
क्वीन ऑफ हिल्स मसूरी में होटल, गेस्टहाउस और होमस्टे के मालिकों को अब मेहमानों को रजिस्टर करना अनिवार्य
मसूरी में होटल, गेस्टहाउस और होमस्टे के मालिकों को अब उत्तराखंड पर्यटन विभाग द्वारा संचालित इंटरनेट पोर्टल पर मेहमानों को पंजीकृत करना जरूरी। यह कदम यह सुनिश्चित करने के उपायों के तहत उठाया गया है कि क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी पर उसकी 'वहन क्षमता' से अधिक बोझ न पड़े।
यह निर्देश राष्ट्रीय हरित अधिकरण (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) द्वारा नियुक्त एक समिति द्वारा 2023 की रिपोर्ट में इस हिमालयी पर्वतीय पर्यटन स्थल के पर्यावरण संरक्षण के लिए सुझाए गए 19 निवारक और उपचारात्मक उपायों के समूह का हिस्सा है। इसी साल 8 मई को, एनजीटी ने राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत एक हलफनामे में रिपोर्ट के आधार पर की गई कार्रवाई पर ध्यान दिया और राज्य सरकार पर इन कदमों के क्रियान्वयन में तेजी लाने का दबाव डाला।
क्या है पंजीकरण का तरीका?
2023 की रिपोर्ट में कहा गया था, "पर्यटकों का पंजीकरण क्षेत्र की वहन क्षमता, विशेष रूप से उपलब्ध पार्किंग स्थान, अतिथि कक्ष की उपलब्धता आदि के अनुसार किया जाना चाहिए। मसूरी क्षेत्र में आने के लिए पर्यटकों से शुल्क लिया जा सकता है और भुगतान का उपयोग अपशिष्ट प्रबंधन और स्वच्छता के लिए किया जा सकता है।"
कुछ समय तक टालमटोल के बाद, उत्तराखंड पर्यटन विभाग ने 30 जुलाई 2025 को पर्यटकों के पंजीकरण का परीक्षण शुरू कर दिया, जो 19 सिफारिशों में से एक था। ज़िला पर्यटन विकास अधिकारी बृजेंद्र पांडे ने बताया कि एनजीटी के आदेश से होटल और होमस्टे मालिकों को अवगत कराने के लिए एक बैठक बुलाई गई थी। जिसमें प्रबंधकों और मालिकों को सिस्टम में अपनी इकाइयों को पंजीकृत करने और पर्यटकों का डेटा भरने का एक लाइव डेमो दिया गया। यह पंजीकरण आगंतुकों के चेक-इन करते समय वास्तविक समय में किया जाएगा।"
क्यों पड़ी जरूरत?
पर्यटन से बढ़ता दबाव
मसूरी बढ़ते हुए पर्यटन का दबाव अब साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है। दिल्ली से करीब 320 किलोमीटर दूर और देहरादून से सड़क और रेल के ज़रिए अच्छी तरह जुड़ा होने के कारण मसूरी हमेशा से एक लोकप्रिय हिल स्टेशन रहा है।
1958 में जहां मसूरी आने वाले पर्यटकों की संख्या महज़ 1.5 लाख थी, वहीं 1966 में यह बढ़कर 3 लाख हो गई। 2000 तक यह आंकड़ा 8.5 लाख तक पहुँच गया। लेकिन असली उछाल 2000 के बाद देखने को मिला। कोविड महामारी से पहले के आखिरी सामान्य साल, यानी 2019 में, मसूरी आने वाले पर्यटकों की संख्या 30 लाख से भी ज़्यादा रही।
इसका मतलब है कि सिर्फ 19 सालों में पर्यटकों की संख्या में करीब 21 लाख का इजाफा हुआ — जो इस छोटे से हिल स्टेशन पर भारी दबाव का संकेत है।
ये आंकड़े साफ तौर पर दिखाते हैं कि मसूरी का भौतिक ढांचा लगातार बढ़ते पर्यटन के बोझ तले दबता जा रहा है। 2023 तक इस क्षेत्र में कुल 303 होटल, 201 होमस्टे और 6 धर्मशालाएं पंजीकृत थीं — यानी रुकने की व्यवस्था तो काफी हद तक बढ़ गई है, लेकिन ज़रूरी सुविधाओं का विस्तार उसके मुकाबले बेहद सीमित रहा है।
पार्किंग की दिक्कत, सड़कों पर लंबी जाम
पार्किंग की बात करें तो, मसूरी में सार्वजनिक और निजी मिलाकर कुल सिर्फ 1,240 वाहनों की पार्किंग क्षमता है। यही वजह थी कि विशेषज्ञ समिति ने 2023 में यह सिफारिश की थी कि मसूरी में आने वाले पर्यटक वाहनों की संख्या को इसी सीमा तक सीमित किया जाना चाहिए, ताकि शहर पर और अधिक बोझ न पड़े।
