
काशी, बनारस या वाराणसी ये ऐसा शहर है जिसे किसी भी नाम से पुकारों, अपना ही लगता है। वैसे भी ये शहर सिर्फ शहर नहीं बल्कि सभ्यताओं का संगम है। यहाँ भारत और विश्व के सभी महान धर्मों से जुड़े तीर्थ स्थल है जो वाकई में इसे भारत का प्रतिबिंब बनाते है। साथ ही यह विभिन्न कलाओं जैसे साहित्य, रंगकर्म, हस्तकला, बुनाई, पाक कला, पेंटिंग, प्रिंटिंग, मूर्तिकला आदि का भी संगम स्थल है जो इसे विशेष बनाता है। वाराणसी के बारे मे जितना लिखा या पढ़ा जाए वो कम है क्योंकि इसकी बनावट में इतनी परतें है जिन्हें जानने और समझने में बहुत साल लग जाएंगे। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर उसके बाद में निर्मित होने वाले नए भारत में भी वाराणसी का अपना एक विशेष योगदान एवं हस्तक्षेप है।

तो बात आज ऐसे ही एक जगह और राष्ट्रीय महत्त्व के प्रतीक की जो हर भारतीय को गर्व, सम्मान और स्वाभिमान की भावना से भर देता है। और वो प्रतीक है भारत का राष्ट्रीय चिन्ह - अशोक चिन्ह या स्तम्भ जो भारत सरकार का आधिकारिक शासन चिन्ह है जो सरकार के सभी मंत्रालयों, कार्यालयों, लेटर हैड, मुद्रा, पासपोर्ट आदि पर दिखता है और जो हमारे देश की पहचान पूरे विश्व में बनाता है। आज की विजिट स्टोरी - सारनाथ और अशोक स्तम्भ पर।

तो सबसे पहले शुरुवात करते है सारनाथ से -
सारनाथ
सारनाथ भगवान बुद्ध के जीवन काल से संबंधित चार प्रमुख बौद्ध तीर्थ स्थलों लुम्बिनी-नेपाल (जन्म स्थान), बोध गया या गया-बिहार (ज्ञान प्राप्ति), सारनाथ-वाराणसी (प्रथम उपदेश) एवं कुशीनगर (निर्वाण) में से एक है। भगवान बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् अपने प्रथम पाँच शिष्यों को यहीं पर पहला धर्मोपदेश दिया, जो धर्म-चक्र प्रवर्तन के नाम से बौद्ध साहित्य में वर्णित है। यहीं पर स्वयं भगवान बुद्ध ने प्रथम बौद्ध संघ की स्थापना भी की थी। बौद्ध ग्रन्थों में इस स्थान के लिए ऋषिपत्तन एवं मृगदाव या मृगदाय जैसे नाम मिलते है। इसका आधुनिक नाम निकटस्थ महादेव मंदिर सारंगनाथ (मृगों के स्वामी) से प्रेरित लगता है। जैन धर्मावलम्बियों के लिए भी ग्यारहवें तीर्थकर श्रेयांसनाथ जी के तपोस्थली होने के कारण सारनाथ समान रूप से पवित्र तीर्थ है।

सारनाथ एक व्यवस्थित रूप से बसा उन्नत तकनीत से निर्मित ईसा से लगभग 300 से 500 वर्ष पुराना पुरातन क्षेत्र है जो मुश्किल से एक डेढ़ सदी पहले 18वीं शताब्दी में ही आधुनिक लोगों के सामने उत्खनन के बाद आया। उपलब्ध साहित्य और रिपोर्टस के अनुसार सबसे पहले सन् 1798 में मि. डंकन एवं कर्नल कन्जी ने इस स्थान के पुरातात्विक महत्व पर प्रकाश डाला। तत्पश्चात् विभिन्न उत्खननकर्ताओं ने अनेक चरणों में यहाँ उत्खनन कार्य किया, जिनमें अलेक्जेण्डर कनिंघम (1835-36), मेजर किट्टी (1251-52), एफ.ओ. ऑरटेल (1904-05), सर जॉन मार्शल (1907), एम. एच. हरग्रीव्स (1914-15) तथा दयाराम साहनी प्रमुख है। परिणाम स्वरूप तीसरी शती ई० पूर्व से लेकर बारहवीं शती ई० के मध्य निर्मित अनेक विहार, स्तूप, मंदिर, अभिलेख, मूर्ति-शिल्प एवं अन्य पुरावशेष सामने आए, जिनमें धर्मराजिका स्तूप, धम्मेख स्तूप, अशोक स्तंभ-सिंह शीर्ष सहित, धर्मचक्र-जिन बिहार, तथा अनेक मूर्तियाँ प्रमुख है। समीप ही भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा संचालित स्थानीय पुरातत्व संग्रहालय है, जिनमें इस स्थल की खुदाई से प्राप्त मूर्तियों व अन्य पुरावस्तुयें प्रदर्शित है।

