जम्मू-कश्मीर के 8 धार्मिक स्थल जो हर मुसाफिर की यात्रा में ज़रूर होने चाहिए

Tripoto
10th Apr 2023
Photo of जम्मू-कश्मीर के 8 धार्मिक स्थल जो हर मुसाफिर की यात्रा में ज़रूर होने चाहिए by Yadav Vishal
Day 1

जम्मू और कश्मीर को 'पृथ्वी पर स्वर्ग' कहा जाता हैं और कहां भी क्यों ना जाएं।ये राज्य है ही इतना खूबसूरत कि यहां आने वाले लोग इसे जन्नत मान बैठते हैं।प्राकृतिक की सुंदरता का अद्भुत रूप आपको यहाँ देखने को मिलता हैं।कश्मीर की बर्फ से ढकी पर्वतमाला और चमचमाती झीलों से घिरा हुआ यह राज्य भारत का लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। यहां आपको पहाड़ियां, हरे-भरे घास के मैदान, एकदम साफ और सुंदर झीलें, बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखलाएं देखने को मिलती हैं। धार्मिक लिहाज से भी यह राज्य पूरी तरह से परिपक्क हैं। यह राज्य बर्फीले पहाड़ की चोटियों और मनमोहक घाटियों के साथ आकर्षक मंदिरों की पूरी श्रृंखला के लिए भी जगजाहिर है।जम्मू-कश्मीर के सभी मंदिरों का एक समृद्ध इतिहास है जो इसे और भी आकर्षित बनाती हैं।इन मंदिरों के निर्माण के पीछे कई पौराणिक कथाएं मौजूद हैं जो उन्‍हें अपने आप में खास बना देती हैं।तो इस लेख में आज हम आपको जम्मू और कश्मीर के कुछ प्रसिद्ध मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं जो अपने पौराणिक कथाएं और अपने अनूठे वास्तुकला के लिए पुरे विश्व में फेमस हैं।

1. अमरनाथ मंदिर, पहलगाम

अमरनाथ मंदिर भारत जम्मू-कश्मीर राज्य के पहलगाम में स्थित है।यह एक शिव मंदिर हैं और हिंदू धर्म में सबसे पवित्र मंदिरों में से एक माना जाता है।यह मंदिर एक गुफा के रूप स्थित है। इस गुफा की लंबाई 19 मीटर, चैड़ाई 16 मीटर और ऊंचाई 11 मीटर है। इस शिव मंदिर की खासियत इस पवित्र गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग का निर्मित होना है।यह शिवलिंग लगभग 10 फुट ऊंचा बनता है।चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इस बर्फ का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। इस शिवलिंग के दर्शन करने हर साल लाखो लोग यहां आते है। इस मंदिर की यात्रा साल मे लगभग 45 दिन (जुलाई व अगस्त) में ही होती है बस। इस प्रमुख हिंदू धामों में से एक, अमरनाथ की यात्रा सावन (जुलाई से अगस्त) के महीने में पहलगाम से 16 किलोमीटर दूर चंदनवाड़ी (2,895 मीटर) से शुरू होती है।इस स्थान का नाम अमरनाथ व अमरेश्वारा इसलिए पड़ा क्योंकि भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था।

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2. रघुनाथ मंदिर, जम्मू

रघुनाथ मंदिर जम्मू शहर में स्थित हैं।यह मंदिर भगवान राम को समर्पित है।मंदिर की स्थापना कश्मीर के संस्थापक महाराजा गुलाब सिंह द्वारा की गई थी, और निर्माण 1835 में शुरू हुआ था। मंदिर वर्ष 1853 और 1860 के बीच पूरा हुआ। इस मंदिर का मुख्य आकर्षण इस की दीवार हैं जिसे तीनो तरफ से सोने की चादर से सजाया गया है। इस मंदिर में आपको रामेश्वरम धाम, द्वारकाधीश धाम, बद्रीनाथ धाम और केदारनाथ धाम के भी दर्शन हों जायेंगे।मंदिर में आम जनता के लिए "लिंगम" और "सैलग्राम" की एक विस्तृत गैलरी भी है।पास के क्षेत्र में मंदिरों का समूह (सभी महाकाव्य रामायण से संबंधित देवी-देवताओं को समर्पित) इसे उत्तर भारत का सबसे बड़ा मंदिर परिसर बनाता है।

