“मुम्बई”

Tripoto
Photo of “मुम्बई” by Abhishek Sinha

पहने थोड़े सपने पलकों पर

कुछ को रखकर बस्ते में

थाम में अरमानों की डोरी

चल मैं निकला रस्ते पे

दहलीज़ छुई मुम्बई की जब

हलचल कुछ दिल में तो मची थी

अंदर जो क़ैदी बैठा था

मुस्कान तभी उसकी भी खिली थी

लाखों लोगो की नगरी में

एक आवारा मैं भी आया हूँ

तन्हा रास्ते कैसे ये कटेंगे

संग अपने किस्से लाया हूँ

कहते इसको सपनो की नगरिया

चलते फिरते मैख़ाने हैं सब

झूम के अपनी मस्ती में ही

गुनगुनाते हुए तराने है सब

हफ़्ते भर तक की मारा-मारी

हफ्ते भर हम दर-दर भटके

खोज में अपने सर पर छत को

कभी इधर गिरे, कभी उधर गिरे

रेशम गली मोहल्ले सारे

जगमग ही हर बस्ती देखी

ज़िन्दगी की इस दौड़-भाग में

सपनों की छीना-झपटी देखी

काम में इतने उलझे हैं सब

खुदके लिए भी वक़्त नहीं

रहते साथ पडोसी की भी

एक दूजे को ज़रूरत ही नहीं

लोकल की झंकार सुनो तो

घटती बढ़ती एक बैचैनी है

अंजाने इन चेहरों में रहती

कहीं छुपकर मेरी निशानी है

एक बरसात ही अबतक हमने

बारिश के साथ तो खेला है

कुछ और साल गुजरने तो दो

तबतक अपना यहीं बसेरा है

एक शुरुआत हुई है आकर

इस नगरी की चौखट पर

रग-रग से होकर हम इसकी

अब अपनी पहचान बनाएंगे

पहने थोड़े सपने पलकों पर

कुछ को रखकर बस्ते में

थाम के अरमानों की डोरी

चल मैं निकला रस्ते पे।।

– कातिब

Be the first one to comment