सारनाथ में हड़प्पा और मोहन-जो-दरों जैसी ही सभ्यता के निशान मिलते है जिनमें पक्के मकान, शौचालय, पानी निकासी की नालियाँ, आग में पकाई गई ईंटें, विहार, स्तूप आदि शामिल है। इनको ध्यान से देखने पर एक विकसित सभ्यता को जानने और समझने का मौका मिलता है।

उस समय की आग में पकाई गई ईंट से विहार का निर्माण हुआ था, चित्र मे दिखाई गई ईंट की लंबाई लगभग डेढ़ फीट और चौड़ाई करीब आधा फीट है और ये आयताकार है। इन्हें आपस मे जोड़ने के लिए चुना, चिकनी मिट्टी, गुड़ के मसाले का उपयोग हुआ है जो आज भी उसी मजबूती से टिका हुआ है।

बौद्ध विहार जिसमें व्यवस्थित कमरों और हाल की संरचना दिखाई दे रही है जो संभवत: भिक्षुओं के ध्यान-प्रार्थना और पढ़ाई के लिए उपयोग होता रहा हो।

अशोक स्तम्भ
अशोक स्तम्भ मौर्य सम्राट अशोक द्वारा 272-232 ई० पू० लगवाये गये। ये 15.25 मीटर ऊँचे एकाश्म स्तम्भ के टुकड़े हैं जो चुनार के बलुए पत्थर से बने एवं विशिष्ट मौर्य कालीन चमकदार ओज से युक्त हैं। ऊपर की ओर घटती मोटाई वाले इस बेलनाकार स्तम्भ का आधार व शीर्ष पर व्यास क्रमशः 0.71 मीटर एवं 0.56 मीटर है। स्तम्भ का भूमिगत भाग खुरदरा है तथा सम्पूर्ण भार एक बड़े शिलापट्ट पर आधारित है। कभी उसके शिखर पर पीठ से पीठ सटाये चार सिंहों वाला प्रसिद्ध शीर्ष सुशोभित था, जो मौर्य कला का एक उत्कृष्ट नमूना है। इस स्तम्भ में तीन अभिलेख उत्कीर्ण है। प्राचीनतम मौर्य कालीन ब्राह्मी लिपि में अशोक का शासनादेश है, जिसमें संघ के भिक्षु-भिक्षुणियों को विघटनकारी प्रवृतियों के निषेधार्थ चेतावनी दी गयी है। दूसरा अभिलेख कौशाम्बी के कुषाण शासक अश्वघोष के शासन के चालिसवें वर्ष का उल्लेख करता है। तीसरा प्रारम्भिक गुप्तकालीन ब्राह्मी लिपि के अभिलेख में सम्मितियां सम्प्रदाय तथा चास्तीपुत्रक विचार के शिक्षकों का वर्णन निहित है।

सारनाथ का अशोक स्तंभ उत्तर प्रदेश में स्थित एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्मारक है, जो सम्राट अशोक द्वारा बनवाया गया था। सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ बुद्ध के प्रथम उपदेश और चार आर्य सत्यों के प्रकटीकरण के स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। मूलतः अशोक स्तंभ अपने मूल स्थान पर ही बना हुआ है, लेकिन इसका शीर्ष भाग अब सारनाथ संग्रहालय में प्रदर्शित है। सारनाथ का म्यूजियम भारत का पहला ऑनसाइट म्यूजियम है। यह विशिष्ट स्तंभ भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है। केंद्रीय प्रतीक के रूप में चुना गया यह सिंह शक्ति, साहस और धर्म के ब्रह्मांडीय चक्र का प्रतीक है। ऊपर का चक्र अब टूट गया हैं, वह भगवान बुद्ध द्वारा प्रवर्तित धर्म चक्र का प्रतीक है।

