अगर हडप्पा सभय्ता के ईतिहास को देखना चाहते हैं तो जाईये इन चार जगहों की यात्रा पर

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Photo of अगर हडप्पा सभय्ता के ईतिहास को देखना चाहते हैं तो जाईये इन चार जगहों की यात्रा पर by Dr. Yadwinder Singh
Day 1

1. लोथल गुजरात में एक हडप्पा सभय्ता से संबंधित जगह है | लोथल का उत्खनन प्रो. एस आर राव ने 1955- 62 के बीच करवाया। लोथल में हड़प्पाकालीन नगर ( लगभग 2500-1900 ई. पूर्व) से समबंधित अवशेष मिले।
लोथल को दो भागों में बाँटा गया हैं
1. दुर्ग क्षेत्र
2. नगर क्षेत्र
#दुर्ग क्षेत्र- इस क्षेत्र में समाज के प्रमुख वर्ग के लोग रहते थे, जिनके आवास 3 मीटर ऊँचे चबूतरे पर बने हैं। यहां सभी प्रकार की नागरिक सुविधाएं पकी ईटो के सनानघर, नालियां, जल के लिए कुएँ की सुविधा थी।
#नगर क्षेत्र
इसके भी दो भाग थे- वयापारिक क्षेत्र और आवासीय क्षेत्र
व्यपारिक क्षेत्र में सिर्फ कामगार लोग रहते थे। यहां के अवशेषों में एक माल गोदाम और जलाशयनुमा गोदी हैं
#माल गोदाम
यहां पर माल , सामान को सटोर करके रखा जाता था, जो माल भेजना होता था और जो माल बाहर से आता था। यह 3 मीटर ऊँचा बना हुआ है।
#गोदी
गोदी को अच्छी तरह से ईटो से पकाया गया हैं  इसको पानी का लगातार बहाव रखने के लिए बनाया गया था|
लोथल संग्रहालय
दोस्तों लोथल पहुंच कर मैं सबसे पहले लोथल संग्रहालय देखने के लिए गया |  टिकट 5 रुपये की लगती हैं मुझे ईतिहास को देखना और जानना बहुत अच्छा लगता है | संग्रहालय को देखने का मौका मैं कभी नहीं छोड़ता।
लोथल संग्रहालय में तीन प्रदशिर्नी हैं,
सामने की प्रदर्शनी में एक कलाकार की बनाई हुई लोथल शहर की पेटिंग हैं।
बायें तरफ मनके, मिट्टी के बने हुए आभूषण, मुद्रा, शंख, हाथी दांत, ताँबे और काँसे की वसतुएँ प्रदशित हैं।
दाहिनी और खिलौने, ईटो से बनी हुई वसतुएं रखी हुई हैं।
#मनके
यहां कीमती पत्थरों और काँचली मिट्टी के बने मनके यहां रखें हुए हैं।
#मुद्राएं और मुद्रांकन
लोथल में बडी़ संख्या में मुद्राएं और मुद्राकन प्राप्त हुए हैं।
ये सैलखड़ी पर पशु आकृति बनाईं गई हैं।
#शंख निमित्त वसतुएं
गुजरात के तटीय क्षेत्रों से काफी संख्या में शंख मिलते हैं, जिनका उपयोग चुडियाँ, मनके, खिलौनों को बनाने में होता है
#ताँबे एव काँसे की वसतुएं
हड़प्पा सभ्यता के लोग ताँबे और काँसे की वसतुएं बनाते थे, जो लोथल में मिली है।
#मृदभाण्ड
हड़प्पा सभ्यता के लोग विभिन्न प्रकार के घडे़, तसले आदि का प्रयोग करते थे।
#औजार
पत्थर के बने हुए औजार, हड्डी की सुई, यह सब लोथल में मिला है।
#मोहरे
यहां मोहरे भी मिली है
#पशु एवं मानव आकृतियाँ
हड़प्पा निवासियों ने बडी़ संख्या में पशुओं की एवं मानवों की मृणमूतियों बनाई थी।
#शवाधान एवं धार्मिक वसतुएँ
हड़प्पा सभ्यता के लोग मृतकों की कब्रों में मृदभाण्ड, मनके और दैनिक वयवहार की चीजें रखते थे|

