टेंशन के इस दौर में शांत रहने के लिए विपश्यना की और इसका फ़ायदा जान आप भी इसे ज़रूर अपनाओगे

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महीना था अप्रैल का, साल 2021। एक साल से भी ज़्यादा का वक़्त हो चुका है भारत में कोरोना की पहली लहर बीते। पहली बार जब लॉकडाउन खुला तो काफ़ी महीनों तक तो ख़ुद ही मेरी हिम्मत नहीं हुई कहीं बाहर निकलने की। लेकिन घर में रहते रहते वर्क फ़्रॉम होम करते हुए इंसान कहीं न कहीं टेंशन से गुज़रने लगता है। उसका असर हमें शायद न दिखे, लेकिन परिवार वालों को साफ़ दिखता है। बीते मार्च को मैंने विपश्यना के 10श दिन के कोर्स के लिए रजिस्ट्रेशन कर दिया था। भली क़िस्मत कि दो दिन में ही मेल आ गया कि मेरा रजिस्ट्रेशन अप्रूव हो गया है।

अप्रैल 15-26 के शिविर के लिए मैं नेपाल के लुम्बिनी की ओर निकल गया था। इस बात से बेख़बर कि अगले कुछ दिनों में हम पूरी दुनिया में कोरोना केस के हर दिन नए रिकॉर्ड बनाकर अगले दिन तोड़ रहे होंगे। ख़ैर, मुद्दा यहाँ कोरोना नहीं है, मुद्दा है मानसिक तनाव, जिसे दूर करने के लिए मैं 10 दिन के इस नए अनुभव को जीने गया था।

लुम्बिनी विपश्यना केन्द्र

Photo of लुम्बिनी साँस्कृतिक, Nepal by Manglam Bhaarat

अगर आप किन्हीं कारणों से मानसिक तनाव जैसी किसी चीज़ को महसूस कर पा रहे हैं, या ऐसा लग रहा है कि आपके काम करने की क्षमता पहले की अपेक्षा बहुत कम हो गई है, तो आपको चलने वाले विपश्यना कोर्स के बारे में ज़रूर सोचना चाहिए।

क्या होती है विपश्यना

आम तौर पर हम जीवन में हो रही घटनाओं को अपने फ़ायदे या नुकसान के उद्देश्य से देखते हैं। अगर हमें उसमें अपना फ़ायदा नज़र आता है, तो वह घटना हमें अच्छी लगने लगती है और मन में ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है। वहीं कोई घटना बहुत दुःखद लगती है, तो उसके प्रति द्वेष पैदा होने लगता है और हम मायूस होने लगते हैं। जब यही चीज़ बहुत समय तक होती रहती है, तो मानसिक तनाव का रूप ले लेती है।

विपश्यना का अर्थ है दुनिया को उसके वास्तविक रूप में देखना। मतलब बिना किसी राग या द्वेष के देखना, समान भाव से देखना। जो हो रहा है, जैसा हो रहा है, ठीक वैसा ही देखना, बिना किसी लाग लपेट, बिना किसी इच्छा के देखना।

पैगोडा, जिसके अन्दर आपको ध्यान करने का मौक़ा मिलेगा

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विपश्यना का यह अनुभव आपके जीवन को देखने का एक नया नज़रिया देगा, शायद ऐसा नज़रिया जिसकी खोज आप बहुत समय से कर रहे हों। कम से कम मेरा अनुभव तो ऐसा ही रहा।

क्या होता है विपश्यना के 10 दिन के इस कोर्स में

विपश्यना का 10 दिन के पहले शिविर की शुरुआत पाँच नियमों से करनी होती है, जिन्हें शील कहा जाता है। ये पाँच शील हैं- सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य

सत्य, झूठ न बोलना।

अहिंसा, हिंसा न करना।

अस्तेय, चोरी न करना।

अपरिग्रह, धूम्रपान न करना।

ब्रह्मचर्य, व्यभिचार न करना।

पाँच शील, जिनका पूरे शिविर पालन करना है

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इन पाँच शीलों को शिविर के शुरू से आख़िर तक पूरी निष्ठा और धैर्य के साथ अपनाना है।

शिविर के इन 10 दिनों में आपको बिल्कुल नहीं बोलना होता है। आपको इन 10 दिनों में पूरी तरह मौन का पालन करना होता है। यह कितना आवश्यक है, इसका पता आपको इन 10 दिनों में और आर्टिकल के आख़िर में पता चलेगा। शिविर के बाद इसका फ़ायदा भी देखने मिलेगा।

इन 10 दिनों के कोर्स में आपके पास एक निश्चित दिनचर्या होगी, जिसका पालन आपको करते रहना है। आप 10 दिन के एक बिल्कुल अलग शिविर में आए हैं, जहाँ आप बाहरी दुनिया में होते हुए पहली बार ख़ुद को जानते हैं।

