यह चंबा है अचंभा 

Tripoto

A scenic view of Chamba Himachal Pradesh

Photo of यह चंबा है अचंभा by Afsarul haq

हिमाचल अपने सौन्दर्य के लिए बेहद मशहूर है, तभी तो यहाँ दूर दराज़ से सैलानियों का हुजूम बना रहता है। हिमांचल के आप किसी भी गांव में चले जाये वहां की ख़ूबसूरती हरी भरी वादी आपको यहाँ बस जाने के लिए कहेंगी।

Photo of यह चंबा है अचंभा  1/1 by Afsarul haq

ऐसा ही एक छोटा सा शहर है चंबा कल - कल बहती रावी और साहल नदियों के बीच बसा है चम्बा। गीतों - कहावतों में इसका नाम कई बार आया है। अगर आपने फिल्म "मेहबूबा" (1976 ) का गीत 'पर्वत के पीछे चम्बे डा गाँव' ज़रूर सुना होगा। आधुनिकता के रंग में रंग जाने के बाद भी यहाँ लोकरंग जीवंत नज़र आता है। यहाँ के देवी - देवता यहाँ की जीवनशैली में घुल मिल गए है। प्राचीन मंदिरों और उत्सवों को सहेजने की कला यहाँ के लोग बखूबी जानते है। सीमा पर बसे होने के कारण चम्बा में हिमाचल के साथ - साथ पंजाब, जम्मू और जनजातियों का भी प्रभाव देखने को मिलता है। कहते हो जो एक बार चम्बा गया वो फिर ? मज़ाक कर रहे है दरअसल जो यहाँ जाता है वह यहाँ की ख़ूबसूरती यहाँ के लोग और संस्कृति में इतना खो जाता है की महीनो यही गुज़ार देता है।

Photo of Khajjiar, Himachal Pradesh, India by Afsarul haq

स्विट्ज़रलैंड की खूबसूरत पहाड़ियां, चारों तरफ हरयाली, नदियां और झीलें दुनियाभर में मशहूर हैं। स्विट्ज़रलैंड के ततकालीन राजदूत यहाँ की ख़ूबसूरती से आकर्षित होकर 7 जुलाई 1992 को खजियार को हिमाचल प्रदेश का 'मिनी स्विट्ज़रलैंड' नाम दे गए। यहाँ का मौसम, चीड़ और देवदार के ऊँचे - लम्बे वृक्ष, हरियाली, पहाड़ और वादियां स्विट्ज़रलैंड का एहसास कराती हैं। हज़ारों साल पुराने इस हिल स्टेशन को खासकर खज्जी नाग मंदिर के लिए जाना जाता है। यहाँ नागदेव की पूजा भी होती है। स्वर्ग माने जाने वाले खजियार का एक बड़ा आकर्षण चीड़ - देवदार के वृक्षों से ढकी झील है। झील के चारों तरफ हरी - भरी मुलायम घास इस झील में चार चाँद लगा देती है। झील के बीच में टापूनुमा दो स्थान है। वैसे तो खजियार में तरह - तरह के रोमांचक खेलों का आयोजन किया जाता है, लेकिन गोल्फ के शौकीनों के लिए यह जगह ज़्यादा मुफीद है।

Photo of Dalhousie, Himachal Pradesh, India by Afsarul haq

अंगेज़ों के सशंके समय वर्ष 1854 में अस्तित्व में आया था चम्बा का यह पर्यटन स्थल। हालांकि चम्बा सहर से इसकी दुरी 192 किलोमीटर है, जो हिमांचल के बेहद आकर्षक पर्यटन स्थलों में से एक है, जहाँ खूबसूरत कुदरती नज़ारे आपको एक नयी उमंग से भर देंगे। प्राचीन मंदिर औपनिवेशिक इमारते,माल रोड, चर्च आदि में से कुछ को यादगार विरासतों में शुमार कर लिया गया है। यह स्थान पांच पहाड़ियों पर बसा है। अंग्रेज़ अधिकारी लार्ड कर्जन ने चम्बा के तत्कालीन राजा की मदद से इसे एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करवाया था। लार्ड कर्जन खुद कभी डलहौजी नहीं आये। इसके साथ नेताजी सुभासचंद्र बोस व साहित्य के लिए जाने वाले रविन्द्नरनाथ टैगोर जैसी हस्तियों का नाम भी जुड़ा है। कहा जाता है की नेताजी एक बार बीमार होने पर स्वस्थ लाभ के लिए यहाँ करीब छह माह तक रहे थे। वह जिस वावड़ी से पानी मांगकर पीते थे, वह गाँधी चौक से करीब एक किलोमीटर दूर स्थित है। बावड़ी का नाम भी 'सुभाष बावड़ी' रखा गया है। गाँधी चौक के पास ही बानी एक कोठी में नेताजी अपने मित्र के पास ठहरते थे। आज भी नेताजी से जुडी वस्तुए जैसे - कुर्सी , टेबल आदि यहाँ मौजूद है। कहते है रविंदनाथ टैगोर को अपनी सुप्रसिद्ध कृति 'गीतांजलि' को लिखने की प्रेरणा यही मिली थी।

