“रेस”

Tripoto
Photo of by Abhishek Sinha

रेस लगी है शायद, सब दौड़े ही जा रहे हैं

पौहुचना कही है इनको या बस भागे ही जा रहे हैं

कुछ देर ज़रा ठहरो, यारों खुदसे भी तो मिलो

ये पल ज़िन्दगी के, बस कटते ही जा रहे हैं।

किस बात की है जल्दी, जो सुबह उठा रही है

किसके सपनो की खातिर, तुम्हे दफ्तर ले जा रही है

अब ख्वाहिशों को अपनी, जेबो से तो निकालो

उन्हें आईने में रखकर, चेहरे पर तुम सजा लो।

“रोज़ थक्कर आते हैं, पीछे छोड़ ऑफिस की गालियाँ

चंद घंटे खुदसे मिलते हैं, यूँही दिन गुज़र जाता है”

अगर पैसा कमाना ज़िद है, ये लाज़्मी हो कैसे?

चंद लम्हात ज़िन्दगी के, कागज़ पे भी उतारो

महसूस करनी होगी, अब धड़कने वो दिल की

जो परछाइयाँ हटाकर, रोशन सफर को कर दे।

इन बंद आइनों में, हैं क़ैद कुछ ये सपने

कमज़ोरियाँ मिटाकर, अब आज़ाद इनको कर दो

छोटी नहीं डगर ये, है दूर अब भी मंज़िल

हिम्मत पहन कर अब तो, तुम इस सफर पर निकलो।।

– कातिब