ऐतिहासिक बटेश्वर धाम

Tripoto
1st Oct 2020

मैं बहुत ज्यादा दूर तो नहीं जा रहा आगरा से तो आसपास की जगह ही खोज रहा हूं।करुणा काल की वजह से जितनी प्रिकॉशंस ले सकता हूं उतनी ले रहा हूं। सफर की शुरुआत इस बार दोपहर में हुई| और इसका कारण यह था कि मुझे इस जगह की शाम देखनी थी।

Photo of ऐतिहासिक बटेश्वर धाम 1/10 by A Mango Traveler

इस बार मैं आप सब लोगों को लेकर चलता हूं बटेश्वर धाम जो कि उत्तर प्रदेश में है और शिव मंदिरों की वजह से काफी प्रसिद्ध है।

मुख्य दरवाजे के अंदर घुसते ही आपको कुछ दुकानें नजर आएंगी। पूजा पाठ का सारा सामान आपको यहीं से मिल जाएगा।Corona काल की वजह से अभी यहां पर ज्यादा भीड़ नहीं है।

Photo of ऐतिहासिक बटेश्वर धाम 2/10 by A Mango Traveler

बटेश्वर के बारे में

चलिए मैं आपको बताता हूं कि बटेश्वर का नाम बटेश्वर क्यों पड़ा।

ऐसा माना जाता है कि भगवान भोलेनाथ किस जगह पर आए थे और एक बरगद के पेड़ के नीचे उन्होंने आराम किया था। अब बरगद के पेड़ संस्कृत में कहते हैं ब ट, और क्योंकि ईश्वर ने आराम किया था तो इस जगह का नाम पड़ गया बटेश्वर।इस जगह का नाम मत्स्य पुराण, रामायण, महाभारत और जैन ग्रंथों में भी देखा गया है।

मुख्य मंदिर तो उस दिन बंद था पर सुधांशु के निवेदन करने पर मुख्य पुजारी जी ने हमें मूल मंदिर में जाने की अनुमति दे दी। सुधांशु जहां पास का ही रहने वाला है। यह एकलौती ऐसी जगह है जहां पर भगवान शिव की मूछें दिखाई गई हैं और जहां पर महादेव और पार्वती को सेठ और सेठानी के रूप में दिखाया गया है।

यहां पर घंटे चढ़ाने का बहुत बड़ा महत्व माना जाता है, और हर साल लगभग 20 लाख घंटे चढ़ाए जाते हैं।माना जाता है कि नी संतान जोड़ें अगर पूरे विश्वास से यहां आए और और प्रार्थना करें श्री बटेश्वर नाथ से तो संतान की प्राप्ति भी होती है।यहां बटेश्वर नाथ के ऐसे खुले दर्शन करने को मिलेंगे मैंने सोचा भी ना था।

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Photo of ऐतिहासिक बटेश्वर धाम 4/10 by A Mango Traveler

बटेश्वर मंदिरों का निर्माण कुछ 400 साल पहले राजा बंधन सिंह भदोरिया जोकि भदावर डायनेस्टी के थे उन्होंने किया था। बताते हैं कि यहां उस जमाने में 101 मंदिर थे। पर अब सिर्फ 42 ही रह गए हैं। और उसमें से भी आज सिर्फ 10 या 20 ही ऐसे होंगे जिसमें पूजा-अर्चना होती है।

बटेश्वर में एक पशु मेला भी लगता है हर साल जो कि उत्तर भारत का सबसे बड़ा मेला बन चुका है। अगर आपको पुष्कर मेले के बारे में जरा भी ज्ञान है तो यह मेला भी वैसा ही है पर उतना बड़ा तो नहीं है। पिछले साल हमारे आम यात्री सौरभ और सुधांशु ने यह मेला cover भी किया था जिसका वीडियो लिंक दिए दे रहा हूं, आप देखिएगा जरूर। Cattle fair in Bateshwar

अक्सर इस तरह के घाट वाली जगहों पर नावे चलती है और अगर आपने नाव का अनुभव नहीं किया तो फिर क्या किया। निश्चित रूप से मेरे लिए यह अनुभूति भी मजेदार रही।

शाम के समय बटेश्वर मंदिरों का नजारा दूसरे घाट से बहुत सुंदर लगा मुझे। हम लोग यहां काफी देर तक रुके और फोटोग्राफी करी।

