खम्मा घणी जयपुर!!

Tripoto
19th May 2019

city palace

Photo of खम्मा घणी जयपुर!! by Pritesh Bagaria

मंज़िल चाहे कितनी भी दूर हो, कितनी भी कठिन हो पर ये शुरुआत और अंत के बीच के सफर के एक अलग ही एहसास है। किसी ने सही कहा है की सफर खूबसूरत है मंज़िल से भी।

सफर की ये जो सड़क है उसका भी एक अपना ही अंदाज़ है, ना पूछती जात-धर्म, ना आंकती अमीरी-गरीबी, ना किसी से उम्मीद, ना किसी से खफा बस ज़रूरत है तो एक मुसाफिर की जिसे वह कह सके फिर मिलेंगे चलते-चलते।

हर जगह की एक अपनी खासियत, अपनी रियासत और उससे जुडी रोचक कहानिया होती है। ऐसा ही एक शहर है जयपुर। गुलाबी नगरी नाम से मशहूर जयपुर शहर पर्यटकों के हृदय में मानो बस गया हो। राजशाही ठाठ-बाट, रहन-सहन, खान-पान यहाँ के लोगो में झलकता है।

वेल्स के प्रिंस, जो बाद में किंग एडवर्ड ७ के नाम से जाने जाने लगे, के स्वागत में पूरे शहर को गुलाबी रंग से अलंकृत किया गया और इसी के बाद से इसका नाम गुलाबी शहर पड़ा । राजस्थान की राजधानी, जयपुर की बसावट वास्तु शास्त्र और शिल्प शास्त्र के अनुसार हुआ है। राज शासन भले ही अब न रहा पर प्रजा के राजा के प्रति मान सम्मान अभी भी कायम है।

रीति-रिवाज़ो से लिप्त यह भूमि शहर को मशगूल रखती है । हर छोटे से छोटा पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस शहर से कुछ ख़ास नाता है मेराऔर हो भी क्यों ना जन्मभूमि जो ठहरी । बचपन से अभी तक का सफर रोमांचक क्रिकेट मैच से कम नहीं था। यहाँ की मिटटी की अलग बात है। मिटटी से याद आया बारिश के मौसम में सौंधी सौंधी सुगंध शाहर को जवाँ बना देती है।

मेहमान नवाज़ी यहाँ की संस्कृति ही नहीं रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। "खम्मा-घणी" एक ऐसा शाब्दिक शस्त्र है जो अतिथियों को अपना बनाये नहीं छोड़ता। मारवाड़ी यहा की बोली है और इसकी मधुरता के परिचय का पता इस कदर लगाया जा सकता है की पर्यटक इसे बोले बिना नहीं रहते। तिलक लगा कर अभिवादन करना यहाँ की परम्परा है और पगड़ी (साफा) यहाँ की शान।

यहाँ के गढ़, लड़ी गई जंग की जीत के इतिहास को बयां करते है। राजा, गढ़ का निर्माण प्रजा की हिफाज़त के लिए करवाया करते थे।

विश्व की सबसे बड़ी तोप "जयबाण" जयगढ़ की शोभा बढ़ता है । यह तोप जयगढ़ किले की चोटी पर स्थित है । पर्यटकों की पसंदीदा जगहों में से एक आमेर का किला अपनी बनावट और बसावट से सबका मन मोह लेता है। सूर्य की किरण जब किले पर पड़ती है तो बिलकुल उसी तरह प्रतीत होता है जिस तरह दुल्हन स्वर्ण आभूषण पहनाने के बाद लगती है। आभूषण से याद आया की जयपुर के आभूषण दुनियाभर में बहुत प्रचलित है । जहा पर्यटक इसे शौक से पहनते वही यहाँ की औरतो के लिए यह पहनावे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

चार दीवारी में बसा जयपुर पुराना जयपुर कहलाता है। यहाँ की हर गली की अपनी जुबां है जो अपनी अनूठी कारीगरी से यहाँ के परंपरा की कहानी बयां करती है।

जयपुर का हृदय कहा जाने वाला सिटी पैलेस बनावट का बेमिसाल उदहारण है राजा अपनी हुकूमत यही से किया करते थे। पारम्परिक पर्व का आगाज़ इसी जगह से राजा द्वारा किया जाता था। सिटी पैलेस को बेहद खूबसूरत तरीके से उकेरा गया है और इसका प्रारूप अलग अलग शासन काल का मिश्रण है। गौरतलब है की मुग़ल, राजपूत और यूरोपीय शैली बहुत ही पुरानी और अनूठी है। यह पैलेस, रचना और कारीगरी की बेहतरीन मिसाल पेश करता है।

खैर इस शहर की अपनी ही बात है। हर चीज़ को कागज़ पर उकेरा जाए तो शायद यह तारीफ ख़त्म होने का नाम ही ना ले। यहाँ की मान-मर्याद, परंपरा, पहनावा विविधता शहर से दूर होने नहीं देता। चाहे ख़ुशी के पल हो या दुख का मातम सब मिलकर बाँट लिया करते है फिर चाहे वह परिवार वाले हो या मोहल्लेवाले।

यह तो सफर है जितना करो उतना कम है।

तो आज एक हँसी बाँट लो,

आज एक ज़िन्दगी और जी लो,

आज हर लम्हे को कैद कर लो,

आज उस हमराही की दास्ताँ सुन लो,

आज उस सड़क का मुसाफिर बन लो,

आज तुम खुद को संवार लो,

आज अपनी मुस्कराहट से खुशियाँ भर दो,

क्यूकि कल हो ना हो।

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