नीचे उतरे , चार कदम की दूरी पर ही नारियल के पेड़ झूम रहे थे . सीजन भी था दुबला पतला भंतिया तीर की तरह नारियल के पेड़ पर चढ़ गया . हंसिये काट कर 10 नारियल गिरा दिए . चारों मित्रों ने ताजा नारियल के पानी का स्वाद चखा जो हमारे यहां मिलने वाले नारियल से कुछ हटकर था .

कृषि प्रेमी मित्र नारियल और सुपारी से प्रतिवर्ष होने वाली आमदनी और उससे घर कैसे चलाया जाता है इसकी मेट्रिक्स समझने में लग गए . मन में तो मेरे भी आया कि थोड़ी सी जमीन लट्ठा दो लट्ठा , हमारे इधर चलता है आधा पौन बीघा जमीन और चार लोगों का परिवार . थोड़ी सी सुपारी थोड़ी थोड़े से नारियल और कुछ हापुस आम के पेड़ , कैसे घर चलता है. क्या आमदनी होती है ? इस प्रश्न का जो उत्तर बन्तिया ने दिया उसी से समझ गए की क्या स्थिति है .उसने बताया नारियल और सुपारी साल में कुछ हजार कह देते हैं हापुस आम के खरीदार मुंबई से आकर ₹10 किलो में ही पेड़ पर लगे आमो का सौदा कर के चले जाते हैं . तीन भाइयों का संयुक्त परिवार जिसमें से किसी का भी विवाह नहीं हुआ था . मां थी पर घर चलाने के लिए मुंबई जाकर काम कर रही थी . कल्पना करिए तीन जवान बेटे तो कुछ हाथ से खाना बनाते हैं और वह यदि बड़े शहरों में जाकर काम करना पड़ता है तो समझा जा सकता है आमदनी कितनी होती है. बंटीया का छोटा भाई कुछ पढ़ा लिखा था ट्रैक्टर चलाना सीख गया था कुछ पैसा कमा लेता था .पुणे के एक प्रोफ़ेसर साहब ने वेलाश के निकट कुछ जमीन खरीदी थी .जमीन का समतलीकरण कर उसको खेती योग्य बनाने के लिए उन्होंने बंटीया के भाई को अनुबंधित कर लिया था . कुछ रुपए आने की उम्मीद थी सो परिवार के तीनो भाई खुश थे.

पहले दिन के सफर की थकान अभी बकाया थी . लेकिन हम यहां आए तो घूमने ही थे . सुबह नाश्ता करके आसपास का समुद्री किनारा यहां के लोगों के , वहां हापुस आम के बगीचे , खेती के तरीके देखने के लिए ह निकल पड़े . रास्ते में बंटीया के भाई जहां पर काम करके खेती का समतलीकरण कर रहे थे वह भी देखा और पहाड़ चढ़कर नीचे उतरकर समुद्र तट पर पहुंच गए . यहां हमारे लिए एक छोटी नाव तैयार थी . हम अपने साथ गैस स्टोव , खाने पीने का सामान वगैरह लेकर आए थे . सब्जी स्थानीय स्तर से लेकर के गए थे . सोचा था जंगल में भोजन बनाकर खाया जाए . श्रीवर्धन से वेलाश और आसपास के कई गांव जिनमें कैल्शी गांव भी शामिल है को कनेक्ट करने के लिए अभी तक ब्रिज नहीं बना है . ब्रिज बनाने का प्रयास हुआ है और वह आधा अधूरा सामने नजर आता है . श्रीवर्धन में बहुत अच्छा बीच है समुंदर की लहरे यंहा अठखेलियाँ करती है .लेकिन दूसरे किनारे पर वेलाश और अन्य गांवों में समुद्र का सीधा सपाट किनारा है . पार करके दूसरी ओर जाने पर ही रेत मिलती है .