बचे हुये मात्र 7 अशोक स्तम्भ में से एक है सारनाथ का अशोक स्तम्भ
सम्राट अशोक ने अपने साम्राज्य में कई अशोक स्तम्भ बौद्ध धर्म की शिक्षाओं के विस्तार हेतु लगवाए थे जिनमें से लुम्बिनी (नेपाल), सारनाथ (उ. प्र.) और सांची (म.प्र.) प्रमुख है। इनमे से अब सिर्फ 7 अशोक स्तम्भ ही बचे हुये है। जिनमे से एक सारनाथ वाला अशोक स्तम्भ है। सम्राट अशोक ने करीब 250 ईसा पूर्व सिंहचतुर्मुख को स्तंभ के शीर्ष पर रखवाया था। ऐसे कई स्तंभ अशोक ने भारतीय उपमहाद्वीप में फैले अपने साम्राज्य में कई जगह लगवाए थे, जिनमें से सांची का स्तंभ प्रमुख है। कई चीनी यात्रियों के विवरणों में इन स्तंभों का जिक्र मिलता है। सारनाथ के स्तंभ का भी ब्योरा दिया गया था मगर 20वीं सदी की शुरुआत तक इसे खोजा नहीं जा सका था। वजह, पुरातत्वविदों को सारनाथ की जमीन पर ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता था कि नीचे ऐसा कुछ दबा हो सकता है।

स्तंभ की रुपरेखा
अशोक के सारनाथ सिंह स्तंभ में, स्तंभ का ऊपरी भाग, जिसे शीर्ष के रूप में जाना जाता है, तीन घटकों से बना है। सबसे पहले, कमल के फूल का आधार, जिसे बौद्ध धर्म में एक प्रमुख प्रतीक के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसके बाद, चार जानवरों की नक्काशी वाला एक ड्रम मुख्य दिशाओं का प्रतिनिधित्व करता है: एक घोड़ा (पश्चिम), एक बैल (पूर्व), एक हाथी (दक्षिण), और एक शेर (उत्तर)। ये जानवर अनवताप्त झील से निकलने वाली चार नदियों का भी प्रतीक हैं, जो अस्तित्व के चार संकटों को दर्शाती हैं। निरंतर चलते हुए, वे जीवन के चक्र को कायम रखते हैं।

ढोल के ऊपर चार शेर एक दूसरे से पीठ सटाकर खड़े हैं, जिनमें से प्रत्येक एक मुख्य दिशा की ओर मुंह करके खड़ा है। शेर बुद्ध के शाक्य (सिंह) वंश से संबंध का प्रतीक है, जो राजसी सत्ता, नेतृत्व और संभवतः बौद्ध राजा को दर्शाता है, जिसने इन स्तंभों का निर्माण करवाया था। मूल रूप से, शेरों के ऊपर एक चक्र (पहिया) रखा जाता था। कुछ जीवित शेरों की टोपियों में, उनके नीचे हंसों की एक पंक्ति उकेरी गई है। हंस, एक प्राचीन प्रतीक है, जिसे सांसारिक और स्वर्गीय क्षेत्रों के बीच एक कड़ी माना जाता है, इसकी उड़ान इस संबंध का प्रतीक है। सिंह जिस गोलाकार मण्ड (फलक) पर उत्कीर्ण है उस पर चार पशु अर्थात गज, सिंह, अश्व और वृषभ बने हैं जिनके बीच बीच में चक्र अंकित है। ये चक्र जनमानस में जागरूक धर्म के प्रतीक हैं। बुद्ध ने सारनाथ में आकर प्रथम उपदेश दिया एवं बौद्ध संघ की स्थापना की. यह चक्रध्वज उसी का कलात्मक प्रतीक है ।

