सप्तकुंडः उत्तराखंड की निजमुला घाटी में फूलों का एक अलग संसार है

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Photo of सप्तकुंडः उत्तराखंड की निजमुला घाटी में फूलों का एक अलग संसार है by Rishabh Dev

हमें हर अच्छी जगह खूबसूरत लगती है लेकिन खूबसूरती के असल मायने सिखाती है, घुमक्कड़ी। घुमक्कड़ी बताती है कि सबसे खूबसूरत कुछ नहीं होता है। जिस नजारे को देखकर आज आप खूबसूरत कह रहे हो। हो सकता है कल उससे भी अच्छी जगह देखें। जिसे आप फिर से सबसे खूबसूरत कहने लगेंगे। घुमक्कड़ी, इस नयेपन और पुरानेपन के बीच का अंतर मिटाती है। घुमक्कड़ी तो बस हर नई जगह को एक्सप्लोर करने के लिए होती है। चाहे वो बहुत खूबसूरत हो या न हो लेकिन अगर आप पहाड़ों में जाते हैं तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि वहाँ घूमने को कुछ न हो। पहाड़ अपने आप में सुंदरता का पर्याय है। इन्हीं पहाड़ों में निजमुला घाटी जैसा खूबसूरत संसार है।

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निजमुला घाटी के बारे में हो सकता है आपने सुना हो या हो सकता है न भी सुना हो। इस जगह पर घूमने वाले लोग कम ही आते हैं। निजमुला घाटी उत्तराखंड की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है। यहाँ फूलों का एक अलग ही संसार है। इसी जन्नत के बीच एक जगह है, सप्तकुंड। जहाँ पहाड़ों के बीच सात बड़े-बड़े कुंड हैं। सप्तकुंड तक पहुँचने के लिए आपको बहुत लंबा ट्रेक करना होगा। जो बेहद खतरनाक है। ये एशिया के सबसे कठिन रास्तों में से एक माना जाता है। कहते हैं न कठिन सफर के बाद ही खूबसूरत मंजिल मिलती है। वैसा ही कुछ कठिनाई आपको निजमुला के सप्तकुंड देखने के लिए उठानी ही होगी। इस जगह पर पहुँचने के बाद आप फिर से कह उठेंगे, खूबसूरत।

सप्तकुंड

उत्तराखंड के निजमुला घाटी में पहाड़ों का एकदम अलग संसार है, सप्तकुंड। समुद्र तल से लगभग 5000 हजार मीटर की ऊँचाई पर यहाँ 7 बड़े-बड़े कुंड हैं। माना ये भी जाता है कि सप्तकुंड भगवान शिव का निवास स्थान है। इसलिए ये जगह जितनी खूबसूरत और प्यारी है उतनी ही पवित्र भी है। यहाँ जो सात कुंड हैं उनके नाम पार्वती कुंड, गणेश कुंड, नारद कुंड, नंदी कुंड, भैरव कुंड, शक्ति कुंड और शिव कुंड हैं। शिव कुंड का पानी गर्म है और बाकी सभी का पानी इतना ठंडा है उसमें हाथ डालने पर ही पूरे शरीर में कंपीकंपी आने लगेगी। निजमुला गाँव ऋषिकेश से 220 किमी. की दूरी पर है। आपको इस जगह पर आना चाहिए क्योंकि ये जगह बेहद खास है और खूबसूरत भी। यहाँ आकर आपको जो सुकून और शांति मिलेगी। वो आपको कहीं और नहीं मिलेगी।

ये सफर

अगर आप उत्तराखंड के बाहर से आ रहे हैं आप ट्रेन से या बस से हरिद्वार, ऋषिकेश ओर देहरादून आ सकते हैं। अगर आप पहली बार उत्तराखंड आएंगे तो आपको ये शहर भी खूबसूरत लगेंगे। यहाँ आकर आप भूल जाएंगे वो जगह जहाँ से आए हैं। मंजिल फिर भी अभी दूर है लेकिन आप खुशी से भर उठेंगे। यही तो जादू है पहाड़ों के बीच आने का। फिर शुरू होता है पहाड़ों के बीच सफर का। आप गाड़ी बुक करके या बस से चमोली तक जा सकते हैं। ऋषिकेश से चमोली की दूरी लगभग 230 किमी. है। लंबे सफर के बाद आप चमोली पहुँचेंगे। ये छोटा शहर बेहद खूबसूरत है। चारों तरफ हरियाली है और पहाड़ हैं। पहाड़ों के बीच जैसे शहर होते हैं न ठीक वैसा ही शहर है, चमोली।

