पहाड़ों की पैदल यात्रा 

Tripoto
8th Jul 2019
Photo of पहाड़ों की पैदल यात्रा by Thakur Amit Singh Paliwall

रायवाला जंक्शन तड़के सुबह ही पहुंच गया, 335 मीटर की उंचाई पर जंक्शन और मैं एक दूसरे को देर तक निहारते रहे ! तूफान की तरह झुंड में लोग आ रहे थे और हवा की झोंकों की तरह उड़ कर चले जा रहे थे। सामने से गढ़वाल रेजीमेंट की एक टोली चली आ रही थी , उनके चलने में गजब की खनक थी, यह सब देखकर मेरा दिन बन गया ! हिचकिचाते हुए श्रृंखला के अंतिम जवान सेना से मैंने पूछ ही लिया - गुड मॉर्निंग सर, सर यहां टैक्सी पकड़ने के लिए किस तरफ जाना पड़ेगा ! जवाब मिला- आओ मेरे पीछे , हम लोग सड़क की तरफ ही जा रहे हैं , इधर ही टैक्सी या बस मिलेगी। अब टोली में मैं भी शामिल हो गया था लेकिन मेरे और उनमें एक विषम फर्क था कि उनके हाथों में बंदूक और मेरे हाथों में ट्राइपॉड में लगा कैमरा था ! देहरादून एक्सप्रेसवे से बस पकड़ कर वो लोग देहरादून के लिए चले गए और मैं टैक्सी पकड़कर त्रिवेणी घाट के लिए चल दिया। रास्ते भर पहाड़ों को देखता रहा और जब तक नजर संभाल पाता पता चला कि त्रिवेणी घाट पहुंच गया हूं।

 त्रिवेणी घाट को हमने अपनी यात्रा में जबरदस्ती शामिल किया था, मकसद यह था कि गंगा में नहा कर यात्रा की शुरुआत अगर हो तो आदमी धन्य हो जाता है ! सभी देवी देवताओं को दंडवत प्रणाम किया और हजार मीटर की ऊंचाई पर मुस्कुरा रहे नीलकंठ को दो लाईन - " मेरा भोला है भंडारी, करे नंद की सवारी , भोलेनाथ रे भोलेनाथ रे - जय जय शिव शंभू " गाकर अपनी हाजरी दिया। बचपन में अम्मा कहती थी कि हमारे गांव में जो नदी है यह तमसा नदी है। जब कभी तुम गढ़वाल जाओगे तो वहां गंगा ,यमुना और सरस्वती तीनों नदियों का संगम है और वहीं शिव जी का मंदिर भी है, जहां से गंगा जी उनकी जटाओं से निकलती हैं। त्रिवेणी घाट पर बैठकर इन सब बातों को सोचता रहा और गंगा यमुना सरस्वती को आपस में मिलते देखता रहा। शायद यहीं से गंगा मुड़कर दायीं तरफ चली जाती हैं।

 घंटों घाट पर बैठने के बाद एक एजेंट से मुलाकात हुई, उसने कहा - यहां की चीजों को अगर आपको सचमुच समझना है तो आप गाइड ले लीजिए ,वह आपको यहां की हिस्ट्री - ज्योग्राफी सब बता देगा, मैंने बिना सोचे जवाब दे दिया- घुमक्कड़ी हूं - बेवकूफ नहीं । कुछ देर बाद हरिद्वार से आए एक महाराज से मुलाकात हुई और उनसे फ्री में ही सबकुछ पूछ लिया और जान लिया। मैंने महाराज से वादा किया कि यदि वह देवभूमि हरिद्वार से पावन भूमि आजमगढ़ में कभी पधारेंगे तो उनका स्वागत मैं परिवार सहित करूंगा और उनको दुर्वासा ऋषि, द्रोणाचार्य ऋषि और दत्तात्रेय ऋषि का दर्शन करवाउंगा। घाट के पूर्वी छोर की तरफ कुछ विदेशी स्नान कर रहे थे, उनका कबूतर स्नान देख कर मैं मन ही मन हंस रहा था पर मुझे उनके घुमक्कड़ी विज़न को लेकर बहुत आश्चर्य हो रहा था ! अब यात्रा पहाड़ के दूसरी छोर की तरफ होनी थी लेकिन बादल उमड़ रहे थे और थोड़ी- थोड़ी बूंदा-बांदी भी हो रही थी, शाम के 5 बज चुके थे।

