गुजराती ट्रैवलर हैं सबसे बेस्ट! ये किस्से सुनकर आप भी यही कहेंगे!

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आप ट्रेन में आराम से अपनी बर्थ पर बैठे हैं | इतने में आपको ट्रेन के डिब्बे के दूसरी तरफ शोर सुनाई देता है | औरतों और बच्चों की आवाज़ आ रही है | कहीं ट्रेन में डकैत तो नहीं चढ़ गए ?

आप अपनी सीट से उठ कर डिब्बे के दूसरे छोर पर मौके का जायज़ा लगाने उठते हैं तो देखते हैं कि एक गुजराती परिवार ट्रेन की कम से कम 6-7 सीटों पर फैल कर बैठा है, और घर से लाए खाखरे और थेपले खा रहा है | बच्चे अचार माँग रहे हैं, माएँ डपट कर उन्हें चुप करवा रही हैं और आदमी लोग पूरी शिद्दत से थेपले खाने में लगे हैं | ऐसा लग रहा है मानों पूरा गुजराती परिवार अपनी ही धुन में चला हो |

आप दुनिया में जहाँ भी जाओ, जिस भी साधन से जाओ; गुजराती लोग आपको दिख ही जाएँगे |

ऐसा इसलिए क्योंकि गुजराती लोग घूमने-फिरने के मामले में काफ़ी जुनूनी लोग हैं | इतना ही नहीं, बल्कि गुजराती लोगों को सबसे बढ़िया सैलानियों में माना जाता है |

ऐसा क्यों ? आइए जानें....

गुजराती काफ़ी समय से घूम-फिर रहे हैं

गुजरात के आस-पास घूमने की शानदार जगहें हैं |

जब आप और मैं स्कूल में पढ़ रहे थे, तो याद है किस तरह पिकनिक के नाम पर पास ही के साइंस पार्क में ले जाया जाता था ? या खुद भी कहीं जाने का मन हुआ तो दिल्ली के पास कुछ सौ किलोमीटर के दायरे में फरीदाबाद, नोएडा और गुड़गाँव ही आते हैं | इनसे बढ़िया तो साइंस पार्क ही था |

अगर सोमवार शाम को किसी गुजराती का दारू पीने का मन हो गया तो शाम को ही वो गाड़ी उठा कर दमन-दिउ तक आसानी से पहुँच सकता है और सोमवार सुबह फिर से काम पर जा सकता है।

अपनी शेखी नहीं बघारते

अगर चढ़ाई मुश्किल है, और आपकी साँसें दमा के मरीज़ की तरह चलने लगी हैं, फिर भी साथ चलने वाला गुजराती कभी आपकी इच्छाशक्ति तोड़ने की कोशिश नहीं करेगा | बल्कि अपनी पिछली ट्रिप के किस्से सुना-सुना कर आपका ध्यान थकान पर से हटा ज़रूर देगा |

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सुनते रहो, चढ़ते रहो

काफ़ी सहनशील होते हैं

एक बार जब मैं और मेरा दोस्त चंद्रताल के पास तंबू में ट्रेकिंग की थकान से जूझ रहे थे, तो पास में बैठे कुछ लोगों की बातचीत सुनाई दी | दोनों गुजराती दोस्त थे और हर साल काम से छुट्टी लेकर घूमने के लिए साथ निकलते थे | 50-60 साल के उम्रदराज़ लोगों को चंद्रताल पर अपनी मस्ती में देख कर हम दोनों दोस्त अपनी सारी थकान भूल गए |

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इनके सामान में आपको सब कुछ मिलेगा

गुजराती सैलानियों के सामान में घर से बनाये नाश्ते का ही वज़न नहीं होता, बल्कि आपको इनके पास ज़रुरत की सारी चीज़ें मिल जाएँगी | ऐसा लगता है अपने साथ पूरा घर बाँध कर लाये हों |

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एक बार ट्रेन में मेरे पास एक गुजराती आंटी बैठी थी, जिन्होनें अपने बैग में से खीरे-टमाटर निकाल कर चाक़ू से काटना शुरू कर दिया | फिर बैग से ब्रेड का पैकिट निकाला और सैंडविच बना लिया | मुझे लगा अब आंटी बैग में से क्या निकालेगी, अब तो सैंडविच खाना ही बचा है | मैं सोच ही रहा था कि आंटी ने सूटकेस खोला और एक सैंडविच मेकर निकाल लिया | मुझसे बोली 'बेटा थोड़ी देर अपना चार्जर हटा लो , मैं बस 10 -12 सैंडविच बना लूँ |'

घूमना-फिरना तो गुजरातियों के खून में हैं

सालों पहले गुजराती धंधे की खोज में घूमते थे | सन 1947 के बंटवारे के बाद एक मशहूर गुजराती एडवोकेट ही था, जिसने पूरे भारत में घूम कर उसे एक संविधान में पिरोया था |

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गुजरातियों जैसे पारिवारिक लोग घूमते वक़्त साफ़-सफाई का काफी ध्यान रखते हैं | जहाँ घूमने गए हैं, वहाँ के बारे में भी पूरी जानकारी लेते हैं |

अब राजीव नेमा भाई पर भी ध्यान दें

राजीव भाई इंटरनेट पर छाये हुए थे , क्योंकि 6 मिनट की इस वीडियो में इन्होनें कैनेडा की तरफ से नायाग्रा फॉल्स के बारे में पूरी जानकारी दे दी | 6 मिनट की इस वीडियो में राजीव भाई ने इतनी बढ़िया जानकारी इतने कम वक़्त में दी है कि कुछ भी बाकी नहीं छोड़ा |

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अगर आप ज़िन्दगी में कभी माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई करने निकले तो चोटी पर किसी गुजराती परिवार को थेपला खाते देख चौंक मत जाना | गुजराती तब से अमरीकी वीज़ा के पीछे पड़े हैं, जबसे आप घूमने के नाम पर मुरथल के परांठे खाने जाते थे |

तो अगर बात घूमने की करें तो गुजरातियों की बैटरी हमेशा चार्ज रहती है।

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