अलाहाबाद और वाराणसी : कुंभ का अनुभव

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मैं कोई धार्मिक व्यक्ति नहीं हूँ , मगर धर्म के नाम पर लगने वाला इंसानों का सबसे बड़ा जमघट कैसे ना देखूं | और देखा जाए तो कुंभ मेरा धर्म के बारे में नहीं बल्कि इंसान और उसके अलग अलग विश्वास के बारे में है | साल 2013 में कुंभ अलाहाबाद में लग रहा था जिसे तीन नदियों गंगा, यमुना और रहस्यमयी नदी सरस्वती का संगम भी कहा जाता है |

फ़रवरी के शुरुआती दिनों में मैने और मेरे एक दोस्त ने इस त्यौहार में हिस्सा लेने का फ़ैसला लिया | एक महीने तक चलने वाले इस मेले के आख़िरी दिन हमने अलाहाबाद जाने वाली ट्रेन की टिकट बुक कर ली | इस त्यौहार में 4 दिन स्नान के लिए महत्वपूर्ण होते हैं | हमारी ट्रेन सीमानचल एक्सप्रेस सुबह 7.30 बजे आने को थी मगर कोहरे की वजह से ट्रेन 6 घंटे देर हो गयी | मैं ट्रेन की टिकल रद्द करने ही वाला था कि मेरे दोस्त ने अच्छी सलाह दी | उसने कहा इंतज़्ज़र का वक़्त बिताने के लिए क्यूँ ना पास के सिनेमा हॉल में फिल्म देख ली जाए | विचार अच्छा था तो मैं भी मान गया | आख़िरकार दोपहर 3 बजे हमने अपनी ट्रेन पकड़ी| हमें 4.30 बजे अलाहाबाद में होना था मगर अभी तक तो अलीगढ़ ही आया था | तो अंत में 10 घंटे की तका देने वाली रेल यात्रा के बाद रात 1 बजे हम अलाहाबाद जनकटिओं पहुँच ही गये | हम सोच रहे थे कि आधी रात के समय स्टेशन हमें सुनसान मिलेगा, मगर ये क्या | कहाँ तो पैर रखने तक की जगह नहीं थी | जैसे तैसे हम स्टेशन से बाहर निकले और होटलों के बारे में पता करना शुरू किया | पता चला की लगभग सारे होटल पूरी तरह से बुक हैं | किसी त्तरह हमें 3000 रुपये प्रति रात की हिसाब से एक कमरा मिल ही गया | पहले पहल तो हम दाम सुनकर थोड़ा हिचकिचाए मगर जब याद आया कि पूरे शहर में ही कोई और इंतज़ाम नहीं है तो हमने ये सौदा मंज़ूर कर ही लिया | कमरे में सामान रखते रखते रात के 3 बाज चुके थे तो हमने चादर तानी और आराम से सो गये | सुबह उठे तो सूरज की धूप कमरे में आ रही थी और सर्दी का नामोनिशान तक नहीं था | हमने ऑटो किया और निकल पड़े संगम मेला मैदान की ओर | स्नान अगले दिन था तो सड़कों पर बहुत भीड़ थी | आधे रास्ते पहुँचने में हमें 40 मिनट लग गये और बाकी का रास्ता हमने पैदल पार करने की सोची | प्रवेश सड़क ऐसी थी मानों मनुष्यों की नदी हो | हम भी इस नदी में कूद गये और एक किलोमीटर चलने के बाद प्रवेश द्वार तक पहुँच गये | द्वार इतना बड़ा था जहाँ आश्रम , मंदिर, विशाल विश्राम स्थल और खूब सारे संत जिन्होने भगवा पहन रखा था | यहाँ इतने लोग थे कि दुनिया के आधे से ज़्यादा देशों की सेनाओं को मात दे दें |

हमने घाट के किनारे के खुले मैदान में जाना चाहा जहाँ ज़्यादातर लोग स्नान कर रहे थे मगर हम बार बार विशाल तंबू रूपी शहर में ही खो जाते| आख़िरकार हम बाहर खुले में आ गये | हमने घाट की ओर जाते समय रास्ते में इतने तरह के चरित्र देखे कि इस त्यौहार की विविधता ने आश्चर्यचकित कर दिया | हमने पवित्र गंगा में डुबकी लगानी चाही पर नहीं लगा पाए क्यूंकी भीड़ और धक्का मुक्की इतनी हो रही थी कि पुलिस किसी भी समय लाठी चार्ज कर सकती थी और हम उसका शिकार नहीं बनना चाहते थे | हम फिर से अपने होटल लौट आए, तोड़ा अलाहाबाद शहर में घूम लिए, हमारे होटल के मालिक की सलाह अनुसार कुछ देर सिविल लाइंस देखा |

