चाकुलिया एयरपोर्ट- क्या था विश्वयुद्ध-II के साथ झारखण्ड का सम्बन्ध? (Chakulia Airport: Jharkhand In

Tripoto
12th Feb 2016
Photo of चाकुलिया एयरपोर्ट- क्या था विश्वयुद्ध-II के साथ झारखण्ड का सम्बन्ध? (Chakulia Airport: Jharkhand In by RD Prajapati

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खनिज संसाधनों के मामले में सबसे अव्वल और बिरसा की धरती झारखण्ड का भला विश्वयुद्ध के साथ क्या सम्बन्ध हो सकता है? हम सब यह जानते हैं की द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारत भी युद्ध से अछूता नहीं था और पूर्वी भारत के अनेक हिस्सों में इसके सबूत आज भी मौजूद हैं।

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चाकुलिया एयरपोर्ट- झारखण्ड में विश्वयुद्ध- II की निशानी

दरअसल झारखण्ड के पूर्वी सिंहभूम जिले में जमशेदपुर से क्रमशः 100 एवं 60 किलोमीटर दूर दक्षिण पूर्व में चाकुलिया और धालभूमगढ़ में दो पुराने ब्रिटिशकालीन एअरपोर्ट आज भी लगभग सही सलामत अवस्था में हैं लेकिन उपयोग में नहीं हैं। इनके रनवे पर डाले गए अलकतरे या पिच के कुछ अंश देखे जा सकते हैं। ऐसे ही दो और एअरपोर्ट इनके आस पास ही हैं लेकिन वे पश्चिम बंगाल के झारग्राम के दुधकुण्डी तथा खड़गपुर के कलाईकुंडा में स्थित हैं। सिर्फ कलाईकुंडा एअरपोर्ट ही फ़िलहाल इस्तेमाल में हैं।

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इतिहास के पन्नों में देखा जाय तो अमेरिकी सेना द्वितीय विश्वयुद्ध में चार भागों में अपनी लड़ाई लड़ रही थी जिसमे उसके मित्र राष्ट्र भी शामिल थे- पहला था यूरोपियन क्षेत्र, दूसरा भूमध्य क्षेत्र, तीसरा प्रशांतिय क्षेत्र और चौथा चीन-बर्मा क्षेत्र। और भारत भी इसी चीन-बर्मा क्षेत्र के कारण ही विश्वयुद्ध के संपर्क में आया था। धालभूमगढ़ एअरपोर्ट NH-33 से कुछ ही दुरी पर स्थित है जबकि वहां से 20-25 किलोमीटर दूर चाकुलिया एअरपोर्ट है जिसके चारो ओर आज भी बीहड़ जंगल मौजूद हैं। चाकुलिया का रनवे भी काफी लंबा है, दुर्गम भी है, और अंग्रेजों ने इसे गुप्त रखा था, जबकि धालभूमगढ़ एयरपोर्ट आसानी से पंहुचा जा सकता है। हाँ, धालभूमगढ़ से चाकुलिया तक का सड़क मार्ग काफी ख़राब और पथरीला है जिसकी लम्बाई करीब बीस किलोमीटर है। चाकुलिया एअरपोर्ट का निर्माण ब्रिटिश ठेकेदार दास एंड मोहन्ती कंट्रक्शन द्वारा सन 1942 में किया गया था। शुरुआत में इसे अमेरिकी वायु सेना को दिया गया जिन्होंने अमेरिका के कंसास से सात समंदर पार कर युद्ध सामग्री यहाँ तक लाया। 1944 के उस दौर में इस रनवे की स्तिथि काफी बदतर थी। इसे भिन्न भिन्न समय में अनेक बम और हवाई हमलों का मुख्यालय घोषित किया गया। इस रनवे से मुख्यतः B-29 नामक लड़ाकू विमानें उड़ान भरा करती थी, जो बर्मा के अंदर घुसती हुई जापानी सेना को रोकने और उनको तहस-नहस करने के लिए बनी थी। उस समय दक्षिणी चीन सागर में भी जापानियों द्वारा कब्ज़ा करने के कारण उनके ऊपर से उड़ान भरना जोखिमभरा था, इसीलिए B-29 विमानों को हिमालय के पूर्वोत्तर हिस्से के ऊपर काफ़ी दुर्गम हवाई मार्ग से गुजरना पड़ता था। ये पहले चीन में उतरकर कुछ युद्ध सामग्री पहुंचाते थे फिर चीनी एयरबेसों से ही जापानियों पर हमले किये जाते थे । इन B-29 विमाओं को बाद में मेरियाना ले जाया गया जहाँ से अमेरिका ने बाद में जापान पर परमाणु बम गिराये थे।

इन सबसे जाहिर होता है की झारखण्ड के ये पुराने एयरबेस ऐतिहासिक दृष्टीकोण से काफी महत्वपूर्ण है फिर भी लोग इनके बारे बहुत कम ही जानते हैं। आज इनका उपयोग नहीं होता और इनपर पेड़ भी उग आये हैं। कभी कभी लोगों को उन रनवे में मोटरसाइकिल दौड़ाते हुए देखा जा सकता हैं। जमशेदपुर में आज के समय कोई बड़ा एअरपोर्ट तो नहीं है लेकिन चाकुलिया एअरपोर्ट को ही कभी कभी भविष्य में फिर से चालू करने के कयास लगाये जाते हैं। यहाँ तक पहुँचने के लिए भी ट्रेन या निजी वाहन के सिवा दूसरा कोई साधन नहीं है। धालभूमगढ़ रेलवे स्टेशन और चाकुलिया रेलवे स्टेशन दोनों ही टाटा-हावड़ा रेलवे मार्ग में स्थित हैं।

धालभूमगढ़ एअरपोर्ट से चाकुलिया एअरपोर्ट तक का सड़क मार्ग

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