कुर्ग - दक्षिण भारत का कश्मीर : कैसे जाएँ, क्या करें, कहा घूमे और क्या खाएँ (2019)

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Photo of कुर्ग - दक्षिण भारत का कश्मीर : कैसे जाएँ, क्या करें, कहा घूमे और क्या खाएँ (2019) 1/1 by Abhishek Singh

मनमोहक घाटियाँ, ऊँची ऊँची चोटियाँ, कल - कल करती नदियाँ और गगन से बरसता अमृत अर्थात बारिश! इन सब आभूषणों से अलंकृत है कर्नाटक में बसा छोटा सा हिल स्टेशन - कुर्ग। यूँ ही नहीं इसे दक्षिण भारत का कश्मीर कहा जाता है। और तो और कुछ लोग इसे भारत का स्कॉटलैंड भी कहते है। अगर आप प्रकृति प्रेमी है तो यह जगह आपको तनिक भी निराश नहीं करेगा। तो चलिए ले चलते है आपको कुदरत की करिश्माई सैर पर।

प्रमुख पर्यटन स्थल

कुर्ग या कोडागु एक छोटा सा जिला है जिसका मुख्यालय मदिकेरी है। 80% पर्यटन स्थल मदिकेरी में है और 20% कुशलनगर में। मेरे साथ मेरे मित्र शेखर और तान्या थे। हम कुशलनगर में काउचसर्फिंग किए हुए थे, इसलिए पहले दिन हमने वहाँ के आस-पास भ्रमण करने की योजना बनाई।

हमारा पहला पड़ाव नामड्रोलिंग मठ, बायालकुप्पे था। बस स्टॉप से एक ऑटो किया और 15 मिनट का सफर तय करने के बाद हम मोनास्ट्री पहुँच गए।

नामद्रोलिंग मठ, बयालकुप्पे

बयालकुप्पे को दक्षिण भारत का तिब्बत भी कहा जाता है। उत्तर भारत में धर्मशाला और दक्षिण भारत में बायालकुप्पे में तिब्बतियों की मुख्य बस्तियाँ है। देश के अलग-अलग हिस्से से बौद्ध अनुयायी यहाँ धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते है। यहाँ का शांतिमय और आध्यात्मिक वातावरण ने हमारी यात्रा की शुरुआत के लिए संजीवनी का काम किया।

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हमने पहले मुख्य मंदिर में प्रवेश किया जहाँ पर भगवान बुद्ध की आलीशान प्रतिमा सुसज्जित थी। दर्शन के पश्चात् कुछ देर वहीं बैठना उचित लगा। एक अद्भुत सी शांति का अनुभव हो रहा था। मैं उस वातावरण में जैसे घुल सा गया था।

एक बौद्ध अनुयायी से हमने उनकी दैनिक दिनचर्या के बारे में पूछा तो उन्होंने बड़ी विनम्रता से हमे सारी चीज़े बताई। बात करने बाद हम आगे बढ़े। पेट में चूहों का दौड़ना भी शुरू हो गया था। वापस बस स्टॉप आ कर दोपहर का खाना खाया और अगले स्थल की ओर बढ़ने लगे।

निसारगाधाम

निसारगाधाम एक लुभावनी और सुंदर द्वीप है जो कुशालनगर शहर से 2 किमी की दूरी पर स्थित है। यह शानदार द्वीप 64 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। वन विभाग द्वारा 1989 में एक पर्यटक स्थल के रूप में स्थापित, सुरम्य पिकनिक स्थल सुंदर बांस के पेड़ों के झुरमुटों के साथ घने बांस के पेड़ों और चंदन के रसीले पत्थरों से सुशोभित है।

यह कहना किसी भी तरह से अतिश्योक्ति नहीं होगी कि निसारगाधाम वास्तव में सभी प्रकृति प्रेमियों के लिए पृथ्वी पर एक स्वर्ग है। वास्तव में, निसा पर्यटकों और आगंतुकों के लिए एक आदर्श स्थान है, जो अपने प्रियजनों के साथ प्रकृति की गोद में शांति से कुछ पल बिताना चाहते हैं।

निसारगाधाम की प्राकृतिक सुंदरता इसे कूर्ग की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक बनाती है और यह एक प्रसिद्ध पिकनिक स्थल है, ना केवल कूर्ग के लोगों के लिए, बल्कि पूरे देश के पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों के लिए भी।

द्वीप को एक लटकते रस्सी के पुल के माध्यम से पहुँचा जा सकता है। हिरण, खरगोश और मोर सहित जानवरों का एक झुंड प्राचीन परिवेश में यहाँ रहता है। इसके अलावा, जगह में एक छोटा स्नैक हाउस और एक हिरण पार्क भी है।

