भाग-1 : कलिम्पोंग से दार्जीलिंग पैदल सफर

Tripoto
Photo of भाग-1 : कलिम्पोंग से दार्जीलिंग पैदल सफर by Kritesh Patel
Day 1

राहुल सांकृत्यायन से लेकर अज्ञेय, मधु कांकरिया और तमाम यायावरों की सैकड़ों कहानियाँ नाच रही थी उस वक़्त मेरे दिमाग में। स्कूल से जैसे तैसे पास होकर अब मैं विश्वविद्यालय आ चुका था। जेहन में एक ही ख़याल था कि अब बस मधु कांकरिया ने जिस गंतोक के बारे में 'साना साना हाथ जोड़ी' में बताया है उस गंतोक को देखना है। राहुल जी ने जिस हिमाचल की अनेकों कहानियाँ और दार्जीलिंग के बारे में लिखा है उसे खुद महसूस करना है। अज्ञेय ने अपने 'अरे यायावर रहेगा याद' में जिन उत्तर-पूर्व राज्यों के बारे में अपने वृतान्त साझा कए हैं उन उत्तर-पूर्व राज्यों को देखना है।

अब बस यही से शुरू हुई मेरी कहानियाँ। छोटी, टूटी, थोड़ी सी कहानियाँ। इस सिलसिले में पिछले साल पश्चिम बंगाल में अपने एक दोस्त के घर 'उत्तर दिनाजपुर के रायगंज' में दुर्गा पूजा के वक़्त जाना हुआ। रायगंज खुद में भी एक बहुत ही खूबसूरत जगह है। जंगलों, तालाबों से घिरे इस जगह पहुँचने के लिए कुछ रेलगाड़ियाँ भी जाती हैं। जो राधिकापुर, बांग्लादेश की सीमा तक जाती हैं। कुछ नहीं तो मालदा से दो घण्टे के बस सफर से भी यहाँ पहुँचा जा सकता है।

बंगाल के दुर्गा पूजा की ख्याति जग जाहिर है। इसकी भव्यता देखने के बाद अब मैं सोच रहा था कि कॉलेज शुरू होने में अभी कुछ हफ़्ते बचे हैं ऐसे में और कहाँ जाया जा सकता है। अब चूँकि दार्जीलिंग बंगाल के सबसे करीबी हिल स्टेशनों में से एक है तो अंततः यही की योजना बन गयी।

मैं और मेरा एक दोस्त, रबी अगले दिन सुबह की बस से सिलीगुड़ी के लिए निकले। हम दोनों साथ में नहीं निकल पाए, वजह ये था कि रबी को बस अड्डा पहुँचने में देर हो गयी और बस निकल गयी। वो आधे घण्टे बाद कि एक बस पकड़ा और सिलीगुड़ी के लिए निकला।

रायगंज से सुबह में हर आधे घंटे पर बसें सिलीगुड़ी के लिए चलती रहती हैं, जो करीब तीन-चार घण्टे में सिलीगुड़ी पहुँचा देती हैं।

बस लगभग खाली ही थी। बैठे बैठे अनेकों ख़याल आ रहे थे। आखिर अब मैं भी दार्जीलिंग जा रहा था। जिस जगह पर राहुल सांकृत्यायन ने अपनी ज़िंदगी की आख़िरी सांस ली उस जगह मैं जा रहा था। बस की खिड़की से मैं धान के खेतों के पार निकल रहे सूरज को साफ साफ देख सकता था। अक्टूबर की उस सुबह सूरज की नारंगी रोशनी बस में फैल रही थी। फोटो लेने के लिए मैंने अपने बैग में रखा अपना फ़ोन निकाला और कुछ फोटोज़ लेने के बाद ऐसे ही सोचने लगा कि क्यों न दार्जीलिंग के अलावा उसी के आस पास घूमने की कुछ और जगहें देख लें। कुछ देर में 'कलिम्पोंग' नाम से एक जगह आया। थोड़ा उसके बारे में जानने की कोशिश की तो पता चला कि जगह भी बेहद खूबसूरत है। पुराने वक़्त में अंग्रेज़ दार्जीलिंग के बाद इस जगह आना पसंद करते थे। यही नहीं, कलिम्पोंग भारत-तिब्बत व्यापार का एक मुख्य अंग था। तिब्बत से आते व्यापारी यहाँ पर अपना व्यापार करते थे। इसी वजह से यह जगह धीरे-धीरे नेपालियों के लिए भी व्यापार का एक गढ़ बन गया।