यह त्रिवेणी धाम का वीडियो  है, जिसमें  यात्रा की  शुरूआती  चीजों का  मिश्रण है।

पहाड़ धुंधले धुंधले नजर आ रहे थे। शाम के करीब 6 बजे घाट पर लेटे हुए मैं बस यही सोच रहा था कि नदियां इतनी मतवाली कैसे होतीं है। चट्टानों के बीच से झुर झुर बहती गंगा, मुझे ना जाने किस ख्यालों में ले जा रही थी। गांव में पूर्वी - उत्तरी छोर पर तमसा नदी बहती है, जिसमें गांव के कुछ नहरों-नारों का मिलन होता है। उस पर मैंने कुछ साल पहले कुछ अर्ज किया था, शायद मैंने उस क्षण को जीकर कुछ लाइन यूं ही कुरेद दिया था - " तड़प उठे दोनों और घंटों बात हुई , जब गांव में नहर और नदी की मुलाकात हुई। लहरों से लड़कर छोटी सी दवात हुई , जब गांव में नहर और नदी की मुलाकात हुई।। " , अचानक सभी लोग कैंप की तरफ भागने लगे , मैं खुद से ही कहने लगा- अरे यार अमित, इ तो बुन्नी पड़ने लगी, भागो। पहाड़ों से टकराकर गंगा को चूमती हुई हवाएं जब बौछारों से छुअमछुआई खेल रहीं थीं तो मन कर रहा था कि यहीं चद्दर बिछाकर सो जाऊं।

देखते ही देखते बारिश तेजी से होने लगी, मेरे पास ठिकाना खोजने के लिए गिनती के ही कुछ घंटे शेष थे। रात में हास्टल खोजना वो भी बारिश में नामुमकिन जैसा लग रहा था लेकिन मैंने पहले से ही तय किया था कि किसी होटल में नहीं रहूंगा। बारिश अब थम गई थी, बैग लादकर मैं हरिद्वार एक्सप्रेस की ओर निकल गया। अगला पड़ाव ओनी था और फिर वहां से पथु , लेकिन देर रात में भटकना सही नहीं लग रहा था, आस-पास कोई धर्मशाला भी नहीं नजर आ रहा था। रास्ते भर सबसे पूछता रहा , भैय्या इधर कोई धर्मशाला है। जो भी मिलता गया , सब यही कहते गए - शायद आगे है। इसी चक्कर में लगभग, मैं 2 किलोमीटर धर्मशाला की खोज में सड़क नापता रहा। मन में अजीबो-गरीब ख्याल आ रहे थे । कुछ दूर और चलने पर गुरुद्वारा मिला,जहां धर्मशाला भी था। मुझे इतना तो पता था कि यदि यहां कोई धार्मिक स्थान मिलता है तो धर्मशाला जरुर होगा क्योंकि यहां अधिकतर जिलों में इसी फॉरमेट में हास्टल और धर्मशाला मिलते हैं।

इस वीडियो में रामझूला और लक्ष्मण झूला की यात्रा का आप आंनद उठा पाएंगे।

मुझे क्या पता था कि ठिकाना मिलने पर भी संकट के बादल साथ ही रहेंगे? अगला आदमी सिर्फ इसलिए मुझे रखने से इंकार कर रहा था कि मैं सिंगल हूं और सिंगल लोगों को बेड अलॉट नहीं करेगा। इस रात सिंगल से मिंगल कैसे बनूं , बाहर निकल इस बात पर दिमाग लड़ाने लगा। अरे भैय्या - देख लो सौ-पचास की कोई दिक्कत नहीं है, जवाब मिला - अच्छा आओ। क्या करते हो तुम , दिल्ली से आ रहे हो क्या? मैंने बैग उठाते हुए जवाब दिया- नहीं लखनऊ से , घूमता हूं, लिखता हूं और यूट्यूब पर वीडियो बनाता हूं। किधर वाला कमरा खाली है ? जाओ चले जाओ लास्ट में , चाभी लेकिन नहीं है, अपना ताला लगाना पड़ेगा आपको, वहां लाकर रशीद कटवा लिजिए , 250 रुपए लगेंगे। कमरा ठीक-ठाक ही था क्योंकि हम जैसे घूमक्कड़ बैचलरों के लिए कमरा नहीं बल्कि आराम और रकम मायने रखता है। बाहर से दो आलू पराठे ( 50 रु0 ) , दो लेज़ चिप्स ( 20 रु0 ) ,एक बिस्किट ( 10 रु0 ) और एक बॉटल पानी ( 20 रु0 ) का मैंने पहले से ही इंतजाम कर लिया था। बेड का चद्दर बहुत ही गंदा था इसलिए मैं अपना ही चद्दर बेड पर बिछाकर सो गया।

