क्या पता कौन सा मोड़ जिंदगी का आखिरी मोड़ हो?

Tripoto
5th Jul 2022
Photo of क्या पता कौन सा मोड़ जिंदगी का आखिरी मोड़ हो? by Pankaj Mehta Traveller
Day 1

         एक दिन अनिमेष की शॉप पर साइकिल ले कर गया था कुछ रिपेयर के काम से तब बातो बातो में अनिमेष ने बताया की दोईमारा से टेंगा वैली के लिए एक रास्ता है जो indio-chaina वार के समय यूज़ हुआ था।लेकिन जब भालूखपोंग रोड बन गयी तो करीब 1990 में ये रास्ता बंद कर दिया गया।धीरे धीरे ये रास्ता लैंडस्लाइड और जंगली जानवरों के उत्पात के कारण खत्म ही होता गया।

Photo of Eaglenest Wildlife Sanctuary by Pankaj Mehta Traveller

      वैसे तो यहाँ पर eagle nest wildlife santuary है जहाँ  गाड़ी से टैगा वैली से तो आया जा सकता है, लेकिन दोईमारा से यहाँ पर सिर्फ पैदल या साइकिल से ही जाया जा सकता है।बाइक या कार से जाना असंभव है क्यों की बीच में पुल टूटा हुआ है और बहुत सी जगह लैंडस्लाइड भी हुआ है।

     अनिमेष ने जब इस साहसिक साइकिल यात्रा का जिक्र किया तो मन में बुलबुले फूटने लगे। अनिमेष और कौशिक पहले बाइक से दोईमारा तक जा चुके थे और तब ही उन दोनों को इस रास्ते की जानकारी हुई थी। अनिमेष की बात सुनकर में भी थोड़ी जानकारी लेने के लिए जनवरी में साइकिल से दोईमारा तक गया था लेकिन ज्यादा कुछ जानकारी हाथ नहीं लगी।

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       बहुत दिनों से इस रास्ते पर जाने का प्लान जो बन रहा था होली के दिन जाने का फाइनल हुआ। जाने से 2 दिन पहले सामान की लिस्ट बनाई गयी। रास्ते में जंगली जानवरो के खतरों को देख कर हम लोगों ने एक दाव ( हथियार ) साथ में रखने पर जोर दिया। जो जानवरो के साथ साथ हमारे रास्ते को साफ करने के काम आयेगा।

       होली खेलने के बाद 18 मार्च को मैं अनिमेष कलिता  और कौशिक बोरा  तीनों करीब दिन में 2 बजे तेज़पुर से दोईमारा जो अरुणाचल प्रदेश में था की ओर चल दिए। हम तीनों के पास साइकिलिंग का अच्छा खासा अनुभव था।अनिमेष तेज़पुर से लेह और तवांग जैसी कठिन साइकिल यात्रा कर चूका है और वर्तमान में तेज़पुर में एक साइकिल की दुकान का मालिक है जबकी कौशिक पेशे से एक इंजीनियर है और आसम और आस पास के राज्यों को साइकिल से नाप चूका है. मैं आसाम उत्तराखंड साइकिलिंग कर चूका था।

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       पहले का 60 km रास्ता प्लेन था और लास्ट के 15 km का रास्ता पहाड़ी था।अंधेरा होने तक हम लोगो ने 60 km का सफर तय कर लिया। नॉर्थ ईस्ट में अंधेरा जल्दी हो जाता है,जो हमारे लिए एक बड़ी बाधा थी। अँधेरे होने से पहले हमको रात का खाना भी पैक करना था क्युकी जब तक हम अपनी आज की मंजिल दोईमारा पहुँचते तक तक काफ़ी देर हो जानी थी और वहाँ का एक मात्र होटल बंद हो जाना था इसका हमको इल्म था।

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        हमने एक जगह पर रुक कर  इतनी चाउमीन खा ली की हमको रात को खाने की जरुरत ही न पड़े।वहाँ पर हमारे पास चाउमीन के अलावा कोई ऑप्शन नहीं था।वैसे हमने तेज़पुर से अपने पास उबले अंडे और बहुत सारी चॉकलेट रख ली थी लेकिन उनको हमने अगले दिन के लिए बचा कर रखा था क्युकी अगला दिन हमारे लिए एक चुनौती साबित होने वाला था।