नाव में घूमने के चार्जेस फिक्स नहीं है यहां, आपको काफी बार गनिंग करनी पड़ेगी अगर आपको पूरी राइड चाहिए तो, हालांकि इस पार से उस पार जाने के लिए आपको मात्र ₹30 देने होंगे।

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शाम ढलते ही हम भी यहां से चल पड़े। पर मैं वापस आगरा नहीं आया। सोचा इस जगह की सवेर भी देख लूं अब। बहुत जल्दबाजी में प्रोग्राम बना था तो हम लोग सुधांशु के गांव के एक मैरिज हॉल में ठहरे। काफी मजेदार वाला अनुभव रहा वह भी।

मुझे लगा था आप बनारस की तरह यहां भी सवेरे काफी हलचल होगी, पर ऐसा कुछ नहीं दिखा।चंद लोग ही यहां पर थे और थोड़ा टाइम बिताने के बाद हम लोगों ने भी यहां से चलने की सोची।

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Photo of ऐतिहासिक बटेश्वर धाम 8/10 by A Mango Traveler

जाते जाते आप लोगों को यह भी बता दूं कि बटेश्वर हमारे फॉर्मर प्राइम मिनिस्टर श्री अटल बिहारी बाजपेई का पैतृक गांव भी है।और सन 1942 में इन्हें इनके भाई श्री प्रेम जी के साथ 23 दिनों के लिए यहां पर कैद भी किया गया था अंग्रेजो के द्वारा। और जिसका कारण यह था कि इन्होंने महात्मा गांधी के क्विट इंडिया मूवमेंट में बढ़ चढ़कर भाग लिया था।और इनकी मेमोरी के लिए यहां पर एक छोटा सा स्मारक बनाया गया है।

मेरा अनुभव

मैं बटेश्वर पहले भी आ चुका हूं और ना जाने क्यों ऐसे नदी किनारे घाट मुझे अपनी ओर खींचते हैं। मैं 2012 में अपने फोटोग्राफर क्लब ऑफ आगरा के साथ आया था। 2019 में भी यहां पर चक्कर लगा कुछ 70 देशों के कलाकारों के साथ, इन्होंने यहां और आगरा में वाटर कलर पेंटिंग की थी बहुत ही अच्छा एक्सपीरियंस रहा था इन सब से मिलकर।

बटेश्वर मुझे बनारस की याद दिलाता है हालांकि यह जमुना नदी के किनारे हैं और बनारस गंगा नदी के।

बनारस के हरिश्चंद्र और मणिकर्णिका घाट पर चितई जलाई जाती है, और 2016 तक यहां भी कुछ ऐसा ही था हालांकि अब इस काम के लिए शमशान को थोड़ा दूर कर दिया गया है।

बनारस के घाट काफी राजाओं ने बनवाए थे और यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ। हालांकि बनारस के मुकाबले यहां के घाट काफी शांत हैं।

बनारस में देव दिवाली बनाई जाती है हर साल और पिछले साल और इस साल भी यहां भी धूमधाम से देव दिवाली बनाई गई दोनों देव दिवाली यों का वीडियो लिंक नीचे दे रहा हूं।

Dev diwali in Bateshwar

Dev Diwali in Varanasi

बनारस को सुबह ई बनारस की उपाधि से नवाजा गया है क्योंकि यहां की सवेर बड़ी सुंदर होती है। बटेश्वर की शाम बेहद खूबसूरत है और खास करके जब घाट के दूसरी तरफ से देखें मंदिरों के सफेद रंग को जब सूरज अपनी लाली से नहलाता है तब यह जगह देखते ही बनती है।

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कहां ठहरे

अगर आप बहुत अच्छी जगह देना चाहते हैं तो मैं आपको चंबल सफारी लॉज ठहरने की सलाह दूंगा जो कि बा ह में है। चंबल सफारी लॉज रुकने में आप चंबल सफारी बर्ड फोटोग्राफी और बटेश्वर तीनों का आनंद ले सकते हैं।

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यहां कैसे पहुंचे

1.) नजदीकी एयरपोर्ट आगरा में है।

2.) नजदीकी रेलवे स्टेशन बटेश्वर में ही है।

3.) नजदीकी बस अड्डा आगरा में है। बस आपको भा ह तक ले जाएगी। भा से बटेश्वर की दूरी 10 किलोमीटर की है।

आशा करता हूं कि यह blog आपको पसंद आया होगा। मैं फिर आऊंगा एक नई डेस्टिनेशन के साथ।तब तक के लिए इजाजत चाहता हूं| ईश्वर आपको खुश रखे स्वस्थ रखे।