हमारे लिए तो सबसे अच्छी बात ये थी कि यहाँ से दार्जीलिंग मात्र पचास किलोमीटर पर है जहाँ आसानी से जा सकते हैं। अब चूँकि वक़्त बहुत था तो अंदर ये ख़याल आया कि क्यों ना पहले कलिम्पोंग चलें और फिर वहाँ से दार्जीलिंग।

सिलीगुड़ी बस स्टैंड पर पहुँच कर मैं रबी का इंतज़ार करने लगा। थोड़ी देर में वो पहुँचा तो उसे मैंने इस जगह के बारे में बताया। अब मेरे जैसा ही ख़लीहर आत्मा वो भी ठहरा। पलक झपकते ही वो भी मान गया। फिर क्या था, फैसला हो चुका था। पहले हम दोनों कलिम्पोंग जाएँगे और फिर वहाँ से दार्जीलिंग, सूमो से।

किराया कोई 120 रुपये था जिसे चुकाने में हमे कोई ज्यादा तकलीफ महसूस नहीं हुई। टिकट लेकर हम ट्रैवलर की सबसे पीछे मिली सीट पर बैठ गए। अब चूँकि हम दोंनो में से पहले कोई इस जगह नहीं गया था तो हमे पता ही नहीं चल रहा था कि हमारी गाड़ी किस रास्ते से जा रही है। पर हाँ, इतना तो पता था कि हमारी गाड़ी पहाड़ों के रास्ते जा रही है। थोड़ी देर बाद जब हमलोग थोड़ा उचक कर देखे थे तो नीचे पहाड़ों के पैरों तले बहती तीस्ता दिखी। मैं पहले एक बार सिक्किम जा चुका था तो मैं झट रबी को बताया कि भाई नीचे तीस्ता है। छोटे बड़े पत्थरों के बीच से बहती तीस्ता पन्ना सरीखा दिख रही थी। उसके दोनों तरफ ऊँचे-ऊँचे हरे-घने पहाड़। कई-कई जगहों पर तो नदी बहुत नीचे और चौड़ी, शाँत दिख रही थी। जी ऐसा हो रहा था कि अब बस से उतरकर नदी किनारे पहुँच जाए। डुबकियाँ मारे इस खूबसूरत नदी में। ये सोच कर ही रोम रोम खुशी से रोमाँचित हो रहा था। ऐसा हो रहा था कि क्यों न इस खूबसूरत सी बहती शाँत तीस्ता को छू लें।

मेरे मन में एक ख्याल आया। मैं खुद से भी ज्यादा रोमांचित रबी की तरफ देख कर बोला, "भाई! कलिम्पोंग से दार्जीलिंग 50 किलोमीटर है। अगर हम दोनों एक दिन में 15 किलोमीटर भी चले तो तीन दिन में पहुँच जाएंगे। मेरी तरफ देख कर रक़बी बोला, "क्या बात कर रहा है, पैदल चलेगा?"

"हाँ" मेरा जवाब था। "ठीक है, तीस्ता में नहाएँगे", रबी मान गया। उसके मुंह से अपने मन की बात निकलता देख मैं हँसने लगा। अब इरादा ये था कि एक दिन हमदोनों कलिम्पोंग में रुकेंगे और फिर वहाँ से दार्जीलिंग निकल जाएँगे, पैदल।

P.S. आगे का वृतान्त अगले ब्लॉग में

रायगंज की दुर्गा पूजा

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रायगंज भव्य दुर्गा पंडाल

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दिन में छोटी जनजातियों का नृत्य

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रायगंज का भव्य दुर्गा पंडाल

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रायगंज का दुर्गा पंडाल

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कलिम्पोंग से दार्जीलिंग पैदल जाते समय रात का दृश्य

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रायगंज का दुर्गा पंडाल

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रायगंज में आख़िरी दिन का 'सिनुर-खेला'

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कलिम्पोंग

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कलिम्पोंग से दार्जीलिंग पैदल जाते समय रात का दृश्य

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2 Comment(s)
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Beautifully written ❤️
Sun 09 29 19, 12:50 · Reply · Report
Bhoot Sundar kritesh❤️
Sat 09 28 19, 22:23 · Reply (1) · Report
Sat 09 28 19, 22:44 · Report

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