सुकून चाहिये? नवंबर के टाइम देवरिया ताल जाओ

Tripoto
11th Nov 2020
Day 1

हिमालय किसको नहीं पसंद है!

मुझे तो साल 2016 के दौरान ही हिमालय के प्रति विशेष आकर्षण शुरू हुआ था, जो अब समय के साथ और मजबूत होता जा रहा है। 2016 के दौरान ही मैंने पहली बार ट्रेकिंग शब्द सुना था और उसी साल मार्च के महीने में होली की छुट्टियों के दौरान 8 दिनों का एक लंबा ट्रेक किया था। खैर उस लंबे ट्रेक की कहानी फिर कभी। अभी फिलहाल ज़्यादा भूमिका न बनाते हुए सीधे देवरिया ताल ट्रेक की तरफ बढ़ते हैं।

10 नवंबर, 2020

डिनर करने के बाद रोज की तरह उस दिन भी मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ चाय पीने के लिए निकला ही था कि मेरे साथ में चल रहे मेरे एक दोस्त ने बोला। यार कबीर, ऐसा लगता है ये पूरा साल इस लॉकडाउन और अनलॉक में ही निकल जाएगा। मन परेशान से हो रहा है, कहीं घूमने चलते है न। मुझे तो पहाड़ों की याद आ रही है। अब तो लॉकडाउन अनलॉक भी होने लगा है, बसें भी चलने लगी हैं और उत्तराखंड भी सैलानियों के लिए खुल चुका है। चलते हैं न कहीं।

बस इतना सुनने की देर भर थी, मैं भी तो जैसे कहीं बाहर निकल जाने के लिए बेचैन था। लॉकडाउन के दौरान ही गूगल बाबा से मुझे देवरिया ताल ट्रेक के बारे में पता चला था। वो अँग्रेजी में कुछ कहते हैं न 'Love at first sight' टाइप का! हाँ वही, देवरिया ताल की फ़ोटो देखकर ऐसा ही कुछ मुझे हो गया था। उसी टाइम मैंने ठान लिया था कि जैसे ही लॉकडाउन में थोड़ी ढील मिलेगी, मेरी पहली ट्रिप देवरिया ताल की होगी।

देवरिया ताल और उसके पीछे चौखंबा पीक

Photo of सुकून चाहिये? नवंबर के टाइम देवरिया ताल जाओ by KavindraKabir
Day 2

मैंने भी चलने के लिए हामी भरते हुए अपने दोस्त को ताल की फ़ोटो दिखाई तो वो भी चलने के लिए तैयार हो गया। बस फिर क्या! अगले दिन यानी 11 नवंबर की रात की टिकट बुक कर दी गई और 12 नवंबर की शाम हम सारी विलेज (Sari Village) थे जहाँ से देवरिया ताल का ट्रेक शुरू होता है। यदि हम ट्रेकिंग पर पहली बार निकल रहे हैं तो लाजमी है इसके बारे में हमारे मस्तिष्क में विचारों की लहरें उमड़ेंगी।

ट्रेक शब्द भी अपने आप में बहुत कुछ संजोए हुए है।

 ट्रेकिंग का अर्थ ही है 'पगडंडियों के बीच तमाम रुकावटों को पार करते हुए आगे बढ़ना'। नवांकुर कवि व हिमप्रहरी विनोद कुमार 'विमल' की कविता - 'पगडंडियों के बीच।' को पदक समझते है।

प्रयासरत हो! उठने को!
बार-बार और लगातार
नाकाम कोशिशों के बीच
गिरते-पड़ते अंततः सफल हो ही गया
मैं अपने बार-बार
गिरकर उठने की प्रक्रिया में!
आश्वश्त भी हूँ कि
अब चलने में रखा ही क्या है?
अभी कुछ दूर ही तो चला हूँ मैं
एकल मार्ग पकड़ कर
जो शुरुआत में एक समान ही
बस दूर भर प्रतीत हो रहा है।
लेकिन यह क्या?
माथा चकराया मेरा।
एकल मार्ग अब बहुसंख्यक होता गया
जिस मार्ग में अब तक एकरूपता थी
कैसे बहुरूपता में बदलता गया?
मस्तिष्क भन्नाया ! और मैं जोर से झल्लाया
किसे पकड़ू? किसे छोड़ू?
उहापोह मनोस्थिति पर हावी होता देख
स्वयं को फिर से लक्ष्य के प्रति केंद्रित किया।
तभी मन मस्तिष्क में
समयबद्धता ने अपना
अलार्म बजाना शुरू किया।
ठहर जा मुसाफिर! तू कर क्या रहा है?
ऐसे में तो तू ,
लक्ष्य तक पहुँचते-पहुँचते
बहुत देर कर चुका होगा?
अब भी समय शेष है ।
और तू तो विशेष है।
अपने लक्ष्य को लक्षित कर
जिसे तू लेकर निकला था चलने को।
अब मैं एकार्थी से अनेकार्थी बन

संघर्षरत हो
अपने लक्ष्य को
मैं इन पगडंडियों में उलझा
कुछ खोते कुछ पाते,
लगातार लक्ष्य पाने को

ए मुसाफिर -
उठना-गिरना गिरकर उठना
ही सफलता का पैमाना भर नहीं
असल में इन अनजान पगडंडियों पर
फिसलन और उलझन के बीच
खुद को नियंत्रित रखते हुए
लक्ष्य को पाना ही सच्चा जीवन है।
वरना बनी बनाई सड़क पर
तो विनोद विमल भी दौड़ लगा सकता है।

"विनोद विमल बलिया"

अब आगे कुछ नहीं कहूँगा, या यूँ कहें कि कहने की हिम्मत नहीं हो रही बस आप ये वीडियो देखिये....

Day 3

मैंने ये ट्रेक नवंबर 2020 के दुसरे हफ्ते में किया था।

Itinerary I followed.

Delhi- Rishikesh- Devprayag- Rudraprayag- Ukhimath- Sari Village, trek starts from this beautiful village...

यहाँ आखिर में हिंदी के प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह जी की एक कविता याद आ रही है, पढ़ियेगा!

मैं जा रही हूँ – उसने कहा

जाओ – मैंने उत्तर दिया

यह जानते हुए कि जाना

हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है।

लेकिन पता है जब आप देवरिया ताल जैसी जगह पर हों

तब कह सकते हैं कि

हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है-

लौटना!