Photo of Churah Valley resort, Himachal Pradesh, India by Afsarul haq
Photo of Churah Valley resort, Himachal Pradesh, India by Afsarul haq

चम्बा स्थित पांगी और चुराह घाटी वह स्थान है, जिन्हें कुदरत के हसीन नज़रों के बीच साहसिक पर्यटन और ट्रैकिंग के लिए विकसित किया जा रहा है। लोक संस्कृति, प्राचीन विधाओं और मान्यताओं से ओत - प्रोत पांगी घाटी मध्य हिमालय में स्थित है। इसकी ऊंचाई समुद्रतल से करीब 8 से 12 हज़ार फ़ीट तक है। देवदार, कैल, चीड़, अखरोट, भुज, ऐश, चिलगोजा, जामुन आदि के वृक्षो से पटे इस स्थान पर जाना किसी स्वर्गीय अनुभव से कम नही है। चुराह बागबानी के लिए भी मसहूर है। घाटी के लोग ज्यादातर बागबानी और कृषि पर ही निर्भर है। यहां सेब की भी अच्छी पैदावार होती है। चुराह घाटी में मौजूद सतरुंडी व साच पास सैलानियों की मनपसंद जगह है। इसकी वजह यहां पर भारी मात्रा में बर्फ का होना है। बर्फ से लदे यहां के पहाड़ और उसकी सुंदरता को देखने के लिए देश - विदेश से सैकड़ों सैलानी हर रोज़ यहां आते है। समुद्रतल से 14,500 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित साच पास पांगी घाटी को चंबा जिला मुख्यालय के साथ जोड़ने वाला सबसे कम दूरी वाला मार्ग है। इसी वजह से यहां आने - जाने वाली गाड़ियों से यह जगह गुलज़ार रहती है। चंबा जाने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन पठानकोट है। यहां से सड़क मार्ग से चंबा की दूरी 120 किलोमीटर है।

कुछ जानने योग्य बातें

राजा साहिल बर्मन ने चंबा नगर की स्थापना की थी। चंबा की राजधानी पहले भ्रमपुर (भरमौर) हुआ करती थी।

साहिल बर्मन ने बेटी चंपा के आग्रह पर चंबा को राजधानी बनाया।

उत्तर - पश्चिमी हिमालय के आंचल में बसा चंबा में शताब्दियों तक सूर्यवंशी बर्मन राजाओं का साशन रहा।

Photo of Bhuri Singh Museum, Chowgan Mohalla, Chamba, Himachal Pradesh, India by Afsarul haq

चंबा का भूरी सिंह संघरालय सहर और आसपास की समृद्द ऐतिहासिक विरासत से परिचय कराता है। संघरालय के प्रांगण में बुद्ध की मूर्ति स्थापित है। मुख्य भवन में स्थित संघरालय में चार गैलरियां हैं। इसमे से दो भूतल पर है और दो पहली मंजिल पर है। भूरी सिंह संघरालय का सबसे बड़ा आकर्षण है चंबा छेत्र की पनघट शिलाएं। पहाड़ों पर जो जल के स्त्रोत हुआ करते थे, उनके आसपास के पत्थरों पर कलाकार नक्काशी करके कई तरह के चित्र अंकित करते थे। इन शिलाओं को पनघट शिलाएं कहते है। यहां ऐसी 20 से ज़्यादा पनघट शिलाओं का संग्रह है। इनमे कई शिलाएं चुराह और तीसा छेत्र से ली गयी है। ज़्यादातर शिलाएं 16वी सदी की है। संघरालय के प्रथम तल पर मिनिएचर की सुंदर व आकर्षिक गैलरी है। कांगड़ा के राजा संसार चंद कटोच और चंबा के राजा राज सिंह के बीच हुई संधि का तांबे सके बना संधि पत्र भी यहां सहेजे हुए रखा है।