पर्यटकों को नदी के किनारे कुछ उथले और सुरक्षित स्थानों पर पानी में उतरने की अनुमति है। हाथी की सवारी और नौका विहार यहाँ के कुछ अन्य लोकप्रिय आकर्षण हैं। निसारगधामा में एक वन विभाग द्वारा संचालित गेस्ट हाउस और ट्रीटोप बांस के कॉटेज हैं।

निसारगाधाम में हमने बहुत अच्छा वक़्त बिताया चाहे वो हिरण को घास खिलाना हो या नदी तट पर बैठना। अब सूरज ढल रहा था। हमने वापस जाने का निश्चय किया। यहाँ पर चॉकलेट की बहुत सी दुकान है, जहाँ भिन्न भिन्न प्रकार की चॉकलेट आपको मिल जाएँगी।

मदिकेरी के लिए प्रस्थान

अगले दिन हम सुबह जल्दी उठें। अपना नाश्ता किया और बस स्टॉप की ओर तेजी से बढ़े। पता चला कि बस 20 मिनट बाद आएगी। किसी तरह बस में सीट लिए और चल पड़े कुछ और कुदरत का करिश्मा देखने। मदिकेरी कुशलनगर से एक घंटे का रास्ता है। वहाँ पहुंचकर सबसे पहले एब्बे वॉटरफॉल जाने का प्लान बना।

एब्बे वॉटरफॉल

मदिकेरी से एब्बे वॉटरफॉल की दूरी 8 किमी है। हमने एक ऑटो लिया और वहाँ पहुँचने को आतुर हुए। यह वॉटरफॉल कॉफी के सुंदर बागानों से चारों तरफ से घिरा है। आपको वॉटरफॉल तक पहुँचने के लिए लंबी सीढ़ियाँ उतारनी पड़ेगी। लेकिन उसके बाद जो प्राकृतिक नज़ारा आपको दिखेगा वो आपकी सारी थकान छू मंतर कर देगा।

एब्बे वॉटरफॉल को पहले जेस्सी वॉटरफॉल के नाम से जाना जाता था। जेस्सी एक अंग्रेज़ अधिकारी की पत्नी थी। बाद में इसका नाम एब्बे पड़ा। कुछ वक़्त निहारने के बाद हम वापस आने को तैयार हुए। यहां बरसात के मौसम में वॉटरफॉल अपने रौद्र रूप में होता है।

राजाओं के मकबरे

मुख्य शहर से एक किमी दूर राजाओं के मकबरे पहाड़ी क्षेत्र के किनारे पर बने ऐतिहासिक स्मारक हैं, जो इंडो-दर्शनीय शैली में निर्मित है। दाहिनी ओर दो मुख्य मकबरे हैं। लिंगराजेंद्र का निर्माण उनके पुत्र चिक्कविराजेंद्र ने ए डी 1820 में किया था और रुद्रप्पा (शाही पुजारी) की कब्र के बाईं ओर जो 1834 में बनाया गया था और केंद्र मकबरा डोड्डा वीराराजेन्द्र और उनकी रानी का है।

यहाँ ऊँचाई से आप पूरा मदिकेरी शहर देख सकते है। आपको बहुत सारी फ़ोटो खींचने के लिए मनमोहक दृश्य मिल जाएँगे।

मदिकेरी किला और संग्रहालय

बस स्टॉप से सिर्फ 700-800 मीटर की दूरी पर स्थित है मदिकेरी का किला। किला बहुत भव्य नहीं है पर उस वक़्त के इतिहास का बखूबी बयां करता है। अब इस इमारत को सरकारी कार्यालय के लिए प्रयोग किया जाता है।

इसके ठीक सामने एक संग्रहालय है जहाँ आपको कोडवा संस्कृति की झलक देखने को मिल जाएगी। खुदाई में प्राप्त सारी चीज़े यहाँ संग्रहित है।

राजा की सीट

मदिकेरी किले से कुछ दूर पैदल चलने पर आप राजा की सीट तक पहुँच जाएँगे। यह वाकई में एक अद्भुत जगह है। यहाँ आप पर्वत श्रृंखलाएँ, सूर्योदय, सूर्यास्त और कॉफी के बागानों को एक ऊँचाई सें देखने का सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।

Photo of कुर्ग - दक्षिण भारत का कश्मीर : कैसे जाएँ, क्या करें, कहा घूमे और क्या खाएँ (2019) by Abhishek Singh
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बच्चों और परिवार के साथ समय बिताने के लिए इसको एक पार्क का रूप दिया गया है। कहा जाता है कि यह कुर्ग के राजा सूर्यास्त देखने अपनी रानियों के साथ आते थे। हम भी सूर्यास्त को निहारने के लिए बैठ गए।