      करीब 7 बजे हम लोग असम - अरुणाचल बॉर्डर पर पहुँच चुके थे जहाँ हमको एक चिंता थी की हमको ILP के लिए रोका जा सकता है। मगर वहाँ हमको कुत्ते तक ने भी नहीं पूछा। थोड़ी आगे जा कर एक ऑटो वाला मिला उसने आज आगे जाने के लिए मना किया। उसने बताया आगे बहुत सारे हाथी का झुण्ड रोज आते रहता है और आगे का रास्ता पहाड़ी है।उसने सुझाव दिया की पीछे जा कर जहाँ हमने खाना खाया था वहाँ ही आज रुक लो और कल सुबह चले जाना।

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       लेकिन अगर हम पहले दिन ही हार मान लेते तो ये यात्रा कभी पूरी हो ही नहीं पाती। एक बात सबको बोल दी भाई लोगों हिम्मते मर्दा तो मदद ए खुदा। वैसे ये बात सुन्नने में अच्छी लगती है लेकिन जब ऐसी सिचुएशन में पड़ते हैं, तो ये कहावतें ऐसी लगती हैं जैसे इसका वास्तविकता से कोई लेना देना ही न हो। जैसे तैसे हम सब ने मन को समझाया और आगे की ओर चल दिए। आगे का रास्ता था तो ठीक ठाक ही यहाँ पर एक बार पहले भी आना हुआ था लेकिन तब दिन में आना हुआ था और इस बार अँधेरे में। 15 km तक एक भी घर नहीं था सिर्फ जंगल ही जंगल था  और कुछ था तो हाथियों का डर।

     हाथी की टट्टी पुरे रास्ते भर पड़ी थी लेकिन सब कुछ दिन पहले की थी।अगर उस समय फ्रेश टट्टी दिख जाती तो हम लोगों की फट के चार हो जाती।लेकिन ये तो अभी हमारे सफर की शुरुआत थी आज का तो हमको रास्ता पता था कल कैसा होगा इसका हमको कोई अंदाजा नहीं था। 10 km तक फटते फटाते हम जैसे ही आगे पहुंचे तो एक ऑटो आगे से आता दिखा उसको देख कर सारा डर चला गया और अब हम कन्फर्म हो चुके थे की आगे हाथी नहीं है।लास्ट का 3 km पूरा डाउन था जिसको तय करने में हमको जरा भी समय नहीं लगा. 

     8 बज कर 30 मिनट पर हम दोईमारा गाँव में थे।वहाँ जा कर पता चला की उस गाँव में टोटल 22 परिवार थे। जिसमें से 3 बौद्ध धर्म को मानने वाले shertukpens थे। 5 नेपाली थे कुछ आदि और बाकी आसामी थे। shertukpens ट्राइबस का उस दिन कोई फेस्टिवल था तो वो लोग बहुत खुश थे।हमको वहाँ पर वो ऑटो वाला भी मिला जिसने हमको आगे जाने के लिए मना किया था।वो हमको देख कर बहुत खुश हुआ। उसने हमको टेंट लगाने के लिए जगह बताई।

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        टेंट लगा कर हम लोग shertukpens लोगों के पास पानी के लिए गये और उन्होंने हमको खाने के लिए भी कुछ दिया और हमको डांस के लिए भी invite किया।कुछ समय बाद हम वापस टेंट में आ गये और अगले दिन की योजना बनाने लग गये।अगले दिन रास्ता कैसा होगा हमको इसका कोई भी आईडिया नहीं था इतना तो तय था की आज से ज्यादा कल खतरा होगा,लेकिन आगे कहाँ रुका जा सकता है खाना मिलेगा या नहीं इसका कोई भी अंदाजा नहीं था हमको।

       कुछ समय बाद गाँव का एक नेपाली बंदा हमसे मिलने टेंट में आया। उस से काफी समय बात हुई हमारी।उसने बताया दोईमारा से खेलोंग जो की करीब 7 km है तक चीते का खतरा है और आगे पुरे रास्ते भर हाथी, जंगली कुत्ते और मिथुन का खतरा है। जाने को गाँव के बहुत से लोग रूपा तक शार्ट रास्ते से पैदल जाते हैं लेकिन उनको रास्ता पता होता है, और वो अपने साथ हाथी और बाकी जानवरों को भगाने के लिए पटाके ले कर और हथियार ले कर जाते हैं। उसने साफ तौर पर आगे जाने से मना कर दिया बोला जान है तो जहान है।

