रहस्यमयी कंकालों से भरी 'रूपकुंड' झील का सफर 

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"रहस्यों के बिना जीवन वाकई में बड़ा नीरस होगा। अगर सब कुछ पहले से पता होगा तो जीने को रह क्या जाएगा?" - चार्ल्स डी लिंट

एक ऐसे ही रहस्य की खोज में मैं भी उत्तराखंड की वादियों में जा पहुँचा।कंकालों से जुड़ी एक अफवाह का पीछा करते हुए घने जंगलों के बीच से होकर घास के मैदानों को पार करके बर्फ में धंसते पैरों को निकाला और अपने चारों ओर फैली कुदरत की खूबसूरती को देखा | मैं रूपकुंड ट्रेक की बात कर रहा हुँ | 

कंकालों की झील के नाम से मशहूर ये ट्रेक बेहद रोमांचक है | 8000 फीट से 16000 फीट की इस चढ़ाई को आप कुछ दिनों में तय कर सकते हैं | इस झील में छुपे रहस्यों के बारे में तो बात होगी ही, लेकिन उससे पहले बता दें यहाँ के सफर में आप और क्या क्या देख सकते हैं।

दीदीना गाँव

एक छोटा सा गाँव जहाँ बिजली भी नहीं आती | रात में गाँव में इतना अंधेरा हो जाता है कि कुछ नहीं दिखता | आसमान में तारे टिमटिमाते हैं | तारे निहारने के लिए ये सही जगह है |

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गाँव के आस-पास चौलाई (एक फसल है जो मुख्य रूप से सब्जी बनाने के काम आती है ) को कई रंगों जैसे गुलाबी, लाल, पीला आदि में उगाया जाता है| इसे अमरन्थ के बीज, 'रामदाना' और राजगीरा के नाम से भी जाना जाता है | होम-स्टे के लिए कुछ झोपड़ियाँ मोजूद हैं। होम-स्टे पर कुछ समय बिताएँ और शांति से छुट्टी का आनंद लें।

पथर नचौनी

स्थानीय भाषा में इस नाम का अर्थ है 'नाचने वाली लड़कियाँ'। एक बार कन्नौज के राजा जसधवल की राज रथ यात्रा के साथ चलने वाली नर्तकियां नाचने लगी | उनकी देवी नंदादेवी ने गुस्से में उन्हें पत्थर में बदल दिया |

फिलहाल कुछ दुकानें और कैंप साइट होने के साथ ये रास्ता अली और बेदनी बुग्याल ट्रेक का एक हिस्सा है।

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अली बुग्याल, बेदनी बुग्याल

बेहद सुंदर नज़ारे !  इतनी ऊँचाई पर स्थित भारत का सबसे ज्यादा फैला हुआ घास का मैदान (चरागाह) है | ये एशिया के ऊँचाई पर बने सबसे बड़े चरागाहों में से एक है | अली बुग्याल और बेदनी बुग्याल मिलकर इतना बड़ा चरागाह बनाते हैं कि यहाँ की हरी घास के नीचे सैकड़ों एकड़ ज़मीन होती है | दोनों बुग्यालों में तरह-तरह के रंगों वाले जंगली फूल खिले रहते हैं |

यहाँ से आपको माउंट त्रिशूल, काली डाक, चौखंबा, नंदा घूंटि और बंदर पूंछ जैसी बर्फ से लदी चोटियों का नज़ारा देखने को मिलता है।

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बेडनी कुंड का साफ पानी धूप में झिलमिलाते ऐसे झिलमिलाता है जैसे आसमान में तारे, साथ ही इसमें माउंट त्रिशूल की शानदार परछाई भी नज़र आती है।

भगवाबासा

कहानियों के मुताबिक एक बार शिव और पार्वती दैत्यों को हराने के बाद इस क्षेत्र से गुज़र रहे थे | पार्वती अपने वाहन शेर पर सवार थी | शिव ने आगे शेर के लिए खाना ना मौजूद होने की वजह से पार्वती को अपनी सवारी का रुख मोड़ने को कहा। जिस जगह पर पार्वती ने शेर को मोड़ा, उसे  ही भगवाबासा कहते हैं |

इस इलाक़े में पत्थरों से बनी वीरान झोपडियाँ हैं।

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रूपकुंड

अब आती है बारी असली रहस्य की। लेकिन इससे पहले ये जान लें कि इस झील का नाम पड़ा कैसे?  कहानियों के हिसाब से शिव और पार्वती के एक सफर के दौरान पार्वती को प्यास लगी तो शिव ने इस झील को बना डाला | जब पार्वती झील में पानी पीने झुकी तो उन्हें पानी खूबसूरत परछाई दिखी- और तभी से इस झील का नाम रूपकुंड हो गया |

रूप कुंड, जिसे रहस्यमयी और कंकालों वाली झील भी कहा जाता है, अपने आस पास बिखरे सैकड़ों मनुष्यों के कंकाल के कारण जानी जाती है | ये झील त्रिशूल पर्वत की गोद में स्थित है |

शोधकर्ताओं ने बताया है कि ये कंकाल 9वीं शताब्दी में भारी ओले पड़ने के कारण  मरे लोगों के हैं | 

इतने मनुष्यों का झुंड एक साथ कहाँ जा रहा था, इस बारे में कुछ बताया नहीं गया है | इस इलाक़े में कोई व्यापारिक रास्ता होने का भी कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है | नंदा देवी राज जत की ओर जाते हुए रूपकुंड एक अहम धार्मिक स्थल है | हर बारह साल में एक बार नंदा देवी राज जत उत्सव मनाया जाता है | यात्रा देवी नंदा को समर्पित होती है, और गढ़वाल व कुमाऊं से खूब सारे लोग इस कठिन मगर पवित्र यात्रा में शामिल होते हैं।

बोनस : रूप कुंड से वापिस लौटते हुए आने वाली जगहें

मिनफ़र

उतरते हुए मिनफ़र के पास पूरे ट्रेकिंग रूट का बेहतरीन नज़ारा देखने को मिलता है | आपको बेडनी बुग्याल और पूरे रूट का अद्भुत स्वरूप दिखता है |

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वान गाँव

वान गाँव काफ़ी शांतिपूर्ण है | यहाँ लातू देवता का काफ़ी प्रसिद्ध मंदिर  है | राज्य में इस जगह को लातू मंदिर के नाम से जानते हैं |

उत्तराखंड में मानते हैं कि लातू देवता यहाँ की देवी नंदा के भाई हैं | इस मंदिर के दरवाज़े साल में सिर्फ़ एक बार खुलते हैं | यहाँ मौजूद भिक्षु को भी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध कर भगवान का परदा हटाना होता है | वान गाँव राज जत यात्रा, जो हर 12 साल में उत्तराखंड में होने वाली सबसे बड़ी यात्रा है, का 12वाँ पड़ाव है |

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इस मंदिर के आस पास ऐसे पेड़ भी हैं जिनके तने 12 से 14 फीट चौड़े हैं | ये उत्तराखंड के सबसे लंबे और पुराने पेड़ हैं |

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