अशोक का सिंह स्तंभ केवल एक ऐतिहासिक कलाकृति नहीं है; यह एक जीवंत प्रतीक है जो भारत के मूल मूल्यों के साथ प्रतिध्वनित होता रहता है। सारनाथ के एक स्तंभ से राष्ट्रीय प्रतीक तक की इसकी यात्रा सम्राट अशोक की स्थायी विरासत और भारत की सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान पर उनके गहन प्रभाव को दर्शाती है। सिंह स्तंभ न केवल पत्थर में बल्कि भारत की समृद्ध विरासत और इसके भाग्य को आकार देने वाले सिद्धांतों के प्रति इसकी अटूट प्रतिबद्धता का एक कालातीत प्रतिनिधित्व है।

सिंह शीर्ष के ऊपर लगे चक्र का विवरण
बौद्ध धर्म के नियम व दर्शन को इंगित करने वाला यह चक्र मूल रूप से सिंह शीर्ष के सबसे ऊपरी भाग पर पत्थर के एक छोटे बेलनाकार टुकड़े पर अवस्थित था। यद्यपि यह बेलनाकार टुकड़ा उत्खनन में प्राप्त नहीं हुआ फिर भी चारों सिंहों के शीर्ष के बीच में बनाये गये छिद्र के 20.5 सेमी के व्यास से इसकी मोटाई का अनुमान लगाया जा सकता है। चक्र के किनारे के टुकड़े व इनमें लगी तीलियों के भाग प्राप्त हुए हैं। ऐसा अनुमान किया जाता है कि इन तीलियों या अरों की कुल संख्या 32 थी, जो संभवतः महापुरूषों के 32 लक्षणों का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका उल्लेख बौद्ध ग्रन्थ दीघनिकाय के लक्खन सुत्त में मिलता है।

अशोक स्तम्भ को खोजे जाने का इतिहास
अशोक स्तंभ भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित प्रतीक है, जो सम्राट अशोक के समय से जुड़ा हुआ है। अशोक स्तंभ एक धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में प्रसिद्ध हुआ है। हालांकि, अशोक स्तंभ केवल एक प्रतीक नहीं था, बल्कि इसके माध्यम से सम्राट अशोक ने अपने शासन के धार्मिक दृष्टिकोण और नीति का प्रचार किया।
सम्राट अशोक के इस स्तंभ का चिन्ह समय के साथ कुछ स्थानों पर मिट गया था, लेकिन 19वीं शताब्दी में इस स्तंभ की खोज फिर से की गई। इतिहासकार CHARLES ALLEN ने अपनी किताब "Ashoka: The Search for India's Lost Emperor" में इस खोज का विवरण दिया है। इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका जर्मन नागरिक फ्रेडरिक ऑस्कर ओरटेल की थी, जिन्होंने सारनाथ में खुदाई के दौरान इस स्तंभ को खोजा। फ्रेडरिक को पहले गुप्तकाल के मंदिर के सबूत मिले, लेकिन बाद में उन्हें अशोक स्तंभ के रूप में एक ऐतिहासिक खजाना मिला।

1851 में खुदाई के दौरान सांची से एक अशोक स्तंभ मिल चुका था। उसका सिंहचतुर्मुख सारनाथ वाले से थोड़ा अलग है। ब्रिटिश राज पर कई किताबें लिखने वाले मशहूर इतिहासकार चार्ल्स रॉबिन एलेन ने सम्राट अशोक से जुड़ी खोजों पर भी लिखा। Ashoka: The Search for India's Lost Emperor में वह सारनाथ के अशोक स्तंभ की खोज का विवरण देते हैं। फ्रेडरिक ऑस्कर ओरटेल की पैदाइश जर्मनी में हुई थी। वह जवानी में जर्मन नागरिकता छोड़कर भारत आए और तब के नियमों के हिसाब से ब्रिटिश नागरिकता ले ली। रुड़की के थॉमसन कॉलेज ऑफ सिविल इंजिनियरिंग (अब IIT रुड़की) से सिविल इंजीन्यरिंग की डिग्री ली। रेलवे में बतौर सिविल इंजिनियर काम करने के बाद फ्रेडरिक ऑस्कर ओरटेल ने लोक निर्माण विभाग में ट्रांसफर ले लिया।

