लेडी डाकू, चमत्कारी हनुमान और अंधे लुटेरे: चंबल के सीने में दफ्न हैं अनूठे राज़

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Photo of लेडी डाकू, चमत्कारी हनुमान और अंधे लुटेरे: चंबल के सीने में दफ्न हैं अनूठे राज़ 1/1 by आज़ाद परिंदा सिद्धार्थ

चंबल की घाटी की वजहों से भारत की एक जानी मानी जगहों में से एक है लेकिन फिर भी यहाँ ज़्यादा लोग घूमने जाने को तो नहीं सोचते। इसी वजह से चंबल घाटी का एक मंदिर उबड़ खाबड़ पर्वतों और सूखे जंगलों से घिरा गिरा होने की वजह से छुपा था | और हो भी क्यों ना,यह बंजर बियाबान कभी डाकुओं की रानी फूलन देवी का अड्डा हुआ करता था | जब भी रेलगाड़ी घाटियों के करीब होकर गुजरती थी तो रेल यात्री डाकुओं के डर से अपने आप को संडास में बंद कर लेते थे | इस आतंक का नतीजा था 1000 साल पुराना मंदिर जो बाहरी दुनिया से कटा हुआ रहा |

बटेश्वर मंदिर

स्थानीय लोगों का मानना है कि बटेश्वर मंदिर परिसर की असली सुंदरता और जादू अभी भी बरकरार है क्योंकि डाकुओं की वजह से सैलानी और सरकार दोनों इससे हमेशा ही दूर रहे हैं | यहाँ के लोग दो और कहानियाँ बड़े मज़े से सुनाते हैं | पहली भूपेश वाड़ा के करीब 200 भव्य मंदिरों की है | यहाँ के लोग कहते हैं कि जब मुगलों ने भूपेश वाड़ा के शिव मंदिरों को नष्ट करना चाहा तो वे दैवीय शक्तियों के कारण अंधे हो गए |

दूसरी कहानी के अनुसार जब भारतीय सरकार ने इस मंदिर परिसर का बीड़ा उठाकर यहाँ रखी हनुमान की एक मूर्ति को सरकाना चाहा तो बड़ी से बड़ी मशीन का प्रयोग करने के बाद भी वह मूर्ति को 1 इंच भी नहीं हिला पाए | आज भी सिंदूर में लिपटी वह हनुमान की प्रतिमा वहीं विराजमान है जहाँ 10 वीं शताब्दी में थी |

बलुआ पत्थर पर उकेरे गए मंत्रों से बना बटेश्वर आठवीं और दसवीं शताब्दी के बीच बना था | मंदिर के आसपास की पहाड़ियाँ और हरे-भरे जंगल इस मंदिर को एक अलग ही भव्यता देते हैं | शिव और विष्णु को समर्पित यह मंदिर महीन कारीगरी और विशाल गुंबद के साथ शिल्पकारी की मिसाल है | महीन नक्काशी की कारीगरी हिंदू महागाथा को बयान करती है | सभी मंदिरों की दशा एक जैसी नहीं है लेकिन फिर भी मंदिरों ने समय की मार को सराहनीय रूप से झेला है |

कब जाएँ बटेश्वर मंदिर

बटेश्वर मंदिर जाने का सबसे बढ़िया समय सितंबर से मार्च के बीच मॉनसून के मौसम में है, जब तापमान 10 से 30 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है और मौसम बहुत सुहाना हो जाता है |

कैसे पहुँचे बटेश्वर मंदिर

हवाई जहाज द्वारा : यहाँ से 30 कि.मी. दूर ग्वालियर का राजमाता विजयाराजे सिंधिया एयर टर्मिनल सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा है | यहाँ से हर रोज दिल्ली से ग्वालियर का एक जहाज उड़ान भरता है |

रेलगाड़ी द्वारा: बटेश्वर मंदिर से 14 कि.मी. दूर नूराबाद में सबसे करीबी रेलवे स्टेशन है | मगर नूराबाद से आपको आगे जाने के साधन मिलने में मुश्किल होगी | ऐसे में बेहतर है कि आप यहाँ से 35 कि.मी. दूर ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर उतरे और वहाँ से एक किराए की टैक्सी लेकर मंदिर तक पहुँचे |

सड़क मार्ग द्वारा : दिल्ली से करीब 353 कि.मी. दूर स्थित बटेश्वर मंदिर तक ताज एक्सप्रेस हाईवे द्वारा पहुँचने में 6 घंटे लगते हैं | कानपुर से 260 कि.मी. दूर, जयपुर से 324 कि.मी., और लखनऊ से 332 कि.मी.दूर स्थित बटेश्वर मंदिर हफ्ते के अंत में एक छोटी सड़क यात्रा का मज़ा लेने के लिए एक उत्तम स्थान है |

यात्रा पर कहाँ ठहरें

यहाँ से 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्वालियर ठहरने की सबसे अच्छी जगह है | होटल आनंद पैलेस में ₹800 का डबल रूम और डेरा हेरिटेज हवेली में ₹2700 का डबल रूम मिल जाता है |

कभी बटेश्वर मंदिर या फिर मध्यकालीन शिल्पकारी की किसी और अद्भुत जगह गए हैं? अपनी यात्रा की कहानी लिखें और अपने जैसे लाखों से यात्रियों के साथ बाँटे |

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