“मेहमान नवाज़ी”

Tripoto
Photo of by Abhishek Sinha

कहा था मुझसे की ध्यान से जाना

उस पहाड़ के पास ज़रा संभाल के जाना

वो ऊँचा बहोत है, उसकी अकड़ है ऊँची

जब भी जाना, तो एहतियात से जाना

वो हरा रंग पहनकर तुमको बहकाएगा

शोर झरनों के सुनाकर, मन को ललचाएगा

कही टेढ़े-मेढ़े कही कच्चे-पक्के हैं रास्ते

वो ऊंचाईयों पे लाकर, फिर तुमको डराएगा

मैं राज़ी हुआ सुनकर बातें ये उनकी

लेकर के बस्ता पहुँचा, वहाँ अगले दिन ही

मेरे साथ में, कुछ साथी मेरे थे

मेरी शैतानियों में वो भी शामिल हुए थे

बादशाहों के जैसा था उसका रुतबा

बादलों से गुजरकर, आसमान को छूता

उसके हर मोड़ पर कितने किस्से खड़े हैं

जहाँ कदम-दर-कदम, आज हम तुम चले हैं

उसने भी देखकर, लेने को हमको

ख़िदमत में लहरें भेजी थीं

फिर हाथ थाम बढ़े हम उसका

पहाड़ की मेहमान नवाज़ी ऐसी थी

अब साँस चढ़ी है और कदम थके हैं

आकर ऊपर, हम हैरान बड़े हैं

वादियों की आँखों मे लेकर तस्वीर

घर को हम फिर वापस आए हैं

जाते हुए मेहमानों को उसने

एक आखिरी तोहफ़ा और दिया

बादल ने गले लगाकर हमको

था फिरसे भिगोकर छोड़ दिया

अब

इस पहाड़ी मुलाक़ात की एक निशानी लिखूँगा

आपस मे हुई उन बातों को अपनी ज़ुबानी लिखूँगा

मेरे बाद भी जो आएगा उसके लिए

पूरे दिन की, कुछ शब्दों में, एक कहानी लिखूँगा।

– क़ातिब