कैसे शुरू होता है शिविर का कार्यक्रम

मैंने शिविर के लिए 15 से 26 अप्रैल की तारीख़ को चुना था। 10 दिन का यह कोर्स 16 से शुरू होता है। 15 की सुबह या दोपहर तक आप यहाँ पहुँचते हैं तो आपसे इलेक्ट्रॉनिक सामान जैसे लैपटॉप, मोबाइल इत्यादि ले लिया जाता है। यह 10 दिन तक आपसे दूर रहेगा। आप अपने साथ कोई कागज़ या पेन भी नहीं रख सकते हैं। केवल कपड़े और नहाने धोने की चीज़ें आप अपने पास रखते हैं। आपको एक सिंगल रूम दिया जाता है, जिसमें सारी मूलभूत चीज़ें पहले से ही उपलब्ध होती हैं।

आर्य मौन, अर्थात् सभी प्रकार से शांति, मुँह की, मन की और इशारों की

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15 तारीख़ की शाम को नाश्ते के बाद आप एक हॉल में जमा होते हैं, जिसमें आपको आगे आने वाले 10 दिन के बारे में विस्तार से बताया जाता है। साथ ही आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप किसी दूसरे को बेवजह परेशान नहीं करेंगे, मौन रखेंगे। अगर कुछ चाहिए तो व्यवस्था में जुड़ी वॉलंटियर्स से बहुत कम शब्दों में बताकर माँग सकते हैं।

इसके बाद बड़े हॉल में आपको ध्यान करने के बारे में बताया जाता है और रात को 9 बजे आख़िरी घंटी बजने के बाद सोने का समय आ जाता है।

ठहरने की जगह

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अगले दिन सुबह 4 बजे से आपकी दिनचर्या शुरू होती है।

मैं पहले ही बता रहा हूँ कि हो सकता है कि यह दिनचर्या आपको कठिन लगे, लेकिन जब आप इसको करते हैं तो इतना कठिन लगता नहीं, जितना पढ़ने में लगता है। मैंने ख़ुद अनुभव किया है, इसलिए कह पा रहा हूँ।

तो सुबह 4 बजे पहली घंटी के साथ आपका दिन शुरू होता है। ब्रश करने और फ्रेश होने के बाद दूसरी घंटी 4:30 बजे दूसरी घंटी बजती है। इसमें अगले दो घंटे के लिए आपको बड़े हॉल में ध्यान करना होता है। हर दिन ध्यान का पैटर्न बदलता जाता है, जिसे आपको हर दिन के हिसाब से बताया जाता है। संभव है कि आपको ध्यान की विधि के बारे में विस्तार से जानकारी न हो। लेकिन इस शिविर में ध्यान की विधि बताई जाती है जिससे आपको ध्यान करने में आसानी भी होती है और ध्यान के बारे में बनाए गए पुराने आधार भी टूटते हैं। 6:30 बजे ध्यान ख़त्म होने पर आप सुबह का नाश्ता करने जाते हैं।

यहाँ पर आपके पास 6:30 बजे के बाद 1:30 घंटे का समय होता है। आप इसमें नाश्ते के अलावा नहाने फ़्रेश होने का काम कर सकते हैं। सुबह 8 बजे से 11 बजे तक ध्यान करना होता है। इसमें 8 से 9 बजे तक आपको हॉल में ध्यान करना होता है। 9 बजे से 11 बजे तक गुरू जी के कहने पर हॉल या फिर अपने कमरे में ध्यान करना होता है। 11 बजे आपका दोपहर का खाने का टाइम होता है। यह दोपहर 12 बजे तक चलता है। यदि ध्यान में कोई दिक्कत आ रही हो, तो 12 बजे आप इस शिविर के सबसे बड़े गुरू से अपने सवाल पूछ सकते हैं। अगर नहीं, तो आप 1 बजे तक आराम कर सकते हैं।

धम्म हॉल का गेट

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1 बजे घंटी बजती है। यह 4 घंटे का ध्यान होता है, जो तीन सेशन में पूरा होता है। इन तीनों सेशन के बीच में 5-10 मिनट का ब्रेक होता है। 5 बजे शाम के नाश्ते का समय होता है। नाश्ते में आपको फल, चाय, लइया और दूसरी चीज़ें मिलती हैं। एक घंटे के बाद शाम को 6 बजे से 7 बजे तक एक घंटे का ध्यान करना होता है। शाम को 7 बजे से 8:30 बजे तक एस. एन. गोयनका का लेक्चर होता है। एस. एन. गोयनका ध्यान से जुड़े लोगों के धार्मिक, आध्यात्मिक भ्रम दूर करते हैं और ध्यान में होने वाली कठिनाइयों के बारे में भी चर्चा करते हैं। 8:30 बजे से 9 बजे तक ध्यान का आधे घंटे का सेशन होता है। यह आधे घंटे का सेशन इसलिए बहुत ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि इसमें एस. एन. गोयनका अगले दिन कैसा ध्यान करना है, के बारे में बताते हैं।

