105 दिन, 29 राज्य, 1 बाइक: एक जुनूनी मुसाफिर की अनोखी रोड ट्रिप

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घूमना किसी के लिए शौक है तो किसी के लिए ज़िंदगी की भाग-दौड़ से छोटा-सा ब्रेक लेने का तरीका। कोई पहाड़ों में कुछ दिन बिताना पसंद करता है तो कोई समुद्र किनारे। लेकिन फिर आते हैं वो लोग जिनके लिए घूमना-फिरना सिर्फ एक टाइम पास नहीं बल्कि जुनून है। इनका मन महीने या सालभर में एक बार घूमने से नहीं भरता, बल्कि ये तो महीनों और सालभर की छुट्टी लेकर एक नए सफर पर निकल पड़ते हैं। अगर आपको लगता है कि ऐसे लोग सिर्फ फिल्मों में ही दिखते हैं, तो अपने इस ख्याल को बदलिए क्योंकि ऐसा ही कुछ कारनामा कर दिखाया है कानुपर के अर्चित चंद्रा ने, जो सोशल मीडिया पर खिसका बंदा के नाम से अपनी यात्रा के किस्से लोगों तक पहुँचा रहे हैं। ये खिसका बंदा 105 दिनों में भारत के 29 राज्यों का सफर अपनी बाइक पर तय कर चुका है।

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एक मुसाफिर का जुनून

वैसे तो अर्चित को हमेशा से ही घूमने का शौक रहा है और वो कॉलेज के दिनों से वीकेंड पर कहीं ना कहीं घूमने निकल जाया करते थे। लेकिन सिर्फ इतने से तो उनके अंदर के मुसाफिर की आग ठंडी नहीं होने वाली थी! फिर क्या, किसी फिल्मी सीन की तरह ही उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ सफर की राह पकड़ ली और तय किया की वो अपनी प्यारी बाइक के साथ भारत के रंगों को देखने के लिए तैयार हैं। और अपने इस फैसले पर खरा उतरने के लिए अर्चित इतने दृढ़ थें कि उन्होंने अपने इस सफर को इसके अंजाम तक पहुँचाने के लिए बैंक से 3.5 लाख का कर्ज़ भी लिया

भारत दर्शन की शुरुआत

अब भारत के रंग देखने हैं तो राजस्थान के रंगीले राज्य से बेहतर क्या हो सकता है? खिसका बंदा के सफर की शुरुआत भी यहीं से हुई। बारिश के मौसम और सुहानी हवाओं के बीच अर्चित का सफर राजस्थान के सुनहरे रेतीले टीलों से होकर गुजरात के सफेद रेगिस्तान तक पहुँचा। इस रोड ट्रिप को आगे बढ़ाते हुए ये सवारी महाराष्ट्र से गुज़रकर भारत की दक्षिण तट रेखा पर कर्नाटक में बसे गोकर्ण, मरुदेश्वर से होते हुए केरल में कन्नूर, कोच्चि, एलिपे और त्रिवेंद्रम के बीच, लंबे नारियल के पेड़ और समुद्री हवा का मज़ा लेते हुए कन्याकुमारी पहुँची।

रामेश्वरम में धनुषकोड़ी की खूबसूरती और पौराणिक इतिहास का अनुभव करने के बाद अर्चित की इस रोड ट्रिप ने रुख किया भारत की फ्रेंच कैपिटल पॉन्डिचेरी का और फिर चेन्नई का सफर तय किया। अब उत्तर की ओर बढ़ता ये सफर बेंगलौर, हम्पी, हैदराबाद, नेल्लोर और विशाखापट्टनम का सफर तय कर छत्तीसगढ़ पहुँच चुका था, जिसके बाद बारी थी ओडिशा और झारखंड की।

झारखंड से खिसका बंदा और उनकी बाइक पहुँची भारत की सांस्कृतिक राजधानी कोलकाता में। हुगली पर खड़े हावड़ा पुल पर बाइक दौड़ाते हुए अर्चित गैंगटॉक पहुँचे और भारत के उत्तर पूर्व का सफर पूरा कर ये 105 दिन का सफर आखिर में पुरा हुआ अर्चित के शहर कानपुर में।

एक अड़चन जो बन गई ज़िंदगी भर की याद

अर्चित को वैसे तो इस सफर में ज़्यादा परेशानी नहीं आई, लेकिन एक दिक्कत जिसका सामना स्वभाविक तौर पर उन्हें भारत के अलग-अलग राज्यों में करना पड़ा हो थी भाषा। लेकिन इसी परेशानी ने ही उन्हें अपनी ट्रिप के कुछ यादगार लम्हें भी दिए।

कन्नूर में अर्चित की बाइक खराब हो गई, परेशानी ये नहीं थी, लेकिन ये थी कि कुन्नूर में, जहाँ ज़्यादातर लोग स्थानिय भाषा ही बोलते हैं, वहाँ पर कैसे अपनी परेशानी समझाएँ और कैसे मकैनिक ढूँढे। तभी तीन लोग, हाथ में बड़ा सा नारियल छीलने वाली छुरी लेकर अर्चित के पास पहुँचे, मलयाली में कुछ बात करने लगे। अर्चित ने उन्हें अपनी परेशानी समझाने की कोशिश की लेकिन भाषा की दीवार बीच में आकर खड़ी हो गई। फिर वो तीन लोग कुछ फुसफुसाते हुए वहाँ से निकल गए। ये देखकर अर्चित घबरा गए, शाम का वक्त था और उनके पास कुछ कीमती सामान भी, उन्हें लुटने का डर सताने लगा। कुछ देर हुई तो वही तीन लोग एक हिंदी बोलने और समझने वाले एक इंसान को वहाँ ले आए और अर्चित को एक मकैनिक ढूँढने में मदद मिल गई। सिर्फ यही नहीं जब तक अर्चि मकैनिक को बुला नहीं लाए, वो तीनों लोग वहीं पर बाइक की देखरेख के लिए खड़े रहे। कौन कहता है कि दिल की बात समझने के लिए भाषा की ज़रूरत होती है और ये बात अर्चित ने भी अपने सफर में जान ली।

माँ-बाप से मिला भरोसा

हर माँ-बाप की तरह अर्चित के माता-पिता भी उनके बाइक पर देश के चक्कर लगाने के आइडिया से खुश कम और घबराए हुए ज़्यादा थे। लेकिन अर्चित अपने इस जुनून को अपने माता-पिता को समझाने में कामयाब हुए और अब उनके माता-पिता उनसे हर सफर में उन्हें पूरी हिम्मत देते हैं।

दो पहियों पर भारत की गलियों का सफर करने के बाद अब खिसका बंदा अपने अगली यात्रा की तैयारी में है। तो आप भी इनसे प्रेरणा लें और Tripoto पर इनकी यात्राओं से यहाँ जुड़ें।

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