अगले दिन की यात्रा प्लॉन के मुताबिक किसी पहाड़ी गांव में होनी थी , लेकिन दिल कर रहा था कि एक बार चट्टानों के बीच सो लूं । बचपन से मेरी एक ख्वाहिश थी कभी ऐसे जगह आराम करू, जहां दूर-दूर तक कोई ना हो , सिर्फ पहाड़ हो , नदी हो और मदमस्त हवाएं हो। नदी के तीरे -तीरे काफी दूर तक चलने के बाद चट्टानों का अंबार दिखा , गंगा कि झुरमुट भी दिखी , चट्टानों से आहिस्ता आहिस्ता गंगा को गिरते देख , मेरा मन बन गया और वहीं चद्दर बिछ गई। बचपन में मचान पर सो कर जो मजा आता था, उससे कहीं ज्यादा मुझे उस वक्त आ रहा था। बिल्कुल फिल्मी मामला हो गया था। सभी कपड़े अब तक गंदे हो चुके थे। बस एक ही टी-शर्ट साफ बचा था , मैंने जानबूझकर शर्ट की जहह टी-शर्ट लिया था ,वह इसलिए क्योंकि यह बैग में कम जगह में आ जाता है और प्रेस और चिकुड़ने जैसा माथापच्ची भी नहीं रहता है। अब अगला पड़ाव मसूरी जिले का भुट्टा गांव और उससे सटे कुछ गांव थे। इस गांव के आस -पास के वाटर फॉल बेहद मजेदार हैं, ऐसा हमने एक टूरिस्ट के ब्लॉग में देखा था।

बैग समेटते हुए , झाड़ियों पेड़-पौधों के टहनियों को पकड़ते हुए अब चढ़ाई करके सड़क उस पार जाना था , जहां से सबसे पहले देहरादून और फिर मसूरी के लिए बस पकड़नी थी। दोनों दूरियां तकरीबन 100 किलोमीटर के आस-पास है। सड़क पर काफी ट्रैफिक था , दोनों तरफ कई किलो मीटर का लंबा जाम , कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए ।

अब मैं यात्रा के अंतिम पड़ाव में था, झमाझम बारिश भी हो रही थी। देहरादून बस स्टॉप के पास गांधी मार्ग पर घंटों खड़ा रहा, मसूरी कि ओर न बसें जा रहीं थी और ना ही उधर से आ रहीं थीं। बगल के एक दुकानदार ने कहा कि आपको अगर बस पकड़नी है तो आगे वाले मोड़ तक जाना होगा, वहीं से आपको बसें मिलेंगी। बैग उठाकर मैं मोड़ की तरफ रवाना हो गया, अगला मोड़ पल्टन बाजार मार्ग था। यह मोड़ सहारनपुर मार्ग से कनेक्ट होती है। यमुना और गंगा नदी के बीच में मुख्यतः तीन ही रोड ( NH709B, NH307,NH334) है जो उत्तराखंड को दूसरे प्रदेश से कनेक्ट करती हैं और यह सभी रोड डाकपत्थर , सहिया , चकराता , तिउनी, देहरादून , मसूरी , ऋषिकेश, चमोली और बद्रीनाथ इत्यादि स्थानों को जालाकार आकृति में कवर करती हैं। कुछ समय बाद पल्टन बाजार से बस मिली और फिर मसूरी का चक्करदार सफ़र शुरू हुआ ।

कुछ किलोमीटर तक ही सफ़र बस सफ़र रहा, इसके बाद सफ़र झूला में तब्दील होने लगा। कई साल पहले मैंने बड़ा वाला झूला दोस्तों के साथ झूला था, उसी दिन मैंने कसम खायी थी कि अब झूला कभी नहीं झूलूंगा क्योंकि जब झूला उपर जाता है और उपर से तेजी से नीचे आता है तो उस वक्त इंसान जिस अनुभव को महसूस करता है उसे ही मैं इन चक्करदार उतार-चढ़ाव सड़कों पर महसूस कर रहा था। देखते - देखते बस किरसाली गांव होते हुए कुठाल गांव पहुंची। बस को पहाड़ पर उध्वाधर चढ़ते देख मन भावनाओं से भर जा रहा था पर डर लग रहा था कि कहीं गलती से ड्राईवर से क्लच ज्यादा ना दब जाए वरना इतने उपर से नीचे गिरने की कल्पना करने में भी मुझे डर लग रहा था। हचकते - संभलते हम कोलूखेत गांव पहुंचे, जहां से घुमावदार पहाड़ी रास्तों को देखकर दिल बाग बाग हो जा रहा था। कुछ देर में हम लोग समुद्र तल से 1000 मीटर की उंचाई से ज्यादा उपर थे। पहाड़ी ड्राईवर को देखकर कई घटनाएं जहन में आ रहीं थीं और उस पर भी बस रेलमरेल चल रही थी। साप - सीढ़ी वाले खेल की तरह पूरा दृश्य हो चुका था, जगह - जगह सापों की तरह सिर्फ सड़के थीं।

