दिल्ली का वो शिकारगाह जिसे वक्त ने भूतिया महल में बदल दिया: भूली भटियारी का महल

Tripoto
Photo of दिल्ली का वो शिकारगाह जिसे वक्त ने भूतिया महल में बदल दिया: भूली भटियारी का महल by Shubhanjal
Day 1

अक्सर इंटरनेट के माध्यम से कुछ नई जगहों को तलाशकर वहाँ जाने का प्रयास करता रहता हूँ। एक वक्त पहले ऐसे ही इंटरनेट पर दिल्ली की शीर्ष दस भूतिया जगहों वाली एक पोस्ट को पढ़ रहा था, और वहाँ मेरा ध्यान गया एक नाम पर-'भूली भटियारी का महल।' बाकी नौ नामों ने मुझे कुछ खास आकर्षित नहीं किया क्योंकि उनमें से अधिकतर वैसे नाम थे जहाँ मैं पहले ही जा चुका था। हालाँकि तब मुझे मालूम नहीं था कि वो जगहें भी भूतिया इलाकों में आती हैं। अगली बार ध्यान रखूँगा।

खैर, पिछले दिनों एक इवेंट में भाग लेने के सिलसिले में मेरा और मेरे एक साथी का दिल्ली के ही पटेल नगर स्थित एक कॉलेज जाना हुआ। इवेंट शाम 4 बजे समाप्त हुआ तो ख्याल आया कि साथ वाले भाईसाहब दिल्ली से ज्यादा परिचित नहीं। मैं खुद भी बड़े दिनों बाद इस ओर आया हूँ, तो क्यों न आगे करोल बाग में संकटमोचन मंदिर स्थित हनुमान जी की वो 108 फीट ऊँची विशालकाय मूर्ति देख आएँ। टहलने का इरादा था तो पैदल की पटेल नगर से करोल बाग की ओर बढ़ गए। हम चलते गए, चलते गए और फिर दिखी हनुमान जी की वो मूर्ति। मूर्ति की कुछेक तस्वीरें लेने के बाद हम आगे बढ़ने के लिए सड़क पार कर ही रहे थे कि मेरी नजर पीछे झाड़ियों के बीच एक बोर्ड पर पड़ी जिसपर लिखा-'भूली भटियारी ज़ोन।' बोर्ड पढ़ते ही ध्यान आया कि ये जगह तो वही है जिसकी भूतिया कहानी के बारे में मैंने इंटरनेट पर पढ़ा था। भूत का नाम सुनते ही मन में उत्सुकता जागी और हम चल दिये 'भूली भटियारी' महल की ओर।

महल जाने के लिए एक रास्ता मुख्य सड़क से हल्की चढ़ाई के साथ ऊपर की ओर जाता है, जहाँ जैसे-जैसे आपके कदम आगे बढ़ते हैं, सड़क की बदहाली भी बढ़ती जाती है। हम जैसे-तैसे आगे बढ़ रहे थे कि पेड़ों और झुरमुटों के पीछे कुछ कंस्ट्रक्शन दिखा, जिसे कुछ देर निहारने के बाद हमें होश आया कि भूली भटियारी का महल वही है। चारों ओर काँटों भरे पेड़-पौधों के बीच महल का मुख्य द्वारा बेहद खूबसूरत लग रहा था। खैर, उसे खूबसूरती और अधिक खूबसूरत लगने लगी जब हम उससे होकर अंदर गए, क्योंकि अंदर कुछ था ही नहीं। वीरानी ही छाई थी चारों ओर। कुछेक सीढ़ियों पर नजर गयी तो उनपर चढ़कर हम ऊपर की तरफ गए, मगर वहाँ भी ऐसा कुछ नहीं था जिसे मैं कुछ खास बोल सकूँ। जब कुछ नहीं मिला वहाँ, तो हमनें दीवारों के पीछे, पेड़ों के नीचे, गड्ढों में, चूहे की बिलों में, हर तरफ छानबिन कर डाली, इस उम्मीद में कि कहीं तो भूत की एक झलक मिल जाये। खैर, ऐसा कुछ मिला नहीं हमें। पीछे घना जंगल था बस। और ऐसा माना जाता है कि इस भूली भटियारी महल का निर्माण एक शिकारगाह के रूप में ही किया गया था। जब बड़े-बड़े नवाब और बादशाह इस ओर शिकार करने आते तो यहीं ठहरा करते थे। यही वजह थी कि इसमें विश्राम भर के लायक व्यवस्था थी, और कुछ भी नहीं। चौदहवीं शताब्दी में फिरोजशाह तुगलक के शासनकाल में निर्मित इस जगह का नाम 'बु-अल-भट्टी' के नाम पर प्रसिद्ध है।

