भारतीय इतिहास में माना जाता है की रणथंबोर का नाम नक्षत्र मंडल में चमकते सूर्य के समान है। वर्तमान युग में रणथंबोर की कीर्ति दो कारणों से है।प्रथम, यह लगभग एक हजार वर्ष, पुराना ऐतिहासिक अविजित प्राचीनतम दुर्गों मैं से एक है ।दूसरा कारण अनुपम वन्यजीव शरणस्थल एवम् प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर चर्चित बाघ संरक्षण परियोजना स्थल है। मध्य युगीन भारतीय इतिहास में रणथंबोर का नाम एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप मैं उभरकर आता है।रणथंबोर अनेक पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा दुर्गम किला है।
रणथंबोर दुर्ग की प्रचारों ने अनेक देशी विदेशी योद्धाओं बादशाहों और राजामहराजाओं को अपनी खंदकों के पार वर्षों तक खाक छानते हुआ देखा है।
विंध्याचल एवम् अरावली पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा रणथंबोर किला अपनी प्राकृतिक बनावट का अद्वितीय उदाहरण है।वर्षों तक गुलाम खिलजी आदि वंशों के बादशाह इसका लोहा मानते रहे।नीदरलैंड के प्रिंस बर्नहार्ड एवम् महारानी एलिजाबेथ ने इस दुर्ग को देख कर कहा की "ऐसा सुरक्षित दुर्भेद्य एवम् प्राकृतिक विशाल दुर्ग विश्व मैं कहीं नहीं है"।यह दुर्ग ऊंची पहाड़ी के पत्थर पर स्थित है। प्राकृतिक सुरक्षा ने इसे इतना आचादित कर दिया है कि इसके दर्शन मुख्य द्वार पर जा कर ही किए जा सकते हैं।इसकी प्रचार से मिलों दूर तक दुश्मन की निगरानी की जा सकती है।
रणथंबोर दुर्ग हजारों वर्ष पूर्व की अनुपम एवम्अद्वितीय संरचना है जो किसी मानव की सूझ बूझ और शक्ति का परिणाम हो सकती है।
इस स्थान की पहाड़ी घाटियों में वर्षा का मौसम सुहावना होता है। चारों तरफ सघन हरियाली फैली रहती है।चट्टानों से निर्मित झरने एवम् इनके आंचल में शिव मंदिर यहां की विशेषता है। यह स्थान प्राचीन काल में ऋषि मुनियों की साधना और उपासना का केंद्र रहा है।
रणथंबोर मैं देसी विदेशी सैलानियों को पसंदीदा पर्यटन स्थल है।अति विशिष्ट जनों और पर्यटकों का प्रतिशत साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है।यहां के मनमोहक दृश्य लुभावने होते हैं।बहुत से दृश्य आखों में बसने लायक होते हैं।
पर्यटन के दृष्टिकोण से यह स्थान महत्वपूर्ण है।
पर्यटन मंत्रालय इस जगह के विकास को वरीयता श्रेणी में रखे हुए है। यहां सभी प्रकार की आवासीय सुविधाएं हैं।स्थानीय निवासियों के लिए भी आय के साधन विकसित हुए हैं।इस स्थान का नाम अंतरराष्ट्री पटल पर इंगित हो गया है।
काम से कम एक बार तो अवश्य ही यहां जाने का कार्यक्रम बनाइए।


