1903 में ओरटेल की तैनाती बनारस (अब वाराणसी) में हुई। ओरटेल के पास आर्कियोलॉजी का कोई अनुभव नहीं था, इसके बावजूद उन्हें इजाजत मिल गई कि वो सारनाथ में खुदाई करवा सकें। दरअसल उन्होंने इस एरिया की खुदाई चीनी यात्रियों के किताबें पढ़ने के बाद शुरू की, जो मध्यकाल के शुरू में सारनाथ के आसपास आए थे.
सबसे पहले मुख्य स्तूप के पास गुप्त काल के मंदिर के अवशेष मिले, उसके नीचे अशोक काल का एक ढांचा था। पश्चिम की तरफ फ्रेडरिक को स्तंभ का सबसे निचला हिस्सा मिला। आस-पास ही स्तंभ के बाकी हिस्से भी मिल गए। फिर सांची जैसे शीर्ष की तलाश शुरू हुई। मार्च 1905 में स्तंभ का शीर्ष भी मिल गया। जब खुदाई हुई तो 07 फुट से कहीं ज्यादा ऊंचाई का ये स्तंभ 1905 में आस्कर को मिला. समय के साथ ये खराब भी हो गया था और टूटफूट भी हो चुकी थी. ये तीन हिस्से में टूटा हुआ मिला. लेकिन अच्छी बात ये थी अशोक स्तंभ का शेर वाला हिस्सा सलामत था और ये साफ नजर आ रहा था. स्तंभ पर जिस तरह से शेर को बारीकी से उभारा गया था, वो तो कला का नायाब नमूना था.
जहां स्तंभ मिला था, फौरन ही वहां म्यूजियम बनाने के आदेश दे दिए गए। सारनाथ म्यूजियम भारत का पहला ऑन-साइट म्यूजियम है। अगले साल जब शाही दौरा हुआ तो फ्रेडरिक ने वेल्स के राजकुमार और राजकुमारी (बाद में किंग जॉर्ज पंचम और महारानी मेरी) को सारनाथ में अपनी खोज दिखाई। अगले 15 सालों के दौरान फ्रेडरिक ने बनारस, लखनऊ, कानपुर, असम में कई महत्वपूर्ण इमारतों का निर्माण करवाया। 1921 में वह यूनाइटेड किंगडम लौट गए। 1928 तक फ्रेडरिक लंदन के टेडिंगटन स्थित जिस घर में रहे, उसे उन्होंने 'सारनाथ' नाम दिया था।

ये तो हुआ अशोक स्तम्भ और उसके इतिहास से जुड़ी बातों का वर्णन। अब आते है भारत के राष्ट्रीय चिन्ह और स्वाभिमान के प्रतीक अशोक चिन्ह पर। अशोक चिन्ह को भारत सरकार ने अपना राष्ट्रीय चिन्ह कैसे बनाया उसका इतिहास और महत्त्व जानते है।
अशोक चिन्ह - भारत का राष्ट्रीय प्रतीक
अशोक चिह्न भारत का राजकीय प्रतीक है। इसको सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ के शीर्ष भाग से लिया गया है।
राष्ट्र के प्रतीक में जिसे 26 जनवरी 1950 में भारत सरकार द्वारा अपनाया गया था। इस प्रतीक चिन्ह में केवल तीन सिंह दिखाई देते हैं और चौथा छिपा हुआ है, दिखाई नहीं देता है। चक्र केंद्र में दिखाई देता है, सांड दाहिनी ओर और घोड़ा बायीं ओर और अन्य चक्र की बाहरी रेखा बिल्कुल दाहिने और बाई छोर पर। घंटी के आकार का कमल छोड़ दिया जाता है। प्रतीक के नीचे मुंडक उपनिषद से सूत्र वाक्य "सत्यमेव जयते" देवनागरी लिपि में अंकित है। जिसका अर्थ है केवल सत्य की विजय होती है। सिंहचतुर्मुख के आधार के बीच में अशोक चक्र है जो भारत के राष्ट्रीय ध्वज के बीच में भी दिखाई देता है।
यह प्रतीक भारत सरकार के आधिकारिक लेटरहेड का एक हिस्सा है और सभी भारतीय मुद्रा पर भी प्रकट होता है। यह कई स्थानों पर भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में भी कार्य करता है और भारतीय पासपोर्ट पर प्रमुख रूप से प्रकट होता है। अशोक चक्र (पहिया) अपने आधार पर भारत के राष्ट्रीय ध्वज के केन्द्र में स्थित हैं। प्रतीक का प्रयोग भारत के राज्य प्रतीक (अनुचित प्रयोग का निषेध) अधिनियम, 2005 के अंतर्गत विनियमित और प्रतिबंधित है। आधिकारिक पत्राचार के लिए किसी व्यक्ति या निजी संगठन को प्रतीक का उपयोग करने की अनुमति नहीं है।
http://knowindia.gov.in/knowindia/national_symbols.php?id=9