अगला पड़ाव झींझी

झींझी वो गाँव है जहाँ से सप्तकुंड ट्रेक शुरू होता है। चमोली से गाड़ी पकड़िए और निकल पड़ि झींझी की ओर। चमोली से बिरही होते हुए निजमुला घाटी के पगना तक आप गाड़ी से पहुँच जाएंगे। इसके आगे गाड़ी नहीं जा पाती है। पगना से झींझी गाँव की दूरी लगभग 8 किमी. है। इसका ये मतलब है कि आपको ट्रेक से पहले भी ट्रेक करना होगा। पगना गाँव से झींझी तक पैदल चल पड़िए। हरे-भरे रास्तों के बीच चलना सुकून देता है। यही सुकून आपको इस रास्ते में मिलेगा। 8 किमी. पैदल चलने बाद आप झींझी गाँव पहुँच जाएंगे। थकान दूर करने के लिए आपको इस गाँव में रूकना होगा। यहाँ हर घर होमस्टे है, आप आराम से किसी भी घर में ठहर सकते हैं। रात को यहाँ अच्छी नींद लीजिए और तैयार हो जाइए लंबे ट्रेक के लिए।

ट्रेक के बाद ट्रेक

अगले दिन निकल पड़िए सप्तकुंड के लिए। ये ट्रेक लंबा भी है और कठिन है लेकिन सुंदर बहुत है। जैसे-जैसे आप आगे बढ़ेंगे आपको इस जगह की खूबसूरती का अंदाजा हो जाएगा। झींझी गाँव से जब चलना शुरू करेंगे तो सात किलोमीटर तक पूरी खड़ी चढ़ाई। जो आपको थका देगी। ट्रेकिंग में शारीरिक तौर से ज्यादा मानसिक रूप से तैयार होना। पहाड़ों में आप खुद को कमजोर पाएंगे। तब सबसे ज्यादा जरूरी होता है हिम्मत न हारना। अगर आप कोशिश करते रहेंगे तो कठिन से कठिन ट्रेक भी कर लेंगे।

खड़ी चढ़ाई के बाद फिर रास्ता सामान्य हो जाता है। जिसमें कभी सामान्य तो कभी रास्ता कठिन मिलेगा। लगभग 10 किमी. चलने के बाद आपको गौंछाल गुफा मिलेगी। जहाँ आप कुछ देर आराम कर सकते हैं। जहाँ से तीन किमी. चलने पर सिम्बे बुग्याल मिलता है। इस ट्रेक में ये जगह बेहद सुंदर है। यहाँ आकर लगेगा कि आप किसी फूलों की घाटी में आ गए हैं। यहाँ सैकड़ों प्रकार के रंग-बिरंगे फूल आपका मन मोह लेंगे।

लंबी चढ़ाई के बाद मंजिल

फूलों की घाटी के अलावा इस ट्रेक में आपको हरे-भरे बुग्याल मिलेंगे। रास्ते में मंत्रमुग्ध करने वाले झरने देखने को मिलेंगे। इसके अलावा यहाँ आपको चीड़, देवदार, बांज, कैल, खोरु, भोज और बुरांश जैसे पेड़ भी मिलेंगे। जिसके बाद आप पहुँचेंगे इस ट्रेक की सबसे खूबसूरत जगह पर सप्तकुंड के बीच। सातों तालाब किसी एक जगह पर नहीं हैं। सभी तालाबों के 500 मीटर की दूरी है। सबसे पहले मिलेगा आपको पार्वती कुंड। इसके थोड़ी दूर चलेंगे तो गणेश और फिर नारद कुंड मिलेंगे। इसके आगे शिव कुंड है। सातों कुंड में शिव कुंड सबसे बड़ा है। लगभग 1 किमी. में फैला ये कुंड देखने लायक है। इस कुंड के पास एक मंदिर भी बना हुआ है।

शिव कुंड के आगे जाएंगे तो नंदी और भैरव कुंड मिलेंगे। सबसे आखिर में है शक्ति कुंड। शक्ति कुंड लगभग 200 मीटर में फैला है और ये सप्तकुंड की चोटी के सबसे नजदीक है। सप्तकुंड नंदा घुंघटी में स्थित है। नंदा घुंघटी की सबसे खास बात ये है कि इसके करीब से कोई भी फ्लाइट और हेलीकाॅप्टर नहीं गुजर सकता क्योंकि इसकी चुंबकीय क्षमता बहुत अधिक है। सप्तकुंड से आप नंदा घुंघटी, त्रिशूल, नंदा देवी और चौखंभा जैसी खूबसूरत चोटियों को देख सकते हैं।

कब जाएँ?

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सप्तकुंड ट्रेक करने का सबसे अच्छा समय है बारिश के बाद और पहले का समय। सर्दियों में यहाँ खूब बर्फ पड़ती है। तब आप यहाँ आ नहीं सकते हैं और मानसून में पहाड़ खतरनाक बन जाते हैं। इसलिए मेरा सुझाव मानें तो मार्च से जून और सितबंर से नवंबर के बीच में कभी भी इस जगह पर आ सकते हैं। यहाँ ठहरने के लिए झींझी गाँव में अच्छी व्यवस्था है। ये गाँव भी प्यार है और यहाँ के लोग भी। आपको एक बार जरूर सप्तकुंड की यात्रा करनी चाहिए। ऐसी गुमनाम जगहें ही तो घुमक्कड़ी को मायने देती हैं।

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