कर दे पावन हर एक मन का कोना

Tripoto
19th Aug 2019
Photo of कर दे पावन हर एक मन का कोना by Amit Lokpriya
Day 1

#सतबहिनी मंदिर

कर दे पावन हर एक मन का कोना

अम्बा से औरंगाबाद की ओर जाते राष्ट्रीय राजपथ 139 पर अम्बा में एक मंदिर आबाद है। सतबहिनी माता का मंदिर । नाम कैसे पङा स्पष्ट नहीं है। शाब्दिक अर्थ से इतना ही पता चलता है कि सात बहनें रही होंगी,सती बहनें होंगी, सत्य वाहिनी होंगी। ग्राम देवता वाली दंत कथाएं इस मंदिर के साथ भी जुङी हुई हैं। बतरे नदी पार के गांव चिल्हकी के स्थानीय जमींदार महाराज पांडेय के द्वारा इस मंदिर को बनवाया गया था। चिल्हकी पुराना गांव है जो राजस्व दस्तावेजों में भी दर्ज है। स्थानीय लोगों के साथ साथ पूरे जिले में इस मंदिर की ख्याति रही है। बरगद के वृक्ष के नीचे मङईनुमा इस मंदिर में एक कतार में सात पिंड मिट्टी गारे से बने हुए थे जिसे स्थानीय सुनार बुलक प्रसाद ने पीतल के आवरण से मढवाकर भव्यता प्रदान कर दिया। कुछेक वर्ष पूर्व एक आंधी में बरगद गिर पङा और मंदिर प्रकृति की मार को झेल नहीं सका। हजारों की भीङ ने भग्नावशेषों के बीच प्रण लिया कि इसे पुन: बनाया जाना चाहिए पहले से अधिक भव्यता के साथ। यह उनका सामाजिक दायित्व था जिसे वह छोङ नहीं सकते थे। पुण्यार्जन का लोभ भला किससे छोङा जाता है ! जब उनके नाम दानी के रूप में शिलापट्ट पर खोदे जायेंगे तब इहलोक में प्रतिष्ठा बढ ही जायेगी और चिरकाल के लिए अशोक के अभिलेख की तरह उनके नाम का ध्वज पताका फहराते रहेगा। दानी यह भी जानते हैं कि लोगों की स्मृतियों में वही बचा रहेगा जो सूची में शीर्षस्थ स्थान पर विराजमान है। चंदा हुआ और करीब एक करोङ की लागत से द्रविङ मंदिर की शैली में दक्षिण भारतीय राजमिस्तरी की देखरेख में मंदिर बनकर फिर से उठ खङा हुआ। ट्रस्टी के तहत नियुक्त पुजारियों के सोये भाग फिर से जाग उठे। आज यह मंदिर सामूहिक पहल का अद्भुत प्रतीक के रूप में सतबहिनी माता की गीत गा रहा है। भक्तों की आस्था दूनी हो गई है। भव्यता वहाँ से गुजर रहे अनजान श्रद्धालुओं के भी पग रोक देती है । निहारते रहो । पहले और अब में जो फर्क है उससे लगता है कि देवता भी पूंजी खोजते हैं !

सतबहिनी मंदिर निम्न वर्ग के उन लोगों के लिए किसी न्यायालय से कम नहीं जिनकी विश्वसनीयता समाज में प्रायः संदिग्ध रहती है । लोगों के किसी आरोप की लाख सफाई के बाद भी बात नहीं बनती तब आरोपी के लिए एक ही दरबार है और वह 'सत्य वाहिनी' को साक्षी मानकर अपनी सफाई का अंतिम दांव मार जाता है। शून्य खर्च और बिना शारीरिक पीङा झेले  पल भर में जनमत बदलना शुरू ।
"किरिया खा गया ...मतलब दोषी नहीं है।"
"गलत बोलेगा तो हाथ पैर गल कर गिर नहीं जायेगा !!"
आस्था के इस रूप से कुछ लोग फायदा भी उठा लेते होंगे और उठाते भी हैं लेकिन यह तो मानना ही पङेगा कि यदि ईश्वर का डर नहीं होता तो समाज को नियंत्रित करना किसी सरकार की औकात से तो बाहर ही होता। सरकार अपराध की सजा सुना सकती है लेकिन पाप का क्या ! प्राचीन से आधुनिक में हम आ गये। धर्मशास्त्रीय न्याय प्रणाली बदलकर संविधान सम्मत न्यायपालिका में कायांतरित हो गई। सक्षम सरकारें या यूं कहें कि क्रूर हुकूमतें भी आयीं गयीं अपराध नहीं खत्म हो सके। ईश्वर आम आदमी को न्यायसंगत मार्ग पर चलने का आत्मबल देता है और पाप का दंड भी। सब जगह सभी समय सरकारी आंखें झांकती -ताकती तो नहीं रह सकतीं न ! अपराधी अपने अपराध का सबूत कानून के लिए भले न छोङे पाप के सबूत तो उसके खुद के दिल में छूट ही जाते हैं। हिट एंड रन के बाद सलमान खान अपने को काफी हद तक बदल चुके हैं। Being Human !! ...शायद यही ईश्वर की ताकत है। सतबहिनी मईया की जय....।