हम लोग सपाट किनारे से छोटी सी नाव द्वारा रेतीले तट की ओर पहुंचे . यहां पर रेत का विस्तार विशाल था . जमीन तक पहुंचने में वजन उठाकर मित्रों की जान निकल गई . कभी घर में छोटी सी लकड़ी भी नहीं उठाने वाले ठाकुर साहब सिर पर छोटा गैस सिलेंडर उठा रहे थे . लकड़ी का मोल भाव कर रहे थे रेती में एक स्थानीय महिला से लकड़ी मोलभाव करके खरीदी गई और निकल पड़े खेत की ओर . वेलाश गांव के ही एक परिचित मित्र के खेत पर पहुंचे . समुद्र किनारे मीठे पानी का कुआं था जहां पर नारियल के पेड़ और स्थानीय तुर की खेती लगी थी . समुद्र किनारे खाना बनाने का उपक्रम किया .

हमारे सामिष मित्र आधे अधूरे मन से आलू मटर की सब्जी और बाटी सेकने में लग गए . अब कोई दरबार आलू की सब्जी बनाएं तो उसमें आधा किलो तेल , 100 ग्राम लहसुन, 50 ग्राम जावित्री पढ़ना तो लाजमी है . उसके साथ शर्त यह भी खाते-खाते पच्चीस बार सब्जी की तारीफ भी करना है . बड़ी मुसीबत थी . शायद इसी कारण सोनी साहब आधी मटर छीलते वक्त ही खा गए . हम लोगों के हिस्से में जावित्री और शेष मटर आई . खाना पीना हुआ कुछ लोगों ने पीने पर जोर दिया . मन में केल्शी गांव देखने की इच्छा थी . फिर कब आएंगे यह सोचकर गाड़ी हमने दूसरी दिशा में मोड़ दी . जिस गांव को हम बिल्कुल दो हाथ पास महसूस कर रहे थे वंहा सड़क मार्ग से कोई 40 किलोमीटर ऊंचे नीचे रास्ते से होकर पहुंचा जाएगा इसकी कल्पना नहीं थी . शाम 4 बजे निकले 6:30 बजे उस गांव में पहुंचे .

मुंबई के सुदूर तट पर स्थित गांव कैसे होंगे इसकी कल्पना आप उत्तर भारत में बैठकर नहीं कर सकते . श्रीवर्धन और यहां की दूरी लगभग 100 किलोमीटर होगी . सारा किराना, सब्जी और अन्य आवश्यक वस्तुएं संकरे रास्ते से छोटे-छोटे लोडिंग वाहनों से भरकर यहां पहुंचती है. चाय की दुकान भी मुश्किल से मिली नाश्ते के नाम पर वडापाव के अलावा नजर नहीं आया . गांव में 1 2 मिष्ठान की दुकान दिखी . केल्शी में समुंदर का बीच बहुत अच्छा है और पास में गणेश जी का मंदिर भी है . हम सब लोग मंदिर प्नुच गए . मंदिर में कथा चल रही थी , लोगों ने बताया मुंबई से यहां पर पार्टी आई है जो परंपरागत गणपति वंदना एवं भगवत कथा करती है . पुराने समय की हारमोनियम पेटी जिसकी धमन पांव से चलती है देखने को मिली . हारमोनियम पर भजन गाते परंपरागत महाराष्ट्रीयन सफेद टोपी लगाए मुख्य पंडित और गायक मण्डली गांव के लोग भक्ति भाव से भजन करते नजर आएं . गणेश जी के अद्भुत दर्शन हुए . मराठी में भक्ति गीत सुनने को मिले, निश्चित रूप से हमारी सारी थकान दूर हो चुकी थी . हम लोग बीच की ओर चल दिए . केल्शी गांव निश्चित रूप से महाराष्ट्र का एक परंपरागत सिग्नेचर गाँव है . बीच पर घने नारियल के पेड़ , उतरती हुई शाम में मित्रों का मन मचल उठा और कबड्डी का आयोजन कर लिया गया . जब तक तीन चार बार गिरे नहीं मन नहीं भरा . उम्र दराज मित्रो कि कबड्डी हड्डी टूटने कि चेतावनी पर बंद हुई और वापस लौट पड़े वेलाश की ओर . नए साल की महाराष्ट्र कोंकण क्षेत्र की यह यात्रा जीवन में सदैव याद रहेगी .कोंकण क्षेत्र एक बार जरूर देखना चाहिए . देखना ही नहीं चाहिए वहां रहकर उसकी महक को फील कर ना चाहिए .

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@ हरिशंकर 9424863313

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