2011 की जनगणना के मुताबिक, मसूरी की स्थायी आबादी 30,118 थी। लेकिन 2023 की रिपोर्ट बताती है कि आने वाले वर्षों में यह संख्या तेज़ी से बढ़ेगी — 2037 तक इसमें 23% और 2052 तक 52% की बढ़ोतरी का अनुमान है।
पेयजल की किल्लत
अब ज़रा सोचिए, ये वही मसूरी है जो पहले से ही पानी की गंभीर समस्या से जूझ रही है। फिलहाल, मसूरी नगर पालिका हर दिन करीब 7.69 मिलियन लीटर पानी छह पंपिंग स्टेशनों और छह गुरुत्वाकर्षण स्रोतों के ज़रिए उपलब्ध कराती है। लेकिन ये आपूर्ति पर्याप्त नहीं है — इसलिए इसे पूरा करने के लिए यमुना जल आपूर्ति योजना से अतिरिक्त पानी लाना पड़ता है। बढ़ती जनसंख्या और पर्यटन के दबाव के बीच, संसाधनों की यह खींचतान आने वाले समय में और गहरी हो सकती है।
संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र
गढ़वाल हिमालय की तलहटी में समुद्र तल से 2,005 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मसूरी हिल स्टेशन भूकंपीय क्षेत्र चार की श्रेणी में है, जो सबसे सक्रिय क्षेत्र पांच से एक कदम नीचे है।
2007 में किए गए एक अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला गया था कि मसूरी और इसके आसपास का इलाका भूस्खलन और ढलानों के खिसकने जैसी घटनाओं के लिए पहले से ही बेहद संवेदनशील है।
अध्ययन में बताया गया कि यहां की चट्टानें — खासकर कार्बोनेट चट्टानें — बेहद जुड़ी हुई, टूटी-फूटी और मौसम के असर से कमजोर हो चुकी हैं। इसके साथ ही इलाके की खड़ी ढलानें और उनमें मौजूद पानी का तेज़ रिसाव मिलकर ऐसी परिस्थितियां बनाते हैं, जो ज़मीन की अस्थिरता को बढ़ाते हैं।
यानी यह भूभाग प्राकृतिक रूप से ही काफी नाज़ुक है — और अगर इस पर ज़्यादा छेड़छाड़ या निर्माण हुआ, तो खतरे और बढ़ सकते हैं।
मसूरी में कई इमारतें ऐसी खड़ी की गई हैं जो 40 डिग्री से भी अधिक तीव्र ढलान पर बनी हैं — जो किसी भी पहाड़ी क्षेत्र के लिए बेहद खतरनाक मानी जाती है।
इतना ही नहीं, यहां कई इमारतों की ऊंचाई उत्तराखंड भवन उप-नियम और विनियमन, 2001 में तय की गई अधिकतम सीमा (12 मीटर) से भी ज़्यादा है।
इसका मतलब है कि कई निर्माण कार्य न सिर्फ भू-आकृतिक दृष्टि से असुरक्षित जगहों पर हो रहे हैं, बल्कि वे नियमानुसार भी अवैध या असंगत हैं — जो भविष्य में किसी बड़ी आपदा को न्योता दे सकते हैं।
एनजीटी ने इससे पहले मसूरी की जल-वहन क्षमता पर लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (लबासना/LBSNAA) की 2001 की एक रिपोर्ट का हवाला दिया था। जिसमें निष्कर्ष निकाला गया था कि आगे कोई भी निर्माण कार्य व्यवहार्य नहीं है। देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. विक्रम गुप्ता ने इस निष्कर्ष का समर्थन करते हुए कहा था कि "मसूरी का चूना पत्थर कमज़ोर है और उसमें सूक्ष्म दरारें हैं।"
2023 में जोशीमठ में हुई भूमि धंसने की घटना के बाद, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने मसूरी और इसके आस-पास के इलाकों में भी ऐसे ही संभावित खतरों की पहचान की थी।
"मसूरी और उसके आसपास बढ़ता हुआ कंक्रीट का जंगल भूस्खलन की बड़ी वजह बन रहा है। मसूरी के नीचे सुरंग बनाने की योजना खतरनाक साबित हो सकती है। इसी तरह देहरादून से मसूरी तक प्रस्तावित रोपवे भी पर्यावरण के लिए जोखिम भरा है। रोपवे और सुरंग जैसी परियोजनाओं का बुरा असर पहले जोशीमठ पर पड़ चुका है। पहाड़ की सड़कों पर बढ़ती यातायात की भीड़ उसका बोझ और बढ़ा देती है। मसूरी में हो रही अंधाधुंध निर्माण गतिविधियाँ अब इस छोटे से शहर की वहन क्षमता से कहीं ज़्यादा हो चुकी हैं।" ©N.
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