आसाम का ये गाँव क्यूँ है धरती की सबसे रहस्यमय जगह

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जटिंगा में हर साल पक्षियों की आत्महत्या आम बात है

जटिंगा

आसाम में एक छोटा सा गाँव है जिसका नाम है जटिंगा | 2500 लोगों की आबादी वाले इस गाँव में बहुत सारे दोष और मिथक भी रहते हैं | हालाँकि भारत के गाँवों में संदिग्ध गतिविधियाँ होना आम बात है मगर इस गाँव में ऐसा कुछ हो रहा है कि लोग इसे असाधारण मान रहे हैं |

हर साल मानसून के मौसम में यहाँ हर प्रजाति के ढेर सारे पक्षी इस गाँव में "आत्महत्या" कर लेते हैं | इस संदिग्ध गतिविधि के चलते लोग इस सनसनीखेज गाँव को काफ़ी डरावना मान रहे हैं |

पक्षियों की आत्महत्या - मिथक या सच्चाई?

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श्रेय : पिक्साबे

हालाँकि जटिंगा आसाम राज्य की राजधानी गुवाहाटी से करीब 330 किलो मीटर की दूरी पर दक्षिण की ओर स्थित हैं, फिर भी इस अजीबो ग़रीब वाकये से यह छोटा सा गान वभहि काफ़ी प्रसिद्ध हो चुका है | स्थानीय लोगों का कहना है कि मानसून के मौसम के ख़तम होने के ठीक बाद ही कई पक्षी उड़ते हुए जान बूझ कर गाँव की दीवार में सीधे टकरा जाते हैं और आत्महत्या कर लेते हैं | इस रहस्यमय दावे के कारण कई पक्षी विज्ञानी इस बात का अध्ययन करने के लिए गाँव में भागे भागे आए हैं |

वास्तव में देखा जाए तो एक प्रसिद्ध प्रकृतिवादी ईपी जी 1960 के दशक के अंत में इस स्थान को दुनिया भर की सुर्खियों में लाए था। तब से ले कर आज के समय तक जटिंगा गाँव में सितंबर से अक्तूबर के महीने में जितने पक्षियों के झुंड आते हैं उतने ही जीव विज्ञानी भी आते हैं |

इतने वर्षों में हुए कई अध्ययनों ने पक्षियों के आत्महत्या करने की बात को खारिज कर दिया है | अध्ययनों के अनुसार पक्षी आत्महत्या नहीं करते बल्कि गाँव के लोग पक्षियों को भोजन के रूप में खाने की खातिर इन्हें मारने की होड़ में जुट जाते हैं | प्रकृतिवादी लोगों की बात पर गौर करें तो उनके अनुसार स्थानीय आदिवासी पहले कृत्रिम रोशनी या लालटेन का उपयोग करके पक्षियों को लुभाते हैं और फिर बांस के डंडों और अन्य साधनों का उपयोग करके पक्षियों को मार देते हैं |आसाम के सबसे प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी, अनवरुद्दीन चौधरी अपने पत्र में लिखते हैं कि मारे गए ज़्यादातर पक्षी किशोर होते हैं जो रोशनी की ओर अधिक आसानी से आकर्षित हो जाते हैं।

जहाँ विज्ञान अभी भी मात खा जाता है

तार्किक बात पर विश्वास करना किसी के लिए भी ज़्यादा आसान होता है लेकिन एक गुत्थी अभी भी अनसुलझी रह जाती है | ये गुत्थी है कि पक्षी रोशनी की ओर केवल अगस्त से अक्तूबर के महीनों में ही आकर्षित होते हैं और ऐसे में भी मौसम की स्थिति का विशिष्ट होना ज़रूरी है | इस अनसुलझी गुत्थी को सुलझाने में बढ़िया से बढ़िया प्रकृतिवादी भी असफल रहे हैं।

आप चाहे तर्क की ओर झुकाव रखते हों या कहानियों पर, एक बात तो तय है | इस गाँव में कुछ ऐसा रहस्यमय होता है जो मन में दर तो ज़रूर पैदा कर देता है |

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वैसे शांत रहने वाला जटिंगा गाँव | श्रेय : पीएचबसुमाता

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