रास्ते भर एक ही गाना गुनगुनाते हुए चला जा रहा था - ओ दरियाँ दे, पाणियाँ ये मोज्जा फिर नहीं आणियाँ, ओ याद आयेंगी , बस जाने वालों की कहानियाँ, दरियाँ दे पाणियाँ ये मोज्जा फिर नहीं आणियाँ। हेडफोन में यह गाना, हाथ में चिप्स , नजर में सिर्फ उंचे - उंचे पहाड़ और रूह में पहाड़ों से टकराकर चलती ठंडी हवाएं इन सभी का एक साथ होना, उस वक्त महज एक संयोग था। अब हम समुद्रतल से लगभग 1500 मीटर की उंचाई पर सफ़र कर रहे थे। बस साइड में मात्र कुछ सेकेंड के लिए रुकी और फिर मचलकर मदमस्त चाल चलने लगी। हमारे साथ सीट पर और दो लोग केरल से थे, जो पूर्णरुपेण पर्यटक थे। जगह-जगह मुंह निकाल-निकाल कर फोटोज क्लिक कर रहे थे और कुछ चिन्हित स्थानों के नाम भी नोट कर रहे थे। पहाड़ों के इन सूनी वादियों में अब कुछ घर - दिखने लगा था। हम तुन्धर गांव पहुंचने वाले थे और अब एकदम सीधी चढ़ाई थी।

मसूरी के लिए अब शेष कुछ ही किलोमीटर का सफ़र बाकि था। भूख से जी बेहाल हो रहा था लेकिन गन हिल पॉइंट पर ही जाकर भोजन करने का मैंने प्रण किया। उतरो भैया , आ गया मसूरी बस स्टॉप। बादल चारो तरफ हिलते -डुलते नजर आ रहे थे और बादलों की घड़घड़ाहट को इतने पास से सुनकर मानों ऐसा लग रहा था, जैसे कोई बेस ड्रम बजा रहा हो। बारिश होने ही वाली थी। समुद्र तल से पूरे 2008 मीटर की उंचाई पर बैठकर दूर पहाड़ियों को देखते हुए यह सोच रहा था कि महज कुछ ही शेष घंटें की यात्रा को किस खूबसूरत मोड़ पर छोड़ दिया जाए। मुझे अब कार्ट रोड से मॉल रोड की तरफ जाना था इस लिए बिना सोचे समझे ही पैदल गंतव्य की ओर प्रस्थान कर दिया। कुछ दूर चलने पर कुलरी चौक का अद्भुत नजाारा देखने को मिला और एक होटल में भोजन भी हुआ। अब शाम के 4 बज रहे थे और इस खूबसूरत समय में पहाड़ो की रानी मसूरी को लंढौर की वादियों से निहारने का वक्त था। बैग लादकर मॉल रोड रवाना हो गया। गन हिल और निकट वर्ती क्षेत्रों का भ्रमण करके वापस आते वक्त कई लोगों से परिचय भी हुआ और वादा भी , एक बार फिर मुलाकात होने की और साथ में घूमने की ।

यह वीडियो मसूरी यात्रा की है , क्लिक करिए मजा लिजिए ..

" फिर आउंगा जल्द ही " कहकर बैग उठाया और चल दिया कार हिल स्टेशन की तरफ, जहां से मुझे टैक्सी से देहरादून रेलवे स्टेशन की तरफ आना था। जाते वक्त बिल्कुल अकेला गया था और लौटते वक्त साथ में दो सरदार , एक हरियाणवी भाई थे। बात ही बात में हम देहरादून स्टेशन पहुंच गए और उतरते वक्त दोनों सरदार भाई गले लग गए। पल भर के ही मुलाकात के बाद बिछड़ने पर ना जाने मन क्यों भावुक सा हो गया, मैंने कहा - पा जी, फिर मुलाकात जरुर होगी। सरदार जी ने जवाब दिया - ओय भाई ! हम घुमक्कड़ियों की मुलाकात नहीं होगी तो किसकी होगी भई। पांच सौ नोट मैं ड्राइवर को पकड़ाने लगा, यह देखते ही तीनों ने मेरा हाथ पकड़ लिया, सब चिल्लाने लगे, रैण दे, रैण दे भई ,ओय मत कर वीरे । सरदार ने पहुंच कर ह्वाट्सप करने का इशारा किया। ट्रेन प्लेटफार्म पर जस्ट कुछ मिनट पहले ही लगी हुई थी। यह मुसाफ़िर भी सभी को अलविदा कहकर मंजिल कि तरफ रवाना हो गया।

यात्रा समाप्त

नोट - इस यात्रा के सभी मनमोहक दृश्यों को वीडियो के माध्यम से देखने के लिए अभी यूट्यूब चैनल Amit singh Paliwall पर जाइए और चैनल को सब्सक्राइब कर वीडियो का आनंद लीजिए। आपके फीडबैक का इंतजार रहेगा !

फोटो क्रेडिट - मुसाफ़िर

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