Osla 1/undefined by Tripoto

Osla

Suny Tomar
अगला पड़ाव था कलकती धार जोकि लगभग 8 km दूर था। जाना पैदल ही था। हम चले जा रहे थे कहीं रूक के आराम करते तो कहीं पानी पीते। रास्ते में पहाड़ी औरते अपने वजन से भी ज्यादा लकड़ी के बड़े बड़े फट्टे उठा के लेके जाती हुई मिलती। तो उन्हें देख के अपनी शारीरिकताकत का गुरूर टूट जाता। क्या गजब के मेहनती और बहादुर लोग होते है पहाड़ी। शांत, खुशमिज़ाज़, मिलनसार, बहादुर इतने की पहाड़ उनके सामने बौने नजर आते। खतरनाक से खतरनाक पहाड़ो को बहुत आसानी से पार कर जाते है ये। रस्ते में भेड़ो को चराने वाले मिलते और उनसे पूछते की कहाँ जा रहे हो, या कहाँ से आ रहे हो तो वो दूर कोई पहाड़ी चोटी दिखते जिसपे जाने के बारे में सोचना भी हमारे लिए मुमकिन न था और कहते की वहां से आ रहे हैं ऐसी ही दूसरी खतरनाक चढ़ाई वाली चोटी दिखते और कहते की वहाँ जा रहे हैं। साधन के नाम पे उनके पास फटे हुए पलास्टिक के जूते होते सर्दी से बचने के लिए एक फटा सा कम्बल होता और सुरक्षा के लिए उनके पास होते पालतू कुत्ते जिनके गले में काँटेदार फंदा होता। ये फंदा इसलिए लगाते है कि जब पहाड़ी लेपर्ड उनपे हमला करे तो वो खुद ही घायल हो जाये क्यूँकि वो हमेशा गर्दन पे ही हमला करते हैं। इन्ही सब सुंदर दृश्यों को देखते और सोचते विचरते हमआखिर-कार कलकती धार पहुंच ही गए वो एक बहुत बड़ा पहाड़ी बगियाल या पहाड़ी घास का मैदान था जो की पूरा का पूरा टूरिस्टों के टेंटो से भरा हुआ था। हमारा भी टेन्ट वहीँ लगा हुआ था हम करीब 3 बजे तक वहाँ पहुंच गये। हमारा खाना तैयार था हम सबने खाना खाया, और जिनको आराम करना था वो आराम करने टेंट में घुस गए। पर मेरा मन तो पास ही एक छोटे से पहाड़ को फ़तेह करने का था। तो मैंने पहले टीपू और वेरा को पटाया और हमने उसे चढ़ना शुरू कर दिया चढ़ाई एक दम सीधी थी, फिसलन भरी थी। थोड़ा चढ़ने पर ओले पड़ने शुरू हो गये बचने के कुछ था नहीं तो वापिस उतरना पड़ा। उतर के मैंने अलोक को पटाया और हम रैनकोट पहन के चढ़ना फिर से शुरू कर दिया। ओले अभी भी पड रहे थे, फिसलन थी, ऐसे में हमारे quachua के जूते काम आये उनकी grip अच्छी थी और हम पहाड़ चढ़ गए। चढ़ने पर एक बहुत बड़ा, सपाट घास का मैदान हमारे सामने था और उसके पीछे थे कुछ चीड़ के पेड़ और उनके पीछे थे पहाड़ और पहाड़ से गिर रहा था एक झरना और झरना जहाँ से गिर रहा थे वहां एक दम सफ़ेद बर्फ जमी हुई थी और उसके पीछे थे घने काले और सफ़ेद बदल जो हमारे ऊपर बर्फ के छोटे छोटे गोले बरसा रहे थे। ओले और तेज़ी से गिरना शुरू हो गए तो हमने भाग के चीड़ के पेड़ों के निचे छुपकर खुद को और उधार लाये हुए कैमरे को बचाया। ओले गिरना बंद हुए तो हमने पूरा मैदान तसल्ली से देखा। फोटो खींचे , दूर दूसरे पहाड़ों पे चरती हुई भेड़ें और गायें कितनी खूबसूरत लग रही थी। पर नीचे जो मैदान था उपसे एक लाइन से जगह-जगह टेन्ट लगे हुए थे। 90 फीसद टेन्ट पे quchua लिखा हुआ था। ये एक विदेशी कंपनी है और हाईकिंग के प्रोडक्ट तैयार करती है।फिलहाल पहाड़ पे बस यही नाम दिखाई पड़ता है। चाहे जूते हो, कपडे हो, टेंट हो या कुछ भी हैकिंग से सम्बंधित हो तो बस quchua । पहाड़ के रहने वालो के नसीब में वोही प्लास्टिक का फटा हुआ जूता ही होता है quchua तो सिर्फ टूरिस्टो के पास होता है। महंगा बहुत है न इसलिए। खैर ये सब अपनी आँखों और कैमरे में कैद करते हुए हम निचे उतरना शुरू किये थोड़ी देर में निचे उतरे तो भीगने, और थकान की वजह से बुखार जैसा महसूस हुआ। तो खाना खाया , दवाई ली और सो गए, अगले दिन जल्दी उठने का वादा अपने गाइड से करते हुए।सुबह उठे, फ्रेश हुए और हर बार की तरह मैं और बेरा सबसे पहले उठ गये और बाकियो के उठने का इंतज़ार करने लगे। उठ जाने के बाद लड़कियों के तैयार होने का भी इंतज़ार करना था क्यूंकि उनको थोड़ा बहुत मेकअप भी करना होता था। खैर, मैं और बेरा कुढ़ते हुए उनका इंतज़ार करने लगे । सब तैयार हो गए, नाश्ता हो गया और हम अपने आखिरी मंजिल की तरफ रवाना हुए। मंजिल पे पहुँच के हमें वापिस यही आना था आज ही। कुल मिला के 16 km का सफर था आज का, 8 km जाना और 8 km आना। 