बहुत प्राचीन है यहाँ के बाजार

करीब एक हज़ार वर्ष से अधिक पुराने है चंबा के बाजार। यहाँ पर बनने वाली परंपरागत कला और कारीगरी वाली वस्तुए यहाँ हर जगह मिल जाती है। इसके अलावा यहाँ ज़रुरत की साड़ी चीज़े मिल जाती है। यहाँ आने पर आप अपने साथ निशानी के रूप में चंबा रुमाल, चंबा चप्पल, चंबा चुख, चंबा जरीस व पीतल के थाल आदि उचित मूल्य पर ले सकते है।

चप्पलों के लिए मशहूर बाजार

Photo of Chamba, Himachal Pradesh, India by Afsarul haq

चंबा ख़ास तरह की चप्पलों के लिए भी मशहूर है। और अब तो इसे आप ऑनलाइन भी खरीद सकते है। रजवाड़ो के ज़माने में चप्पलों को तैयार करने वाले कारीगर प्रसिद्द थे। वह राजाओं को उनकी मांग के हिसाब से तरह - तरह की चप्पलें उपहार में देते थे। चंबा के राजा अन्य रियासतों के राजाओं को भी उनकी मांग पर चप्पलें निर्यात करते थे। बताते है चप्पल के ऊपर कड़ाई होती थी। रेशम और तिल्ले की यह कढ़ाई काफी खूबसूरत हुआ करती थी। पर अब यह कम हो गयी है। अब कारीगरों ने चमड़े पर कड़ाई उकेरना शुरू क्र दिया है। यह मशीन की जगह हाथ से तैयार की जाती है। लेदर से बनने वाली चप्पल काफी लम्बे समय तक चलती है। एक चप्पल की कीमत काम से काम 350 रुपये होती है। वही रेशम व तिल्ला की डिज़ाइन वाली चप्पलें आपको अमूमन 300 रुपये में मिल जाएँगी।

चटकारे ले चुख व जरीस के तीखे स्वाद के

Photo of Chamba, Himachal Pradesh, India by Afsarul haq

चम्बा आये और चुख व जरीस का स्वाद न ले ऐसा तो हो ही नहीं सकता, एक बार खाने के बाद इसके स्वाद को आप भूल नहीं पाएंगे। जो लोग यहाँ आते है वह इसका स्वाद नहीं भूल पाते और लोग इसे अपने साथ पैक करकर भी ले जाते है। चुख लाल और हरी मिर्च से बनाई जाती है, जो बेहद तीखी होती है और इसका स्वाद बढ़ाने का काम करती है। तीखा - और चटपटा खाने वाले लोग इसे बेहद पसंद करते है, खस्सकार महिलाये इसे कुछ ज़्यादा ही मज़े के साथ खाती है। इसको बनाए में सुखी लाल मिर्च, गलगल का रस, जीरा, मीठी सौंफ, अजवाइन, नमक, अदरक, कद्दूकस की गयी सुखी मूली का इस्तेमाल किया जाता है। इसे सरसों के तेल में पकाते है। पकने के बाद ठंडा होने पर इसमें थोड़ा गुड़ भी मिलाते है। इसी तरह जरीस में कद्दूकस की हुई गरी,सोंफ, बड़ी व छोटी इलायची के दाने और मिसरी का इस्तेमाल किया जाता है। चुख व जरीस को अन्य राज्यों में भी भेजा जाता है।

कैसे पहुंचे। ............................

हवाई मार्ग से जाने के लिए आप पठानकोट एयरपोर्ट, अमृतसर एयरपोर्ट, चंडीगढ़ एयरपोर्ट से जा सकते है जिनकी चंबा से दुरी क्रमशः 120 किलोमीटर, 220 किलोमीटर व 400 किलोमीटर है। यहां का नज़दीकी एयरपोर्ट जम्मू है जिसकी चंबा से दुरी 120 किलोमीटर है।

रेलमार्ग से जाने के लिए आप पठानकोट स्टेशन पर उतर सकते है यहाँ से चंबा की दुरी 120 किलोमीटर रह जाती है। जिसे आप किसी भी बस या टैक्सी की सहायता से पहुँच सकते है।

सड़कमार्ग से जाने के लिए आप दिल्ली, पंजाब और हरयाणा से डायरेक्ट बस से जा सकते है। इन राज्यों से हिमाचल प्रदेश की सरकारी बस भी जाती है जिससे आप किफायती दामों में और सुरक्षित पहुँच सकते है।

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