केसर पिस्ते से भरे बैग की कश्मीर से मुंबई की यात्रा

Tripoto
11th Feb 2022
Photo of केसर पिस्ते से भरे बैग की कश्मीर से मुंबई की यात्रा by Poorvi S


प्रसंग मार्च 2021 का है। कोविड महामारी से जूझते हुए देश व दुनिया को लगभग एक साल होने जा रहा था और वाइरस की प्रथम लहर विश्व को झकझोर कर अब थमती हुई सी प्रतीत हो रही थी। इन्ही दिनों मेरे अंदर का भ्रमण-प्रिय पंछी, जो की साल भर से घर के भीतर बंद था, पंख फैलाने लगा। एक शाम पति परमेश्वर जी से चाय पर चर्चा हुई, कुछ ट्रैवल वेबसाइट्स की तल्लीनता से पड़ताल की गयी, और रात होते होते हमने कश्मीर भ्रमण करने का मन बना लिया। अब जब मन बन गया तो टिकटें होने मे कितना ही समय लगता है!
हवाओं मे सुर्खी और डगालों पर रंग बिरंगे फूल लिए मार्च आया और दिन-दिन कर हमारी यात्रा की तारीख भी आ गयी। कश्मीर की धरती पर पैर रखते ही समझ आया की इस जगह को धरती का स्वर्ग क्यूँ कहा जाता है। चहुं-ओर मनोरम वादियों और पहाड़ों के दृश्य थे, गुदगुदाती हुई ठंड थी, और इसी तरह हमारी यात्रा का वो एक हफ्ता आगे सरकने लगा। इसी हफ्ते के साथ कोविड वाइरस के केसेस में भी दोबारा बढ़ोतरी होने लगी थी।
यात्रा के आखिरी दिन हम सोनमार्ग नाम के एक छोटे से हिल-स्टेशन से श्रीनगर के लिए निकले। रास्ते लगभग 3 घंटो का था और आज शाम ही हमारी मुंबई के लिए फ्लाइट थी। श्रीनगर एयरपोर्ट पहुँच कर जब हम अपने बैग स्केनिंग मशीन में डालने लगे तब अचानक पाया की वह बैग, जिसमे हमने नायाब कश्मीरी केसर और पहाड़ी मेवे, पिस्ते, इत्यादि की खरीद रखी थी, वह तो सोनमार्ग के होटल मे ही छूट गया है! दिल को जैसे मायूसी के तूफान ने घेर लिया। आखिर इतना बेशकीमती और शुद्ध केसर और पहाड़ों की मिठास से भरपूर पिस्ते और बेरियाँ मुंबई मे कहाँ मिल पाती हैं। गुमसुम से हम दोनों रात तक मुंबई पहुँच गए।
अगले दिन मैंने सोनेमार्ग के होटल मे फोन किया और एक भूरे बैग की पूछताछ की। पता चला की वह बैग होटल के स्टाफ ने अपने संरक्षण मे रख लिया था। मैंने होटल के मैनेजर से विनती की कि उस बैग को मेरे मुंबई के पते पर कूरियर करवा दें। जनाब ने फरमाया कि सोनमार्ग में पोस्ट ऑफिस नहीं है, परंतु यदि मैं गांडरबल जिले के पोस्ट ऑफिस मे बात करूँ तो वे बैग का ‘pick-up’ करवा सकते हैं।  दिक्कत ये हुई कि अब तक देश भर मे कोविड वाइरस की द्वितीय लहर अपना जाल फैला चुकी थी, कई जिलों और प्रदेशों से स्थायी ‘lockdowns’ घोषित कर दिये थे। गांडरबल के पोस्ट ऑफिस ने बतलाया कि हाल-फिलहाल आवाजाही पर प्रतिबंध लगाए गायें हैं, जिस कारण सोनेमार्ग से बैग उठवाने में कुछ दिन लग जाएंगे।
मैं कई दिनों तक गांडरबल पोस्ट ऑफिस और सोनमार्ग के होटल मैनेजर से बात करती रही। परंतु उस अकल्पनीय द्वितीय लहर ने पूरे देश को निस्तब्ध कर दिया था। हफ्ते बीतते रहे और मेरी वह बैग दोबारा पाने कि उम्मीद क्षीण होने लगी थी।
तभी एक दिन पोस्ट ऑफिस से फोन आया, उन्होने मेरा बैग सोनेमार्ग से उठवा लिया था और मुंबई प्रेषित करने के लिए मेरा पता पूछ रहे थे। आखिरकार एक महीने के बाद मेरा भूरा बैग अपनी कश्मीर यात्रा पूरी करने मुंबई कि ओर चल दिया था! स्थायी ‘lockdown’ लगे होने के कारण, प्रेषित करने के 3 हफ्तों के बाद उस बैग ने मेरे घर का द्वार खटखटाया। लालायित होकर जैसे ही बैग कि चैन खोली, और केसर की सभी डिब्बियों और पिस्ते-मेवे के पेकेट्स तो जस का तास पाया तो मैं दूर दराज रहने वाले कश्मीरियों की ईमानदारी की मुरीद हो गयी। काफी आसानी से उस बहुमूल्य 40 ग्राम केसर को चोरी किया जा सकता था, परंतु ऐसा नहीं हुआ। इस वाकये ने इतने ठंडे क्षेत्र मे रहने वाले कश्मीरियों के दिलों की गर्माहट से मुझे रूबरू करवा दिया था। उस दिन कश्मीरी बेरियाँ जब खाई, तो मिठास कुछ अधिक ही प्रतीत हुई।

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