धम्म हॉल की फ़ोटो

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यही दिनचर्या आपको अगले 9 दिन तक फॉलो करनी होती है।

दसवें दिन कुछ ख़ास होता है, जिसके बारे में मैं आपको यहाँ भी बता सकता हूँ, लेकिन अगर आप शिविर में जाकर स्वयं जानेंगे तो आपको बहुत आनन्द आएगा। मैं आपको यहाँ पर ध्यान के पैटर्न के बारे में इसलिए नहीं बता रहा हूँ क्योंकि यही इस पूरे शिविर का आधार है, जिसे केवल वहीं रहकर जानना चाहिए। बस इतना कह सकता हूँ कि इसके बाद आपके इस दुनिया को देखने का नज़रिया पूरी तरह बदल जाएगा। आपके दुनिया के बारे में बने हुए बहुत सारे मिथक टूटेंगे, जिसके बाद आप सच में बहुत ख़ुश और स्वतंत्र महसूस करेंगे।

शील से शुरू कर विपश्यना तक पहुँचने का तरीक़ा

10 दिन के इस कोर्स में आप पाँच शीलों, सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य के साथ शुरुआत करते हैं। इसके बाद अगला बड़ा हिस्सा आता है समाधि का। समाधि मतलब बैठकर ध्यान करना। ग्रुप में या फिर अकेले में बैठकर ध्यान करना, जैसा आपको बताया जाए। इसके बाद आप तीसरा और इस शिविर का आख़िरी बड़ा हिस्सा आता है प्रज्ञा का। प्रज्ञा मतलब स्थितप्रज्ञ होकर दुनिया को देखना। इसके लिए आपको 2 घंटे का स्पेशल सेशन लेना होता है, जिसमें आप प्रज्ञा के बारे में जानते और इसके करने की प्रक्रिया सीखते हैं।

विपश्यना से जुड़े हुए कुछ मिथक

विपश्यना को प्रायः माना जाता है कि यह बौद्ध धर्म से जुड़ी कोई चीज़ है, जिसका पालन करने पर आप अपने धर्म से दूर हो जाएँगे या अपने धर्म को पसंद करना छोड़ देंगे।

ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि अपने धर्म से जुड़ी कई सारी चीज़ें जिनको आप पहले कहानी के रूप में जानते समझते थे, उनको और भीतर से जानने और उसके वास्तविक ज्ञान तक पहुँचने का मौक़ा आपको विपश्यना से मिलेगा।

विपश्यना का बौद्ध धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह सिद्धार्थ गौतम का सुझाया गया एक रास्ता है जिससे आप अपने भीतर के राग, ईर्ष्या, द्वेष, इच्छाएँ, विकारों से मुक्ति पा सकते हैं और ख़ुशहाल जीवन जी सकते हैं।

यह सत्य है कि 10 दिन के इस कोर्स में आपको अपने धर्म से जुड़ी चीज़ों का पालन करने से मना किया गया है। लेकिन 10 दिन के बाद आपके पास पूरी अपनी मान्यताओं को अपनाने की पूरी छूट है।

विपश्यना के 10 दिन के कोर्स की फ़ीस

विपश्यना के इस कोर्स की फ़ीस काफ़ी ज़्यादा है। शायद ही आपको इसका अंदाज़ा हो, लेकिन इस कोर्स को करने में आपकी जेब बहुत हल्की हो जाती है। बहुत ही डिफ़िकल्ट कोर्स है, बहुत ही कम लोग कर पाए हैं इसे। जितना कठिन कोर्स, उतनी ही बड़ी फ़ीस।

आप जब 10 दिन के इस कोर्स को करते हैं, तो आपसे कोई फ़ीस नहीं ली जाती है। 11वें दिन अगर आपको लगता है कि इसे और लोगों को भी करना चाहिए, इसको करने से भला होगा, तो आप दान दे सकते हैं।

चूँकि मैं इससे काफ़ी कुछ सीखा और आपको बताने की इच्छा हुई, इसलिए अपना अनुभव साझा कर रहा हूँ। अगर आपको भी यह पसन्द आया हो, तो जीवन में कभी एक बार ट्राय करके देखें।

और आख़िर में हम सबकी फ़ोटो, ये दाढ़ीवाला मैं ही हूँ (please don't mind my beard)

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कृष्ण, लक्ष्मी, मैं और करीना ( चार लोग, चार देश)

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