     खाने और रहने के लिए पूछने पर पता चला की वहाँ से करीब 35 km चलने के बाद bomphu camp में रहने और खाने को मिल सकता है।अगर वहाँ पर इस समय टूरिस्ट आया होगा तो। मतबल खाने और रहने का पक्का कुछ नहीं था। खेलोंग से ले कर लामा कैंप तक का पूरा रास्ता करीब 70 km eagle nest wild life santuary के अंदर आता है और ये जगह bird watching के लिए फेमस है और यहाँ पर टूरिस्ट केवल टेंगा के रास्ते से आ सकता है और हम उल्टे रास्ते से जाने का प्रयत्न कर रहे थे जो की ख़तरनाक था और इसमें हमारी जान भी जा सकती थी.खेलोंग और लामा कैंप के बीच में ही था बोम्पू कैंप।

उसके जाने के बाद मैंने बाकी अपने दोनों साथियों से पूछा क्या करना है और दोनों का जवाब पॉजिटिव था चल कर देखंगे वैसे इस जवाब की ही उम्मीद थी मुझे उन दोनों से।

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Day 2

      अगले दिन पास के होटल से ही एक कड़ाई मैग्गी खायी और 12 लीटर पानी अपने पास रख लिया और 8 बजे चल दिए लाइफ के एक और एडवेंचर के लिए।वैसे ये जंगल वाला एडवेंचर थोड़ा अलग था होने को तो एक बार काजीरंगा नेशनल पार्क में भी बिना परमिशन के चोरी चोरी घुस गया था, लेकिन वो कम समय के लिए था जबकी यहाँ तो हमको 2 दिन और एक रात गुजारनी थी।

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     5  km तक रास्ता ठीक था।इतना तो पता चल गया था की अब पूरा 75 km हमको अपहिल ही मिलेगा।5 km बाद एक पुल मिला जो टुट्टा हुआ था जिसका निर्माण कार्य प्रगति पर था।वहाँ पर साइकिल को कंधे में रख कर पार करना पड़ा. मतलब अब ये कन्फर्म हो गया था की उस जगह से आगे गाड़ी या बाइक आगे नहीं जा सकती।जा सकती है तो सिर्फ साइकिल और इंसान,और हम थे साइकिल वाले 3 इंसान।

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       कुछ दूर तक तो रास्ता पक्का था और थोड़ा सा चौड़ा था थोड़ा सा हाँ ज्यादा नहीं।खेलोंग पहुंचते पहुंचते रास्ता पगदंडी बन चूका था। खेलोंग तक हमको चीता वाली बात याद थी। दिन का उजाला होने की वजह से डर थोड़ा कम था।खेलोंग पहुंचे तो वहाँ फारेस्ट का एक घर बना मिला जिसमें एक लड़का था उस से पानी की बोतल भरा ली उसने बताया यहाँ से आगे साइकिल से जाना लगभग मौत को गले लगाना है।आगे बहुत से हाथी हैँ जो दिन में भी रास्ते में आ जाते हैं. अब तक तो हमने भी सोच ही लिया था जब ओखली में सर डाल ही दिया है तो मुसल से क्या डरना है।अब तो हाथी अपने पुरे रास्ते का साथी ही था।

    खेलोंग में ज्यादा समय बर्बाद न करते हुए हम आगे बढ़ गये सफर लम्बा था और रास्ता ख़राब ऊपर से हाथी मेरा साथी। थोड़ा आगे बड़े ही थे तो फोटोग्राफर से भरी हुई एक गाड़ी आयी हमारी उल्टी साइड से यानि की बोम्पू कैंप से उसमें बैठे एक इंसान ने हमको बताया आगे हाथी है सावधानी से जाना रास्ते के इधर उधर देख कर आराम से जाना। अब थोड़ा डर लगना शुरू हो गया था।

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      अब हम लोग प्लान करने लग गये अगर हाथी मिल जाता है तो हमको सबसे पहले क्या करना है फिर ख्याल आया की हम क्या करेंगे जो भी करेगा हाथी करेगा।क्राइम पेट्रोल की सावधान रहिये सतर्क रहिये लाइन को मन में रख कर हम आगे चल दिए।

      पहाड़ो पर लिखा रहता है मोड़ो पर सावधान और हम लोग मोड़ो पर सबसे ज्यादा सावधान थे।क्या पता कौन से मोड़ पर हमारा साथी मिल जाये और बोल दे " तुम मुझे वहाँ ढूंढ रहे हो और मैं तुम्हारा यहाँ इंतजार कर रहा हूँ ". " तुम इंसानो ने हमारे इलाके में रोड बना दी है और आज ऊंट आया है पहाड़ के नीचे अब मैं भी देखता हूँ तुमको मुझसे कौन बचाता है " क्या पता कौन सा मोड़ जिंदगी का आख़री मोड़ हो.