मगर एक सवाल ये आता है कि जब सब इतना खाली-खाली है तो फिर वहाँ ये भूत वाली कहानी आई कहाँ से? कुछ लोग कहते हैं वहाँ किसी के रोने की आवाज़ आती है (हर दूसरी भूतिया स्टोरी का यही रोना है), कोई कहता है कि घोड़ों की टाप सुनाई देती है (ये नया था), और कुछ ऐसी भी खबरें उड़ती है कि वहाँ शाम के बाद जो जाता है, वो वापस नहीं आता। इस अंतिम कहानी पर मैं थोड़ा विश्वास कर सकता हूँ क्योंकि उस इलाके में मुझे कुछ पियक्कड़ दिखे थे। उनमें से ही कोई कभी रात के समय वहाँ चला गया होगा और भूली भटियारी महल के छोटे किनारों से टकरा पीछे जंगलों में गिर पड़ा होगा। वहाँ पीछे जंगल से गायब हुआ हो तो अलग बात है क्योंकि पीछे के जंगल ऊपर से ही देखने में आपको ऐसे महसूस हो जायेंगे कि इसमें जो अंदर फँसा, वो सही सलामत तो बाहर नहीं ही आएगा। उसकी जिंदगी का बरमूडा ट्राएंगल ही होना है फिर।

खैर, जो भी बात हो, सच्ची हो या ऐसी ही उड़न-खटोलों-सी, मुद्दा ये है कि वहाँ ऐसा कुछ खास है नहीं कि आप दोस्तों के साथ प्लान बनाकर पिकनिक मनाने पहुँच गए। जितना है, वो आपको इन तस्वीरों में दिख जाएगा। हाँ, अगर आप भी मेरी तरह कुछ-न-कुछ डिस्कवर करने की फिराक में रहते हैं, तब एक चक्कर लगा लेने में कोई हर्ज नहीं। एक चीज मैंने महसूस की कि ये जगह तस्वीरें खिंचवाने के लिहाज से तो काफी अच्छी है। बड़े बरामदे और छोटे कमरे इस मामले में तो आपके कैमरे की शान बढ़ा सकते हैं।

वैसे, पुलिस उस ओर की एंट्री शाम 6 बजे के बाद बन्द कर देती है। जिस रास्ते का मैंने शुरू में जिक्र किया, वहाँ पुलिसिया बैरिकेडिंग हो जाती है। लोगों की आवाजाही साफ बन्द है वहाँ। महल के बाहर 'सूर्यास्त के बाद प्रवेश वर्जित' जैसा भी कोई बोर्ड लगा था। खैर, जबतक हम थे, हमें डर नहीं लगा। भूत नहीं दिखा, अफ़सोस हुआ इस बात का। दिख जाता तो आपलोग हमपर अफ़सोस करते। पर वाकई कुछ डरावना नहीं था वहाँ। पर खोजी प्रवृति आपको नई जगहों की ओर ले जाती है, तो जरूर जाईये यहाँ। नई जगहों की तलाश करके लोग आगे ही बढ़े हैं, आप भी बढ़ चलिये...

कैसे जाएँ?:- निकटतम मेट्रो स्टेशन झंडेवालान से लगभग 800 मीटर दूर। ई-रिक्शा ले सकते हैं।
समय:- सबसे अच्छा समय सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक
एंट्री फीस:- निःशुल्क

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