2. रोपड़
रोपड़ हर चंडीगढ़ से 40 किमी दूर हैं, यहां पर तीन टीले हैं जहां पर उत्खनन कार्य हुआ हैं।
1. रोपड़ टीला
2. बाड़ा टीला
3. कोटला निहंग खान टीला
1. रोपड़ का टीला पुरातत्व संग्रहालय के पास ही सथित हैं, इस सथल की खोज प्रो० बृजवासी लाल द्वारा 1950 में की गई, इसके बाद यज्ञदत्त शर्मा के निरदेशन में 1952-55 के बीच में उत्खनन कार्य हुआ। रोपड़ आजादी के बाद उत्खनित पहला हडप्पा सथल हैं।
2. बाड़ा एक गांव हैं, जो रोपड़ से 6 किलोमीटर दूर है, बाड़ा टीला 500 मीटर लंबा और 300 मीटर चौड़ा हैं। यहां पर उत्खनन के बाद बहुत कुछ मिला है जैसे ईटों से बनी हुई संरचनाए, मिट्टी, घास फूस की बनी हुई झोपड़ी, घड़े, जार, तशतरी, हाणिडयां, कटोरे आदि, इस संस्कृति को बाड़ा संस्कृति का नाम दिया गया हैं।
3.  कोटला निहंग खान टीला
यह रोपड़ से दो किलोमीटर दूर सथित हैं, इसकी खोज तथा उत्खनन श्री माधव सवरूप वत्स ने 1929 ईसवी में किया। इसकी खोज से हडप्पा संस्कृति के विस्तार को सतलुज-यमुना दोआब तक माना जाने लगा। यहां हडप्पा संस्कृति के मृदभाण्ड मिले हैं, साथ में पकी मिट्टी की चूडिय़ां, मनके, खिलौने गाड़ी, हडडी के नुकीले औजार मिले है।
रोपड़, बाड़ा और कोटला निहंग खान से प्राप्त मृदभाण्डों , मिट्टी की चूडिय़ां, मनके, मटके, तशतरी, सिक्के, सेलखड़ी की मुद्रा, कांस्य उपकरण, कांस्य पात्र , मूर्ति आदि जो भी सामान इन तीनों जगह में मिला हैं उसे रोपड़ के पुरातत्व संग्रहालय में संभाल कर रखा हैं। अगर आपको ईतिहास से प्रेम हैं, हडप्पा संस्कृति को समझना चाहते हो तो आपको रोपड़ के पुरातत्व संग्रहालय को जरूर देखना चाहिए। यह संग्रहालय रोपड़ शहर के बीचोबीच हैं  सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता हैं, शुक्रवार को संग्रहालय बंद रहता हैं, टिकट सिर्फ पांच रुपये हैं। रोपड़ भारत की पांच सबसे बड़ी हडप्पा सभ्यता केंद्रों में से एक है |

लोथल हडप्पा सभ्यता स्थल

Photo of Lothal, Archaeological remains of a Harappa Port-Town by Dr. Yadwinder Singh

हडप्पा सभ्यता की सील

Photo of Lothal, Archaeological remains of a Harappa Port-Town by Dr. Yadwinder Singh

लोथल में घुमक्कड़

Photo of Lothal, Archaeological remains of a Harappa Port-Town by Dr. Yadwinder Singh

लोथल म्यूजियम

Photo of Lothal, Archaeological remains of a Harappa Port-Town by Dr. Yadwinder Singh

लोथल

Photo of Lothal, Archaeological remains of a Harappa Port-Town by Dr. Yadwinder Singh

रोपड़ पुरातत्व विभाग म्यूजियम

Photo of Lothal, Archaeological remains of a Harappa Port-Town by Dr. Yadwinder Singh

रोपड़ पुरातत्व विभाग म्यूजियम

Photo of Lothal, Archaeological remains of a Harappa Port-Town by Dr. Yadwinder Singh
Day 2

