“लवासा”

Tripoto
Photo of “लवासा” by Abhishek Sinha

टेढ़े-मेढ़े मोड़ से गुज़रे, गुज़रे पाँच सवाली थे

लेकर के गाड़ी हम निकले, हम तो यार मवाली थे

मीलों की दूरी रास्तों पर, पल भर में गुज़ारी जो

उन रास्तों पर हमने छोड़ी, पीछे यार निशानी थी।

बूंदों की रफ्तारों से जब हमने रेस लगाई थी

बादल के घर पहुँचे थे तब, हाँ बारिश भी शरमाई थी

गुस्से में थीं तेज़ हवाएं, झगड़ रही थी हम सब से

लेकर उनको दामन में अपने, हमने मोहोब्बतें बरसाईं थी

मट मैले पैरों से हमने, बादल की चादर गन्दी की

उसने भी हम सब को घूरा, फिर अपनी बौहें चोड़ी की

मस्ती में था वो भी कल तो, मेहमानों को इज़्ज़त दी

साथ में फिर हम सब के उसने, एक चाय की प्याली पी।

लौटे हैं घर को अपने, कापती हुई मुस्कान लिए

छोटी सी जेबों में अपने, लवासा का आसमान लिए

पहाड़ो के झरनों जैसे, बहते रहते हैं हम तो

फिर कभी निकलेंगे हम, यूँही अपनी पहचान लिए।

यारों के संग जब भी गुज़रो, रास्ते छोटे पड जाते हैं

हर एक पल में ना जाने, वो कितनी कहानियाँ दे जाते हैं

इस छोटी सी कहानी का, किस्सा बनकर खुश हूँ मैं

इन यारों की यारी का, हिस्सा बनकर खुश हूँ मैं।।

– कातिब

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