अशोक स्तंभ का सिंहचतुर्मुख कैसे बना राष्ट्रीय प्रतीक?
जब भारत लंबे संघर्ष के बाद अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हुआ तो एक राष्ट्रीय प्रतीक की जरूरत महसूस हुई जो एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में एक वैश्विक पहचान बने और उसकी अपनी एक सांस्कृतिक पहचान भी हो जो भारत के इतिहास, संस्कृति और कला का भी प्रतिनिधितत्व करें।
भारतीय अधिराज्य ने 30 दिसंबर 1947 को सारनाथ के अशोक स्तंभ के सिंहचतुर्मुख की अनुकृति को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया। इधर संविधान ड्राफ्ट किए जाने की शुरुआत हुई। हाथों से लिखे जा रहे संविधान पर भी राष्ट्रीय प्रतीक उकेरा जाना था। और बाद में यह भारत गणराज्य का प्रतीक बन गया जब 26 जनवरी 1950 को संविधान अपनाया गया और भारत एक गणतंत्र बन गया। ये स्तंभ ताकत, साहस, गर्व और आत्मविश्वास को भी जाहिर करता है. दरअसल मौर्य शासन के ये सिंह चक्रवर्ती सम्राट की ताकत को दिखाते थे. जब भारत में इसे राष्ट्रीय प्रतीक बनाया गया तो इसके जरिए सामाजिक न्याय और बराबरी की बात भी की गई.

संविधान की हस्तलिखित प्रति को सजाने का काम मिला आधुनिक भारतीय कला के पुरोधाओं में से एक नंदलाल बोस को। बोस ने एक टीम बनाई जिसमें 21 साल के दीनानाथ भार्गव भी थे। बोस का मन था कि संविधान के शुरुआती पन्नों में ही सिंहचतुर्मुख चित्रित होना चाहिए। चूंकि भार्गव कोलकाता के चिड़ियाघर में शेरों के व्यवहार पर रिसर्च कर चुके थे, इसलिए बोस ने उन्हें चुना। 26 जनवरी, 1950 को 'सत्यमेय जयते' के ऊपर अशोक के सिंहचतुर्मुख की एक अनुकृति को भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में स्वीकार किया गया।

राष्ट्रीय प्रतीक बनाने की प्रक्रिया -
विचार: भारत की स्वतंत्रता के बाद, भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के लिए विचार-विमर्श हुआ। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सम्राट अशोक के सारनाथ स्थित सिंह स्तंभ के प्रतीक को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाने का प्रस्ताव दिया था। जब भारत आजाद होने वाला था. उससे पहले 22 जुलाई 1947 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने एक प्रस्ताव संविधान सभा के सामने रखा कि देश के नए ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीक के लिए डिजाइन बनाया जाना चाहिए. नेहरू ने साथ ही ये सुझाव भी दिया कि बेहतर हो हम इन चीजों में मौर्य सम्राट अशोक के सुनहरे दौर के शासनकाल को रखें. आधुनिक भारत को अपने इस समृद्ध और चमकदार अतीत के आदर्शों और मूल्यों को सामने लाना चाहिए.

नेहरू ने संविधान सभा में इस बारे में आगे कहा, “चूंकि मैने सम्राट अशोक का जिक्र किया है तो ये बताना चाहूंगा कि सम्राट अशोक का काल भारतीय इतिहास में ऐसा दौर था जिसे ध्यान रखना चाहिए, जिसमें हमने अंतरराष्ट्रीय तौर पर छाप छोड़ी. ये केवल एक राष्ट्रीय दौर नहीं था बल्कि ऐसा समय था जबकि हमने भारतीय राजदूतों को दूर दूर के देशों में भेजा और वो साम्राज्य विस्तार के लिए नहीं बल्कि शांति, संस्कृति और सद्भाव के प्रतीक बनकर गए.”