1 km ही चले थे कि एंजेल की तबियत ख़राब हो गयी उसे, उलटी आना शुरू हो गयी। उसने कुछ खाया नहीं था सुबह नाश्ते में शायद इसीलिए उसकी तबियत खराब हुई। चाय भी नी पी। तो अब उसे अपने साथ आराम-आराम से लेके जाना था।मैंने और अलोक ने उसे लेके जाने की जिम्मेदारी ली और गाना गाते हुए, कहानी सुनाते हुए उसे प्रेरित करते हुए हम उसे ले जाने लगे, 4 km बाद गिरते हुए झरने के किनारे एक चाय वाले की दूकान थी तो वहाँ चाय और नाश्ता किया गया तो एंजेल की तबियत सुधरी। पहाड़ों में बारिश की वजह से हर बार रास्ता बदल जाता है, क्योंकी पुराना रास्ता ढह जाता है बरसात की वजह से, कई जगह हमें बड़े ही खरनाक रास्तो से जाना पड़ा। फिर जाके आयी वो जगह जिसे देख के हम सब गदगद हो गए। एक सौते पे बहुत बर्फ जमी हुई थी , हमारे रस्ते में पहली बार बर्फ मिली और एंजेल ने तो पहली बार पहाड़ी बर्फ को देखा। हम सबने खूब फोटो लिए और बर्फ में खूब खेला। ऐसे ही खेलते हुए, गप्पे मरते हुए, मजाक करते हुए हम सब अपने आखिरी पड़ाव और हमारी मंजिल हर की दून घाटी पहुंच गए। क्या गजब की सुंदर जगह है वो , कलकल करके बहती हुई रूपिन नदी जिसके किनारे बैठ के हमने खाना खाया, और फिर उसी नदी में मुँह डाल के जानवरो की तरह पानी पिया।
Suny Tomar
खैर ऐसे चलते हुये, गाना गाते हुए, नाचते हुए, खाते- पीते हुए, नदिया के मुड़ते, बहते, उखड़ते, और उफनते अंदाज़ की खूबसूरती की बाते करते हुए, दूर नजर आते पहाड़ और उन पर जमी बर्फ पर पहुंचने के सपने देखते हुए हम अपने पहले पड़ाव पहुंचे। पहला पड़ाव था ओसला गाँव के सामने, ओसला गाँव के ही किसी किसान का खेत, जिसे उसने किराये पे चढ़ा रखा था। ताकि टूरिस्ट लोग अपना टेन्ट गाड़ सके और प्रकृति का आनंद ले सकें। खैर खेती करते हुए हाड-तोड़ मेहनत करके पैदा हुई फसल का दाम ये टूरिस्ट लोग एक ही बार में चूका देते हैं। तो फायदे का सौदा हुआ खेत किराये पे देना। पर साथ ही ये ही टूरिस्ट लोग उस पहाड़ को काट के सपाट किये हुए खेत में अपनी गंदगी भी छोड़ जाते हैं।जो कि आज के समय की पहाड़ की सबसे बड़ी दिक्कतों में से एक है। हमारा टेंट भी वही लगा, कुल 3 टेन्ट लगे एक किचन टेंट और 2 स्लीपिंग टेंट। स्लीपिंग टेन्ट में सिर्फ 6 लोग ही सो सकते थे तो मैं और बेरा किचन टेंट में अपने गाइड, कुक और पोटर के साथ सोये। पर सोने से पहले तो हमें आस-पास घूम भी लेना था। जहाँ हमें सीढ़ीदार पहाड़ी खेत में खड़ी गेहूँ की फसल देखनी थी। पानी के सौते से चलती हुई एक अनाज पीसने की चक्की देखनी थी, (हाइड्रोलिक पॉवर का एक देसी नमूना )। फोटो खींचने और खिंचाने थे, और हाँ, एंजेल के साथ बनाया हुआ प्लान जिसमे आलोक को पेड़ से बांध के उसकी बीवी टीपू से डांस कराना था, तो अलोक को बांधा भी गया , टीपू से डांस भी करवाया बसंती स्टाइल में। और फिर हम सबने भी डांस किया। पहाड़ी गेहूँ के खेतो के बीच, एक दम साफ़ हवा और खुले आसमान के निचे नाचना, गाना, हसना और हसाना ………….. उफ़ क्या अनुभव था। उसके बाद हमने खाना खाया और पास ही एक दूसरे ग्रुप के लड़कों के पास जाने लगे जिनसे अभी हाल ही में दोस्ती हुई थी। वो लोग bonefire कर रहे थे। हम वहाँ गए और गानो का दौर फिर से शुरू हो गया। अँधेरी रात, खुला आसमान, साफ़ साफ़ दीखते चाँद और तारे जो की दिल्ली जैसे शहरों में अपवाद ही नजर आते हैं, बगल से बहती हुई रूपिन नदी तो बस एक ही गाना ध्यान आ रहा था। …………..ये रातें ये मौसम नदी का किनारा ये चंचल हवा…………….. पार्टी ख़तम हुई और हम सब अपने अपने टेन्ट में जाकर सो गये। अगली सुबह जल्दी उठना था पर खराब आदत ……………. उठे लेट ही। फ्रेश हुए, नाश्ता किया, बैग पैक किये और चल दिए अगले पड़ाव की तरफ पैदल पैदल।