मुसलमान कारीगर द्वारा निर्मित दाढ़ी मूंछ वाले बालाजी मंदिर को आखिर इतनी मान्यता क्यों है।

Tripoto
24th Aug 2022
Photo of मुसलमान कारीगर द्वारा निर्मित दाढ़ी मूंछ वाले बालाजी मंदिर को आखिर इतनी मान्यता क्यों है। by Lucky Goyal
Day 1

राजस्थान के चुरू जिले में हनुमान जी का एक प्रसिद्ध मंदिर है जो सालासर बालाजी के नाम से जाने जाता हैं।
बाला जी जितने चमत्कारी है उतने ही  भक्तों की मनोकामना पूरी करने वाले हैं
तोबालाजी के एक भक्त थे मोहनदास। इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर बालाजी ने इन्हे मूर्ति रूप में प्रकट होने का वचन दिया। अपने वचन को पूरा करने के लिए बालाजी नागौर जिले के आसोटा गांव में 1811 में प्रकट हुए। आज हम आपको बताते है सालासर बालाजी को चूरमा का भोग क्यों लगाया जाता है।
आसोटा में एक जाट खेत जोत रहा था तभी उसके हल की नोक किसी कठोर चीज से टकराई। उसे निकाल कर देखा तो एक पत्थर था। जाट ने अपने अंगोछे से पत्थर को पोंछकर साफ किया तो उस पर बालाजी की छवि नजर आने लगी। इतने में जाट की पत्नी खाना लेकर आई। उसने बालाजी के मूर्ति को बाजरे के चूरमे का पहला भोग लगाया। यही कारण है कि बाला जी को चूरमे का भोग लगता है। पूरे भारत में एक मात्र सालासर में दाढ़ी मूछों वाले हनुमान यानी बालाजी स्थित हैं। इसके पीछे मान्यता यह है कि मोहनराम को पहली बार बालाजी ने दाढ़ी मूंछों के साथ दर्शन दिए थे। मोहनराम ने इसी रूप में बालाजी को प्रकट होने के लिए कहा था। इसलिए हनुमान जी यहां दाढ़ी मूछों में स्थित हैं।बालाजी के बारे में एक बड़ी रोचक बात यह है कि इनके मंदिर का निर्माण करने वाले मुसलमान कारीगर थे। इनमें नूर मोहम्मद और दाऊ का नाम शामिल है।बालाजी की धुणी को भी चमत्कारी माना जाता है। कहते हैं बाबा मोहनदास जी ने 300 साल पहले इस धुनी को जलाई थी जो आज भी अखंडित प्रज्जवलित है।सालासर में बालाजी के आने के काफी सालों बाद यहां माता अंजनी का आगमन हुआ। कहते हैं कि बालाजी के अनुरोध पर माता अंजनी सालासर आई। लेकिन उन्होंने कहा कि वह साथ में नहीं रहेंगे इससे पहले किसकी पूजा होगी यह समस्या हो सकती है। इसलिए बालाजी की माता का मंदिर बालाजी मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित है। इस मंदिर में अंजनी माता की गोद में बालाजी बैठे हैं अब बात करते है की सालासर कैसे आए जाए।
राजस्थान की राजधानी जयपुर से लगभग 170 किलोमीटर दूर  श्री सालासर बालाजी का मंदिर  स्थित है। दिल्ली से करीब335 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
अप्रेल माह में यहां हनुमान जयंती और अक्टूबर में शरद पूर्णिमा का बहुत ही भारी मेला लगता है। बताया जाता है कि मेले के दौरान यहां दर्शन हेतु 6 किलोमीटर तक लंबी लाइन लग जाया करती है।
मंदिर के अंदर प्रवेश करते ही आपको यहां प्रसाद की दुकाने दिखायी देंगी जहां आप सवामनी का प्रसाद प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए सवामनी के पैसे जमा करवा दिए जाते हैं और तुरंत सवामनी आपको मिल जाती है। ये सवामनी चूरमा, लड्डू, बर्फी, बेसन की बर्फी की होती है
यहां मुंडन करवाने का भी रिवाज है। छोटे बच्चे जब उनके पहली बार बाल उतारे हैं वो भी यहाँ उतारे जाते हैं। जिसे यहां स्थानीय भाषा में जडूला कहा जाता है।बहुत सारे लोग दूर दूर से यहां आते हैं और बच्चों का जडूला करवाते हैं।

कई लोग टोली बनाकर बस भरकर तो कुछ अपने पूरे परिवार के साथ यहां सालासर बालाजी धाम पहुंचते हैं।
अन्य मंदिरों की तुलना में यहाँ स्वच्छता की स्थिति काफी अच्छी है। जितने भी यात्री यहां आते हैं यहां मंदिर की स्वच्छता और साफ सफाई को लेकर संतुष्ट होकर जाते हैं और काफी प्रशंसा भी करते हैं।

यहां की सड़के चाक चौबंद है। धर्मशालाओं की स्थिति बेहद ही अच्छी है साथ ही यहां के स्थानीय लोगों का बर्ताव, इनकी एकता और समरसता इस स्थान की लोकप्रियता को दिन दूनी रात चौगुनी की ओर ले जा रही है।

ये एक ऐसा दरबार है जहां लोग बहुत ही दूर दूर से आते हैं और पूरी श्रद्धा से आते हैं। जब यहां श्रद्धा भाव से आये और सद्भाव ना मिले तो मन में एक सुकून नहीं होता। इस जगह की सद्भावना बहुत ही पवित्र है और लोग यहां बड़े मन से और चाव से यहां दर्शन करते हैं।
मंदिर परिसर में ही एक हाॅल है जहां हर समय हनुमान चालीसा और सुंदर कांड आदि का पाठ चलता रहता है। भक्त यहां आ सकते हैं, बैठ कर सुंदर कांड का पाठ कर सकते हैं। यहां पर किए हुए पाठ की शक्ति आपको मिलेगी। आप हमेशा अपने जीवन की बाधाओं को दूर करेंगे।
पांच मिनट रुक कर यहां पाठ अवश्य ही करना चाहिए इसका आनंद आपको जरूर मिलेगा। माना जाता है कि अगर सालासर बालाजी सरकार है तो ये धूनी सुप्रीम कोर्ट है। इस धूनी पर धोक लगाए बिना यात्री की यात्रा सफल नहीं मानी जाती। यहां की व्यवस्था ऐसी है कि मंदिर में आने से पहले धोक लगाओ और जाते समय धूनी को प्रणाम करो। इस धूनी की भभूत हजार बीमारियों और रोगों की संजीवनी मानी जाती है।

जो कोई भक्त इस भभूत को श्रद्धा से लेता है तो हजार प्रकार के रोग और पाप कटते हैं, मन शांत होता है। बहुत से लोग लोहे की कील ले कर आते हैं और इस धूनी के चारों ओर घुमाकर अपने घर ले जाकर चारो कोनों में गाड़ देते हैं। बताया जाता है कि इससे घर में एक सकारात्मकता आती है।

भक्त इस धूनी मे प्रसाद का भोग लगाते हैं और इसकी परिक्रमा करते हैं एवं यहां की भभूत प्रसाद स्वरूप अपने घर ले जाते हैं।
आज आप लोगो के साथ मैंने सालासर बालाजी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी सांझा की।मुझे आशा है की आप लोगो को ये जरूर पसंद आएंगी। धन्यवाद
हर हर महादेव।

Photo of Salasar by Lucky Goyal
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