     एक मोड़ पर तो हार्ट अटैक होते होते बचा। हुआ यूँ की मैं अपने दोनों साथियों से थोड़ा आगे निकल गया था।जैसे ही मैं मोड़ पर पहुँचा तो मुझे जोर से एक आवाज सुनाई दी वो आवाज थी दो बड़ी बड़ी चिड़ियों की जो मेरी आहट से अपने बड़े बड़े पंखो को जोर जोर से छटपटाते हुए वहाँ से उड़ गयी।सुनसान जंगल में अगर एक पिन भी 100 मीटर दूर गिरता तो उसकी आवाज़ भी सुनाई देती फिर ये तो बड़ी घटना थी।दिल एक बार तो धक्क कर दिया लेकिन जल्दी मैंने उसको संभाल लिया वैसे कुछ लड़कियों ने मुझे दिल सँभालने की कला में Phd करा दी है। धन्यवाद उनका भी। 

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     आगे एक जंगली बिल्ली भी दिखाई दी जो पेड़ में चड़ कर कूद रही थी।वो थोड़ा थोड़ा पांडा जैसी भी थी।थोड़ा दूर ही गया था तो एक सांप साइकिल के नीचे आ गया मुझे लगा मर गया मैंने साइकिल से उतर कर देखा तो जिन्दा था।आगे हाथी की बिल्कुल फ्रेश टट्टी मिली तो तब लगा अब हाथी भी मिलेगा और मैं रुक गया अपने साथियों के लिए।

   जैसे ही दोनों आ गये तीनो चल दिए अब चलते चलते 6 घंटा हो गया था और हम सिर्फ 24 km ही चल पाये थे।बहुत जगह तो हमको पैदल भी चलना पड़ा रास्ता ही ऐसा था। अब सबको बहुत थकान हो गयी थी।हमने अंडे निकाले और टूट पड़े सारे उस पर और आज ही के दिन के लिए जो चॉकलेट हम ले कर आये थे वो भी खाने लगे।हमको इतना तो पता चल गया था की बोम्पू में अभी लोग रह रहे हैँ और वहाँ हमको खाना भी मिल जायेगा और शाम तक शायद हम वहाँ तक पहुँच जायेंगे।सामान बहुत था जिसमें से खा कर हमने वहाँ ही आधा कर दिया।

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    अब ऊर्जा भी आ गयी थी फिर से एक बार चल दिए आगे की ओर।  आगे फिर दोस्त ने बहुत हगा हुआ था लेकिन अब आदत हो गयी थी।अब तो जब तक हाथी की टट्टी न देख ले चैन ही नहीं आता था। ऐसा लगता था हम गलत रास्ते जा रहे बहुत देर से टट्टी नहीं दिखी।

     थोड़ा और आगे चले तो बर्ड वाचिंग के लिए आये टूरिस्ट की 2  गाड़ी रुकी हुई थी वो लोग लंच कर रहे थे। सारे लोग गाड़ी के आगे बैठ कर लंच कर रहे थे,लेकिन एक बंदा गाड़ी के पीछे बैठ कर अकेले लंच कर रहा था और हम उसके पीछे से ही आ रहे थे। जैसे ही हम 3 उसके पास पहुंचे तो हमारी साइकिल के टायर नीचे पड़े पत्तों के संपर्क में आ कर जोर से पापड़ की तरह आवाज करने लगे। जिसकी आवाज से वो अकेला बंदा डर गया उसको लगा पीछे से हाथी आ गया वो जल्दी से उठा और पीछे घुमा हमको देख कर उसने राहत की सांस ली और उन सबको देख कर हमने। लेकिन उसको डरा देख कर एक ऐड याद आ गया डर सबको लगता है गला सबका सूखता है।