अगले दिन पवित्र स्नान होना था तो हम सुबह चार बजे उठ कर मेला मैदान पहुँच गये | कुछ ही मीटर चले थे की हमने एक कतार देखी | पूरे शहर में स्नान का दिन होने के कारण वाहनों का प्रवेश निषेध कर रखा था | जिस कतार की मैं बात कर रहा हूँ वो मेला मैदान में घुसने के लिए लोगों की कतार थी जो 11 किमी लंबी थी | देखकर हमारा दिमाग़ खराब हो गया और हमने मेला मैदान में जाने की बजाय नैनी पुल की ओर जाना ठीक समझा | सोचा की एक नाव किराए पर ले कर संगम स्थल पर पहुँच जाएँगे | पुल तक पहुँचने में हमें 2 घंटे लग गये | वहाँ पहुँचकर हमने एक नाविक से बात की जिसने हमें नदी में ले जाने का शुल्क 1500 रुपये बताया | थोड़ा मोलभव करने के बाद हम उसे 500 रुपये शुल्क पर ले आए मगर उसने एक और परिवार को हमारे साथ ले जाने के लिए ज़ोर दिया | हम इस बात पर सहमत हो गये |

आसमान में बादल भरे थे और 40 मिनट में ही हम संगम स्थल पर आ पहुँचे | प्रार्थना प्लेटफार्मों के करीब 40-50 अन्य नावें इंतजार कर रही थीं। मज़े की बात यह है की संगम पर नदी की गहराई मात्र 4-5 फीट है मगर अन्य जगहों पर नदी 80-100 फीट तक गहरी हो जाती है | संगम पर मैं दोनों मिलती नदियों में फ़र्क कर सकता था | नीले रंग में थोड़ी सॉफ बहती यमुना थी और गंदी मटमैली सी गंगा | नदी में उतारकर हमने अपना पवित्र स्नान संपन्न किया और चल पड़े फिर से नैनी पुल की ओर |

अभी केवल 10 ही बजे थे फिर भी पूरे शहर में इतनी भीड़ थी कि हम कुछ और कर ही नहीं पाए | तो हमने वाराणसी जाने की सोची | हम गंगा पर से एक और पुल पार करके (जहाँ से हमें पूरा . दिख रहा था) शहर के छोर तक जाना था जहाँ से हमें वाराणसी की बस पकड़नी थी | अगले 2 घंटे बाद हम वाराणसी पहुँच गये, मगर हम इतने . हुए थे कि हमने पास ही किसी रेस्तराँ में रुक कर आराम करने की सोची | ये रूफ टॉप रेस्तराँ घाट की ओर जाने वाले रास्ते पर स्थित था | हमने वहाँ बैठ कर कुछ खाया और बिना आपस में बात करे थोड़ा आराम भी किया | थोड़ी ऊर्जा आ जाने के बाद हम काशी विश्वनाथ मंदिर पहुँचे जहाँ भी हमें 3 घंटे मंदिर की कतार में खड़ा रहना पड़ा | मदिर से निकलते हुए अंधेरा हो गया था और प्रसिद्ध वाराणसी आरती का समय हो चुका था | हम जल्दी से घाट क्किनारे पहुँचे और भव्य आरती के दर्शन किए |

रात में रुकने के लिए हमने वाराणसी में ही एक कमरा किराए पर लिया और अगली सुबह वापसी की तैयारी कर ली |

अलाहाबाद के संगम में होने वाला कुंभ मेला एक ऐसा अनुभव है जो हर इंसान को जीवन में एक बार तो करना ही चाहिए, चाहे आप धार्मिक हो या नहीं | संगम पर लगने वाला कुंभ मेला अगली बार 2025 में संगम पर होगा जहाँ आपको ज़रूर जाना चाहिए |

यह पोस्ट मूल रूप से 'ट्रैवल बीइंग्स' पर प्रकाशित हुई थी।

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