लेडी डाकू, चमत्कारी हनुमान और अंधे लुटेरे: चंबल के सीने में और क्या रहस्य दफ़्न हैं?

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पहाड़ों और जंगलों से घिरा होने की वजह से माचू पिचू बाहर की दुनिया से अछूता था | ऐसे ही चंबल घाटी का एक मंदिर भी उबड़ खाबड़ पर्वतों और सूखे जंगलों से घिरा गिरा होने की वजह से छुपा था | और हो भी क्यों ना | यह बंजर बियाबान कभी डाकुओं की रानी फूलन देवी का अड्डा हुआ करता था | जब भी रेलगाड़ी घाटियों के करीब होकर गुजरती थी तो रेल यात्री डाकुओं के डर से अपने आप को संडास में बंद कर लेते थे | इस आतंक का परिणाम था 1000 साल पुराना मंदिर जो बाहरी दुनिया से कटा हुआ रहा |

बटेश्वर मंदिर 

स्थानीय लोगों का मानना है कि बटेश्वर मंदिर परिसर की असली सुंदरता और जादू अभी भी बरकरार है क्योंकि डाकुओं की वजह से सैलानी और सरकार दोनों इससे हमेशा ही दूर रहे हैं | यहाँ के लोग दो और कहानियां बड़े मजे से सुनाते हैं | पहली भूपेश वाड़ा के करीब 200 भव्य मंदिरों की है | यहां के लोग कहते हैं कि जब मुगलों ने भूपेश वाड़ा के शिव मंदिरों को नष्ट करना चाहा तो वे दैवीय शक्तियों के कारण अंधे हो गए | 

दूसरी कहानी के अनुसार जब भारतीय सरकार ने इस मंदिर परिसर का बीड़ा उठाकर यहां की हनुमान की एक मूर्ति को सरकाना चाहा तो बड़ी से बड़ी मशीन का प्रयोग करने के बाद भी वह मूर्ति को 1 इंच भी नहीं सरका पाए |  आज भी सिंदूर में लिपटी वह हनुमान की प्रतिमा वही विराजमान है जहां 10 वीं शताब्दी में थी | 

बलुआ पत्थर पर उकेरे गए मंत्रों से बना भूतेश्वर का मंदिर आठवीं और दसवीं शताब्दी के बीच बना था | मंदिर के आसपास की पहाड़ियां और हरे-भरे जंगल इस मंदिर को एक अलग ही भव्यता देते हैं | शिव और विष्णु को समर्पित यह मंदिर महीन कारीगरी और विशाल गुंबद के साथ शिल्पकारी की मिसाल है | महीन नक्काशी की कारीगरी हिंदू महागाथा को बयान करती है | सभी मंदिरों की दशा एक जैसी नहीं है लेकिन फिर भी मंदिरों ने समय की मार को सराहनीय रूप से झेला है | 

कब जाएं :  बटेश्वर मंदिर जाने का सबसे बढ़िया समय सितंबर से मार्च के बीच मानसून के मौसम में है, जब मौसम 10 से 30 सेल्सियस के बीच बहुत सुहाना हो जाता है | 

पहुंचने का रास्ता

हवाई जहाज द्वारा : यहां से 30 किलोमीटर दूर ग्वालियर का राजमाता विजयाराजे सिंधिया एयर टर्मिनल सबसे नजदीकी हवाई अड्डा है | यहां से हर रोज दिल्ली से ग्वालियर का एक जहाज उड़ान भरता है |

रेलगाड़ी द्वारा:  बटेश्वर मंदिर से 14 किलोमीटर दूर नूराबाद में सबसे करीबी रेलवे स्टेशन है | मगर नूराबाद से आपको आगे जाने के साधन मिलने में मुश्किल होगी | ऐसे में बेहतर है कि आप यहां से 35 किलोमीटर दूर ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर उतरे और वहां से एक किराए की टैक्सी लेकर मंदिर तक पहुंचे | 

सड़क मार्ग द्वारा : दिल्ली से करीब 353 किलोमीटर दूर स्थित बटेश्वर मंदिर तक ताज एक्सप्रेस हाईवे द्वारा पहुंचने में 6 घंटे लगते हैं | कानपुर से 260 किलोमीटर दूर, जयपुर से 324 किलोमीटर, और लखनऊ से 332 किलोमीटर दूर स्थित बटेश्वर मंदिर हफ्ते के अंत में एक छोटी सड़क यात्रा का मजा लेने के लिए एक उत्तम स्थान है |

कहां ठहरे 

यहां से 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्वालियर ठहरने की सबसे अच्छी जगह है | होटल आनंद पैलेस में ₹800 का डबल रूम और डेरा हेरिटेज हवेली में ₹2700 का डबल रूम मिल जाता है | और विकल्पों के लिए यहां देखें |

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