
स्थान: पवित्र मानसरोवर झील ,तिब्बत
"गाने जो होते हैं ना किसी स्पेसिफिक मोमेंट पर या स्पेसिफिक जगह पर या किसी स्पेसिफिक इंसान के साथ सुनोगे तो उस पल के बाद जिंदगी में जब भी वह गाना/गाने आप वापस सुनोगे तो फिर स्पेसिफिक वही इंसान/जगह/मोमेंट आपको याद आ जायेगा।"

यह जो झील आप लोगों को नजर आ रही हैं ,यह हैं पवित्र मानसरोवर झील। कैलाश पर्वत की परिक्रमा करके जब यात्री मानसरोवर झील में स्नान ध्यान करते हैं तब कैलाश-मानसरोवर यात्रा पूर्ण होती हैं। कैलाश यात्रा के दौरान तिब्बत क्षेत्र में दो झीलें मिलती हैं। एक मानसरोवर झील ,दूसरी राक्षसताल झील। एक तो पवित्र झील माना जाता हैं तो दूसरी को राक्षसी प्रवृति की। मानसरोवर झील की परिधि करीब 90 किमी हैं। जिसके कई किनारो पर श्रद्धालु ठहरते हैं। हमारा जत्था जो कि विदेश मंत्रालय द्वारा भेजा गया था ,हमें कैलाश परिक्रमा के बाद बेस केम्प "दारचेन " से सीधा करीब 20-22 किमी दूर स्थित "कुगु " नाम के क्षेत्र में रोका गया। विदेश मंत्रालय वाले यात्रियों को तो इसी जगह ही रोका जाता हैं। यहाँ दो दिन और दो रातें रोका जाता हैं ताकि श्रद्धालु एक तो परिक्रमा की थकान भी उतार सके और दूसरा ,श्रद्धालु को किसी एक दिन मौसम अच्छा ना मिले तो अगले दिन शायद अच्छा मौसम मिल जाए।
मौसम की बात आ गयी तो बताता हूँ कि अगर मौसम साफ़ रहता हैं तो ही कैलाश और मानसरोवर के दर्शन एक साथ होते हैं। कैलाश पर्वत नंगी आँखों से यहाँ से काफी छोटा दिखाई देता हैं ,कैलाश को ढूंढना पड़ता हैं कई ग्लेशियर्स के बीच में से। अधिकतर समय कैलाश पर्वत बादलों से ही ढ़का हुआ नजर आता हैं,हमको कैलाश मानसरोवर के दर्शन एक साथ हुए ,क्योंकि मौसम अच्छा मिल गया था। कैलाश पर्वत को देखने के लिए कुगु में कुछ दूरबीने भी लगी हुई हैं।
जब हम इस यात्रा पर थे तो उस साल ,मतलब 2018 में ही मानसरोवर झील में डुबकी लगाने को चीन ने बेन कर दिया था। हमको नहाने के लिए बाल्टियां दी गई जिससे हम पानी भर ला सके और किनारे के पास बैठकर नहा लेवे। यहाँ कुगु में श्रद्धालु रात को सोते नहीं हैं ,क्योंकि उनको उस प्रकाश पुंज के दर्शन करने होते हैं जो यहाँ कई लोगों को रात को दिखाई देता हैं। कहते हैं वही पुंज शिव पार्वती हैं। इस चीज पर ज्यादा बात नहीं करूँगा।
हम लोगों ने यहाँ पहले दिन स्नान कर ,साथ लाये हुए नए कपड़े बेग से निकालकर पहने ,झील के किनारे बारी -बारी ग्रुप में घंटों भर हवन किया। झील में से छोटे छोटे शिवलिंग आकार के पत्थर ढूंढे। करीब 25 दिनों से हमने कोई चटपटी चीज नहीं खायी थी तो हमने वहां आलूबड़े बनवाये। शाम को और सुबह रोज झील किनारे भजन किये ,पैदल ट्रेक किया। मुझे याद हैं दूसरे दिन की शाम मैं अकेला ही झील के पास निकल गया था अपनी एकमंजिला तिब्बती स्टाइल की होटल से ,जो एकदम झील के किनारे थी। कान में इयरफोन लगाए "हे भोले शंकर पधारो" भजन सुनते सुनते।गाने जो होते हैं ना किसी स्पेसिफिक मोमेंट पर या स्पेसिफिक जगह पर स्पेसिफिक इंसान के साथ सुनोगे तो उस पल के बाद जिंदगी में जब भी वह गाना/गाने आप वापस सुनोगे तो फिर स्पेसिफिक वही इंसान/जगह/मोमेंट आपको याद आ जायेगा।मुझे आज भी यह भजन सीधा मानसरोवर ले जाता हैं।

मोबाइल नेटवर्क उधर था नहीं ,कई दिनों से घर वालों से बात नहीं हुई थी ,ना कोई मेसेज वगैरह। मोबाइल केवल फोटो खींचने ,गाने सुनने और लूडो हिलने के ही काम आता था। विदेश मंत्रालय के ऑफिसर्स को हमारे LOs लोकल सिम से सम्पर्क करके रोज हमारे ठिकाने की जानकारी देते और वही जानकारी रोज हमारे घर वालों को विदेश मंत्रालय से ईमेल करके भेज दी जाती थी। कुगु में केवल कुछ तिब्बती मठ और शायद 2 या 3 होटल्स थी। ना कोई गलियां ,ना कोई शोर। बस यह सब कुगु था।मैंने जिंदगी में पहली बार एक ही जगह बैठकर तीन अलग-अलग मौसम देखे ,झील के चारो तरफ मुझसे काफी दूर ,झील के अन्य छोर पर। मैंने पहली दफा दो इंद्रधनुष एक साथ यही देखे थे।
राक्षस ताल झील हमको कैलाश पर्वत की परिक्रमा से पहले ही बता दी गयी थी ,कुछ एकाध घंटे हम वहां रुके थे। कहते हैं इसका पानी नहीं पीना चाहिए। मानसरोवर झील पर दो दिनों तक रुका कर जब हम वापस भारत में प्रवेश के लिए जा रहे थे तब हमें एक ऐसी जगह रोका गया जहाँ हमारे एक तरफ राक्षसताल झील थी और दूसरी तरफ मानसरोवर झील। इन दोनों झीलों के पास से ही सिंधु नदी,सतलज नदी और दो अन्य नदियां निकलती हैं। यह जो सींग आपको दूसरे फोटो में दिख रहे है,यह सींग याक के हैं। वहां याक के सींग को पवित्र माना जाता हैं और ये हर जगह दिखाई देते हैं। मेरे हिसाब से ये मरे हुए याक के सींग ही पूजा में लेते होंगे ,सींग के लिए याक को नहीं मारते होंगे। क्योंकि ऐसे निर्जन और बर्फीले इलाके में इन लोगों का याक सबसे बड़ा साथी होता हैं ,सामान के आवागमन में।
खैर ,आज सावन का अंतिम सोमवार हैं तो सोचा की आज कैलाश मानसरोवर की ही यात्रा आप लोगों को करवा दूँ। बाकी जानकारी तो आप लोगों ने मेरी पुस्तक "चलो चलें कैलाश " में पढ़ ही ली होगी।
-ऋषभ भरावा