भारतीय संविधान के निर्माण में शामिल पांच प्रमुख नेता थे : डॉ. बी.आर. अंबेडकर (प्रारूप समिति के अध्यक्ष), डॉ. राजेंद्र प्रसाद (संविधान सभा के अध्यक्ष), जवाहरलाल नेहरू (भारत के प्रथम प्रधानमंत्री), सरदार वल्लभभाई पटेल (प्रथम उप प्रधानमंत्री) और के.एम. मुंशी (प्रारूप समिति के सदस्य)।
स्वीकृति: भारत सरकार ने 26 जनवरी, 1950 को इस प्रतीक को अपने राष्ट्रीय राजचिह्न के रूप में अपनाया।
डिज़ाइन: वर्तमान राष्ट्रीय प्रतीक, जिसमें सारनाथ स्तंभ के चार शेर और उनके नीचे धर्मचक्र शामिल हैं, का डिज़ाइन प्रख्यात चित्रकार नंदलाल बोस के शिष्य दीनानाथ भार्गव ने तैयार किया था। उन्होंने इसे भारतीय संविधान की मूल प्रति पर उकेरा था। तब देशभर के कला स्कूलों के लोगों को इस संबंध में डिजाइन बनाने के लिए बुलाया गया. लेकिन कोई भी डिजाइन जम नहीं रहा था. तब एक आईसीएस अफसर बदरुद्दीन तैयबजी और उनकी पत्नी सुरैया तैयबजी ने अशोक स्तंभ के ग्राफिक वर्जन को ड्रा किया और वायसराय लॉज (अब राष्ट्रपति भवन) की प्रेस ने कुछ बदलावों के साथ इसे जब प्रिंट किया तो हर किसी को ये पसंद आया।

कागज, दस्तावेजों और पासपोर्ट आदि पर आप जो सिंह का राष्ट्रीय प्रतीक देखते हैं, उसको बनाने का काम प्रख्यात चित्रकार और शांति निकेतन के कला शिक्षक नंदलाल बसु के एक शिष्य दीनानाथ भार्गव ने किया. वो तब शांति निकेतन में पढ़ रहे थे और बाद में उन्होंने अशोक स्तंभ के शेर को बतौर डिजाइन कागज पर उतारने का काम किया. इसे उन्होंने संविधान के पहले पेज पर भी स्केच किया. यही शेर जो उन्होंने डिजाइन किया, वो बाद मुद्रा, सरकारी दस्तावेजों और पासपोर्ट पर अंकित होने लगा.

किसे अनुमति है अशोक स्तंभ के प्रयोग की?
अशोक स्तंभ का प्रयोग केवल संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों द्वारा किया जा सकता है। इनमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, उपराज्यपाल और उच्च न्यायपालिका के अधिकारी शामिल हैं। इसके अलावा, अशोक स्तंभ का इस्तेमाल किसी भी आम नागरिक के लिए प्रतिबंधित है।
अशोक स्तंभ न केवल भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, समावेशिता और भारत की शक्ति और एकता का भी प्रतीक है। इसके द्वारा भारत ने अपनी शांति और सहिष्णुता की नीति को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत किया। यह स्तंभ भारतीय संस्कृति, इतिहास और धर्म का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, और आज भी इसका महत्व न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया में महसूस किया जाता है।

ट्रैवल स्टोरी और ये लेख थोड़ा लंबा हो गया है लेकिन इसके महत्त्व को देखते हुये काँट छांट की गुंजाइश बहुत कम थी। आशा है आपको ये जानकारी पसंद आएगी। तो जब भी अगली बार वाराणसी जाने का प्लान बने तो 2-4 घंटे का समय निकाल कर सारनाथ जरूर विजिट करें और भारत की अभूतपूर्व संस्कृति और प्रतीकों के उद्गम स्थल के बारे में जाने।
- कपिल कुमार
Travel With Kapil Kumar
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