जो लोग विवाह को सामाजिक हैसियत प्रदर्शित करने का जरिया बनाने में सक्षम नहीं हो पाते उनका पनाहगार भी बनता है सतबहिनी मंदिर । प्रांगण में होने वाले विवाह के अवसरों के दोहन के लिए कई निजी विवाह मंडप बने हुए हैं और मंदिर के पुनर्जीवन के बाद इनकी संख्या बढती ही जा रही है। कुणाल विवाह मंडप सबसे पुराना है। अब अनुराग, खुशबू, चौधरी और कनक जैसे कई नाम वाले मंडप मंदिर की ऊंचाई से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। भक्ति और आस्था के बीच व्यवसाय, ईश्वर को साक्षी बनाकर ...।

सावन के आद्रा में यहाँ एक मेला लगने का चलन गत बीस पच्चीस वर्षों से शुरू हुआ है जो आज एक बङे उत्सव का रूप ले चुका है। कोई दिन भीङ एक लाख तक पहुंच जाती है। इन दिनों पुजारी की कर्मकांडी गति हवाई जहाज सरीखे बन जाती है। आखिर इतनी गति से ही तो सभी भक्तों को भगवान से मिलवाया जा सकना संभव है। लेकिन इस शारीरिक पस्ती के बावजूद मन से पुजारी मस्त ही रहते हैं । चढावा ....!! घर में लात जूता से नारी का मर्दन करने वाला नर ,नारी के मंदिर में नारियों की भारी भीङ इकट्ठा होने देता है और उसका साक्षी सतबहिनी मंदिर भी बनता है तो इसलिए कि सारा समाज ही कई अंतर्विरोधों को अपने भीतर पचाने की कला विकसित कर चुका है। सतीप्रथा समाप्त होते उसमें निहित 'देवत्व' भी क्षरित हो चला। ऐसे में कमसे कम 'सती बहनों' के सामने तो सर झुकना ही चाहिए ! ...इत्मीनान रखिये साल भर जी भर स्थानीय बाजार से खरीदारी के बावजूद महिलायें मंदिर के आस पास की खाली जमीन पर आद्रा में लगने वाले मीना बाजार में जरूर हाजिरी लगायेंगी। पता नहीं सस्ता में कुछ नायाब हाथ लग जाये तो संबंधियों में शेखी बघारने में सहूलियत होगी !
" एने बाजार में तो ई मिलबो ना करतई...! ..."

प्रदर्शन कलाओं के व्यवसाय के गणित में सबसे पक्का फार्मूला यह होता है कि महिलाओं की भीङ खींचने के तरीके कितने व्यवस्थित हैं। महिलाएं हों तो बच्चे साथ रहेंगे ही। आद्रा मेला उनको निराश नहीं करता । अप्पू घर अपने  देहाती रूप में मशीन चालित चरखी और रेलगाङी,नाव या बाइक की शक्ल की कुर्सियों वाले वाहन का मजा उपलब्ध कराता है। छोटे बच्चों के लिए बैठकर घूमने वाले लकङी के घोङें होते हैं तो फिसलने के लिए प्लास्टिक का ढलुआ थैला। बच्चों के बहाने बङे भी अपने बचपन में रह गयी कमी को पूरा कर लेते हैं।  सबसे रोमांचक मौत का कुआं वाला खेल होता है। दो मोटर साइकिलों के बीच मारूति कार का गोलचक्कर में घुमना सांसों को ठहरा देता है।
खेल खत्म और शेष रह जाता है बस धुआं ही धुआं !!

कैसे पहुंचे :- अम्बा नेशनल हाइवे 139 पर स्थित है जो नेशनल हाइवे 2 से जुङा हुआ है । नजदीकी रेलवे स्टेशन अनुग्रह नारायण रोड, नवीनगर रोड, गया है । हवाई मार्ग से आने वाले गया, पटना, वाराणसी हवाईअड्डा पर उतर कर टैक्सी ले सकते हैं ।
कहां ठहरें :- कुणाल विवाह मंडप, अनुराग विवाह मंडप, विमला विवाह मंडप अथवा औरंगाबाद के किसी होटल में ।

क्या खरीदें :- यहां का गुङ का लड्डू प्रसिद्ध है ।

By Amit Lokpriya
amitlokpriya@gmail.com

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