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     आगे हाथी की फिर से बहुत सारी टट्टी थी। मैं गर्व से कह सकता हूँ की मैंने पूरी लाइफ में किसी की टट्टी सबसे ज्यादा देखी होगी तो वो होगी हाथी की। साला मैं तो सोच सोच कर पागल हो गया हाथी साला हगता इतना है तो खाता कितना होगा।

    चलो ऐसे ही हस्ते गाते टट्टी के बीच से गुजरते हुए हम अगले मोड़ पर हमको एक हाथी हमारे ओर आते दिखाई दिया। अच्छा हुआ वो हमसे थोड़ा दूर था। उसको अपनी ओर आते देख हमारी हालत पतली हो गयी। उसकी फोटो लेने के लिए मोबाइल जेब से निकालने की भी किसी को हिम्मत नहीं हुई। बहुत ही जल्द हम करीब आधा km पीछे आ गये,और एक मोड़ पर जहाँ से दूर तक का रास्ता दिखता था वहाँ पर हाथी का इंतजार करने लगे।

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     1 घंटे तक हमने हाथी मेरा साथी का इंतजार किया लेकिन वो आया नहीं अब समझ नहीं आ रहा था क्या किया जाय आगे जाया जाये या पीछे लौट लिया जाय। 1 घंटे बाद हिम्मत कर के हम फिर से आगे बड़े,जहाँ हमने हाथी देखा था वहाँ पर पहुंचते ही हम एक्स्ट्रा सतर्क थे। लेकिन इस बार हाथी नहीं दिखाई दिया। शायद वो जंगल के अंदर की ओर चले गया था।अब हम तेज़ी से चलने लगे।करीब 5 बजे हम bomphu कैंप पहुँच चुके थे।वहाँ पर काफी टेंट लगे हुए थे जो की एक कैंपिंग साइट के थे।

        वहाँ पर कैंपिंग वाले से खाने का पता किया तो उसने बोला दाल, चावल, सब्जी और रोटी मिल जाएगी 7 बजे। हमने उसको रात का खाना और सुबह के नास्ते का आर्डर दे दिया और साथ ही उसको बोला सुबह ही हमारा लंच भी पैक कर देना हम सुबह सुबह निकल जायेंगे। उसके बाद हम अपना टेंट लगाने लगे तो उसने बोला सर आप टेंट मत लगाओ यहाँ एक हाथी आज कल पागल हो रखा है वो रात को आप के टेंट पर हमला कर सकता है। इस से बढ़िया आप 1000 रूपये एक बन्दे के हिसाब से यानि 3000 रूपये में हमारे डॉर्मेटरी टेंट में रुक जाइये और आपके खाने का वैसे भी खर्चा 2100 रूपये हो रहा है जबकी डॉर्मेटरी में आपका खाना फ्री हो जायेगा।

    उसका ऑफर अच्छा था लेकिन हमको 900 रूपये का घाटा था। लेकिन हमको उसके वहाँ पर रुकने के बहुत फायदे थे पहला ये की वहाँ टॉयलेट था जो जंगल जाने की टेंशन नहीं थी ऊप्पर से आग की सेवा और मुफ्त चाय का मजा भी लिया जा सकता था।उसको मैंने 800 रूपये पर हेड में पटा लिया।अब घाटा 900 से कम हो कर 300 रूपये हो गया।

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Day 3

     रात को आग के मजे लिए और चूल्हे में बने गर्म गर्म खाने का मजा लिया।2 दिन से मोबाइल नेटवर्क से दूर रहने का मजा भी मस्त था वहाँ। 9 बजे तक सो कर अगले दिन खाना खा कर कुछ पैक कर के आगे चल दिए।पहले चक्कू और उसके बाद आया सुन्दर व्यू नाम की जगह आज जोश ज्यादा था।लास्ट दिन हम पुरे दिन में केवल 35 km साइकिल ही चला पाये थे लेकिन आज पुरे जोश में थे।eagle nest pass 2970 मीटर हमारी पूरी यात्रा का सबसे हाईएस्ट पॉइंट था. वहाँ से पूरा डाउन हिल शुरू हो चूका था जल्द ही लामा कैंप, टैंगा वैली भी आ गया वहाँ से हम भालूखपोंग होते हुए रात को 11 बजे घर पहुँच गये मजा आ गया पूरी यात्रा में. लास्ट दिन 178 km साइकिल चलाई।

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