ओंकारेश्वर मंदिर

मदिकेरी में स्थित ओंकारेश्वर मंदिर को 1820 में राजा लिंगराजेंद्र द्वितीय ने तपस्या के रूप में बनवाया था। मंदिर वास्तुकला के मुहम्मदन शैली में बनाया गया है, जिसमें एक गुंबद है। इसके चार कोने चारों बुर्जों से घिरे हैं।

मंदिर के प्रवेश द्वार के पास एक लिंग स्थापित है। मंदिर की एक और आकर्षक वास्तुशिल्प विशेषता और सामने एक छोटा सा तालाब है, जिसमें विभिन्न प्रकार की मछलियां है।

अन्य पर्यटन स्थल

मंडलपट्टी की जीप सफारी - मदिकेरी से 25 किमी दूरी पर स्थित है मंडलपट्टी, जहाँ पहुँचने के लिए आपको पुष्पगिरी के घने जंगलों से गुजरना होगा। बारिश के मौसम में ताज़ा नहाए घास और हवा के झोकों के साथ झूमते जंगली फूलों से इसकी सुंदरता दोगुनी हो जाती है। दुबारे हाथी कैंप - यहाँ आप हाथियों को नहाते - खेलते देख सकते है और अगर आप चाहे तो हाथियों को नहला भी सकते है। तलकावेरी - कुर्ग से इसकी दूरी 40 किमी है। यह वह स्थान है जहाँ से कावेरी नदी की उत्पत्ति हुई है। कावेरी नदी सप्त सिंधु नदियों में से एक पवित्र नदी है। कॉफी और मसालों के बागानों का सैर करना भी एक अच्छा विकल्प है।

कुर्गी स्वाद का मज़ा

मदिकेरी का 'कुर्गी' रेसटोरेंट में खाने के लिए लंबी कतारें लगती है। आपको टोकन नंबर मिलेगा। आपका नंबर आने पर आपको सीट मिलेगी। एक और जगह है ' उडुपी गार्डन ' जहां आप खाना खा सकते है।

स्थानीय पकवान - कड़ांबुट, नुपुट, पंदी करी, कोडवा कोला करी, बैंबू शूट करी, अक्की ओटी आदि आप खा सकते हैं।

कोडवा जाति और संस्कृति की झलक

यहाँ के लोग कोडवा नामक आदिवासी जनजाति के है। इनका संबंध सिंधु घाटी सभ्यता के शहर मोहनजोदड़ो से है। स्कन्द पुराण में कोडवा को चंद्रवंशी राजाओं का वंशज बताया गया है, जो पार्वती के पूजक और कावेरी नदी के जन्मस्थल के रक्षक थे।

यह शहर 8वीं सदी में बसा था। यहाँ सबसे पहले गंग वंस के शासकों ने राज किया। बाद में पांडव, चोल, कदंब और चालुक्य वंश के राजाओं का शासन था।

चॉकलेट और कॉफी प्रेमियों का स्वर्ग

चॉकलेट का सबसे ज्यादा उत्पादन कुर्ग में होता है। आप यहाँ से तरह - तरह के चॉकलेट और घर की बनी कॉफी खरीदना ना भूलें। बस स्टॉप के पास " गणेश कॉफी " नामक दुकान है जो शहर में बेहतरीन कॉफी के विक्रेता है।

लौंग, इलायची, काली मिर्च जैसे मसाले भी आपको ज़रूर घर ले जाना चाहिए। यहां का होम मेड वाइन भी प्रसिद्ध है।

कब और कैसे जाएँ

कुर्ग को " कर्नाटक का कश्मीर " भी बोलते है। कॉफी बागानों के सैर की ऑनलाइन बुकिंग भी होती है कम से कम 3-4 दिन अवश्य बिताएँ प्राकृतिक सुंदरता को मन से महसूस करें। होटलों के बजाय होमस्टे या कॉफी बागानों के आस पास रुके।

वैसे तो सालभर यह जगह पर्यटकों को आकर्षित करता है, लेकिन अगर आप बरसात के मौसम में जाए तो इसकी सुंदरता को चार चांद लग जाते है। छतरी और रेनकोट रखना बिल्कुल ना भूलें।

कुर्ग, बैंगलोर से 260 किमी और मैसूर से 120 किमी की दूरी पर स्थित है। नज़दीकी हवाई अड्डा बैंगलोर और रेलवे स्टेशन मैसूर है। आगे की यात्रा बस, कार या बाइक के माध्यम से की जा सकती है।

कुछ मुख्य बिन्दु

अगर आप कभी इस प्राकृतिक सुंदरता को निहारने का विचार बनाए और मन में कोई भी सवाल हो, हमसे बेझिझक पूछे।

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