3. धोलावीरा 
धोलावीरा गुजरात में ऐसी जगह है जहां हडप्पा सभ्यता के पुराने महांनगर धोलावीरा के अवशेष आज भी मिलते हैं। ऊपर से देखकर ऐसा लगता है जैसे कोई बहुत बड़ा शहर उजड़ गया हो सदियों पहले और आज भी अपनी छाप छोड़ गया हैं। दूर से देखने पर एक टीले के रूप में दिखाई देता है |
धोलावीरा हडप्पा सथल 100 ऐकड़ में फैला हुआ हैं जो दो मानसूनी धाराओं मानसर  ( उत्तर दिशा ) और मनहार(दक्षिण दिशा)  के बीच में बसा था । यह दो मानसूनी नदियां धोलावीरा को पानी की सप्लाई करती थी । उस समय के राजा ने इन नदियों के पानी को इकट्ठा करने के लिए शहर की बाहरी सीमा के साथ तालाब बनवाए जो इन नदियों के पानी से भरे जाते थे , जिससे धोलावीरा को पानी की सप्लाई होती थी। धोलावीरा में बारिश बहुत कम होती हैं अब भी और उस समय में भी इसीलिए पानी को इकट्ठा किया जाता था। आज भी जब आप धोलावीरा हडप्पा सथल देखने आते हो तो आपको खुले विशाल  गहरे गढ्ढे दिखाई देगें जो तालाब थे। इसकेे ईलावा धोलावीरा  शहर को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता हैं ।
1. अपर भाग
2. मिडल भाग
3. लोअर भाग
अपर भाग सबसे ऊंचा और महत्वपूर्ण जगह थी धोलावीरा शहर की जहां पत्थर से बना हुआ एक मजबूत किला हुआ करता था। इसी किले में राजा महाराजा रहा करते थे।
मिडल भाग में आपको खुला मैदान मिलेगा जहां राजकीय कार्यक्रम हुआ करते थे। इसी भाग में बाजार और सटेडियम था और साथ में गलियों का नैटवर्क भी देखने को मिलेगा ।
लोयर भाग में आम लोग रहते थे जो काम करते थे। धोलावीरा में  आपको जल  संरक्षण करने का शानदार नमूना देखने को मिलेगा । जिंदगी जल  के ऊपर ही आधारित हैं । हाईड्रो इंजीनियरिंग की बेमिसाल उदाहरण है धोलावीरा जहां मानसूनी नदियों का पानी इकट्ठा करके शहर में सपलाई किया जाता था।
मैंने भी बड़े आराम से एक तरफ से शुरू होकर पहले तालाब देखे , फिर धीरे धीरे टीले के ऊपर चढ़कर धोलावीरा शहर के अवशेष देखे। पत्थर और ईटों से बनी हुई 4500 साल पुरानी गलियों के नैटवर्क को देखा । लगभग एक घंटा हडप्पा सभ्यता की विरासत को देखकर मैं बाहर आ गया। धोलावीरा को इसी साल यूनैसको वल्र्ड हैरीटेज साईट में शामिल कर लिया गया है। आशा करता हूँ इस कदम से धोलावीरा का नाम और चमकेगा टूरिस्ट मैप पर । अगर आप को ईतिहास और विरासत पसंद हैं तो आपको धोलावीरा की यात्रा जरूर करनी चाहिए।
धोलावीरा मयूजियिम
मैं सुबह दस बजे  धोलावीरा मयूजियिम के गेट तक पहुंच गया था। हडप्पा सभयता सथलों की खुदाई से मिली हुई वस्तुओं को अगर देखना हैं तो आप को हडप्पा सभयता सथलों पर बने हुए मयूजियिम को जरूर देखना होगा। धोलावीरा भी हडप्पा सभयता से संबंधित एक पुराना महांनगर था जो विश्व की पांच बड़ी हडप्पा सभयता सथलों में आता है। इन पांच जगहों में से तीन जगहें पाकिस्तान में हैं और दो भारत में आती हैं, जो निम्नलिखित अनुसार हैं।
1. हडप्पा ( पाकिस्तान )
2. मोहनजोदड़ो (पाकिस्तान)
3. गनेरीवाला ( पाकिस्तान)
4. राखीगढ़ी हरियाणा ( भारत)
5. धोलावीरा गुजरात ( भारत)
इनमें से कम से कम दो जगहें तो हम जरूर देख सकते है राखीगढ़ी और धोलावीरा जो भारत में है। वैसे अभी तक हडप्पा सभ्यता  से संबंधित 1000 सथलों की खोज हो चुकी हैं, जिसमें से 70 % जगहें भारत में हैं।
धोलावीरा में एक शानदार मयूजियिम बना हुआ है जहां आप धोलावीरा में हुई खुदाई से निकले सामान और वसतुओं को देख सकते हैं। जैसे ही आप मयूजियिम के गेट में प्रवेश करते हो तो एक खुले हाल में आ जाते हो। जहां एक तरह धोलावीरा का एक खूबसूरत चित्र लगा हुआ हैं। मयूजियिम में अलग अलग गैलरी बनी हुई हैं। जिसमें मिट्टी के बर्तन, मटके , गहने आदि रखें हुए हैं। यहां पर धोलावीरा का साईन बोर्ड भी मिला है जो यहां रखा हुआ हैं। इसके साथ यहां हडप्पा की सील , मिट्टी के खिलौने जिनको अलग अलग पशुओं के रूप में बनाया गया हैं । हडप्पा सभ्यता के सथलों के बारे में बहुत अहम जानकारी अलग अलग चित्रों और नकशे द्वारा दी गई है जिसे आप इस मयूजियिम में पढ़ और देख सकते हो। मैंने भी एक घंटा इस मयूजियिम में बिताया और हडप्पा सभ्यता से संबंधित बहुत सारी  जानकारी इकट्ठा की जिसे देखकर और पढ़कर बहुत अच्छा लगा।

4. कालीबंगा
मैं कालीबंगा में बने हुए मयूजियम के सामने पहुंच गया था। मयूजियम की एंट्री Paytm  से टिकट के द्वारा हैं, आपको आनलाईन ही टिकट निकालनी पड़ेगी। टिकट तो मात्र पांच रूपये की हैं, लेकिन सीधे टिकट नहीं मिलती टिकट खिड़की से। अगर आपकी आनलाईन टिकट नहीं हुई तो आप मयूजियम में प्रवेश नहीं कर सकते। मैंने भी बड़ी मुश्किल से 15 मिंट में टिकट बनाई कयोंकि वहां मेरे मोबाइल का नैटवर्क बहुत धीमी गति से चल रहा था, खैर मुझे मयूजियम में जाने की ईजाजत मिल गई। कालीबंगा मयूजियम बहुत ही साफ सुथरा और अच्छा बना हुआ है, खुदाई से निकली हर चीज को अलग अलग गैलरियों में संभाल कर रखा हुआ है। वैसे मयूजियम के अंदर फोटोशूट की ईजाजत नहीं हैं लेकिन मैंने मयूजियम के करमचारी से विनती करके उसे तीन चार फोटोज खींचने की आज्ञा मांगी, जो उसने मान ली कयोंकि मैंने उसे बताया मुझे ईतिहासिक जगहों पर जाना और फिर उसके बारे में लिखने का शौक हैं।

पहली गैलरी ः
मयूजियम  में पकी हुई मिट्टी से बनी हुई पशु-पक्षियों की आकृतियां रखी हुई हैं, जो देखने में बहुत शानदार भी हैं और उससे हमें उस समय के पशु पक्षियों के बारे में भी पता चलता है। इसके ईलावा मिट्टी के बने हुए खिलौने जैसे गाड़ी, मनके, हाथों में पहनने वाली चूडिय़ां, हल, पहिये, आदि भी प्राप्त हुई हैं। कालीबंगा में बहुत सारी रंग बिरंगी चूडिय़ां मिली है, इसी से काले रंग की चूडियों से शायद इसका नाम कालीबंगा पड़ गया।
दूसरी गैलरी ः
मयूजियम की दूसरी गैलरी में विकसित हडप्पाकालीन मृदभाण्ड रखे गए हैं, जैसे फूलदान, कटोरा आदि । इनके उपर रेखाएं, बिंदु, फूल पतियों पशु चित्रण आदि किया गया है, जो देखने में बहुत आकर्षक लगते है।
तीसरी गैलरी ः
मयूजियम की तीसरी गैलरी में हडप्पाकालीन तांबे से बने हुए उपकरणों से संबंधित सामान रखा हुआ है जैसे कुलहाड़ी, चाकू, भालें, चूडिय़ां, अंगूठियां, सुईयां आदि।
इसके ईलावा एक कंकाल भी मिले हैं, एक कंकाल का छाया चित्र मयूजियम में प्रदर्शित किया गया है। शवाधानों से पता चलता है हडप्पाकालीन सभ्यता के लोग मृतकों के शवाधानों सामिग्री के रूप में लाल रंग के बर्तन, चूडिय़ां, मनके, हड्डियां तथा तांबे से बने उपकरण भी साथ रखते थे|

धोलावीरा हडप्पा सभय्ता स्थल

Photo of Dholavira by Dr. Yadwinder Singh

धोलावीरा में घुमक्कड़

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धोलावीरा का तालाब

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धोलावीरा म्यूजियम के सामने घुमक्कड़

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धोलावीरा म्यूजियम

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कालीबंगा म्यूजियम राजस्थान

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कालीबंगा

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कालीबंगा म्यूजियम

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