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3. वैष्णो देवी मंदिर, जम्मू

तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद मां वैष्णोदेवी मंदिर भारत का दूसरा सबसे अधिक देखा जाने वाला धार्मिक मंदिर है।यह उधमपुर जिले के कटरा शहर के पास स्थित है और मां वैष्णो देवी को समर्पित हैं। माता वैष्णो देवी का मंदिर हिमालय पर्वत की एक गुफा में स्थापित है।यहां तक पहुंचने के लिए आपको 13 किलोमीटर का ट्रैक करना पड़ता हैं।यात्रा में थकान होने पर तीर्थयात्री घोड़ों की सहायता लेते हैं।भक्त यहां देवी वैष्णवी के तीन रूपों की पूजा करते हैं, महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती।भवन वह स्थान है जहां माता ने भैरवनाथ का वध किया था।ऐसा माना जाता है कि जो कोई भी वर मांगने के लिए इस धाम को जाता है, वह शायद ही कभी निराश होकर वापस आता है।

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4. शंकराचार्य मंदिर, श्रीनगर

शंकराचार्य मंदिर श्रीनगर शहर में स्थित हैं। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित हैं।कहा जाता है कि शिव का यह मंदिर क़रीब दो सौ साल पुराना है। इस मंदिर की वास्तुकला भी काफ़ी ख़ूबसूरत हैं।यह मंदिर कश्मीर स्थित सबसे पुराने मंदिरों में से एक है।यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 1100 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।ऊँचाई पर स्थित होने के कारण यहाँ से श्रीनगर और डल झील का बेहद ख़ूबसूरत नज़ारा दिखाई देता है।इस मंदिर का निर्माण राजा गोपादात्य ने 371 ई. पूर्व में करवाया था और डोगरा शासक महाराजा गुलाब सिंह ने मंदिर तक पँहुचने के लिए सीढ़ियाँ बनवाई थी। लोगों का मानना ​​है कि संत आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म को पुनर्जीवित करने के लिए 9वीं शताब्दी की पहली तिमाही में कश्मीर का दौरा किया था। इस घटना के कारण मंदिर का नाम बदलकर शंकराचार्य मंदिर कर दिया गया।

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5. सुध महादेव मंदिर, पत्नीटॉप

सुध महादेव मंदिर पत्नीटॉप में स्थित हैं।पत्नीटॉप जम्मू का एक फेमस हिल स्टेशन हैं।जम्मू से 120 किलोमीटर दूर पटनीटॉप के पास चन्हानी में स्थित है।सुध महादेव मंदिर के निर्माण का समय आज से लगभग 2800 वर्ष पूर्व का बताया जाता है। कहा जाता है जिसका पुनर्निर्माण यहां के स्थानीय निवासी रामदास महाजन और उनके पुत्र द्वारा एक शताब्दी पूर्व किया गया।इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां पर एक विशाल त्रिशूल के तीन टुकड़े ज़मीन में गढ़े हुए हैं।जिसके बारे में कहा जाता है कि ये स्वयं भगवान शिव के हैं। इस मंदिर में एक प्राचीन शिवलिंग, नंदी और शिव परिवार की मुर्तिया भी है।भगवान शिव का यह पवित्र मंदिर 1225 मीटर की ऊंचाई पे स्थित हैं।

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6. बहू किला और मंदिर, जम्मू

बहू किला और मंदिर जम्मू शहर में तवी नदी के तट पर स्थित है।किले के अन्दर एक मंदिर हैं जो मां काली को समर्पित हैं। कहा जाता हैं कि इस मंदिर का निर्माण 1822 में हुआ था।जहां हर मंगलवार और रविवार को सैकड़ों भक्त आते हैं। साल भर पहाड़ियों, सीढ़ीदार बगीचों (बाग-ए-बहू) और झरनों से घिरा यह किला पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण का केंद्र रहता है।

7. बूढ़ा अमरनाथ, जम्मू

यह एक शिव मंदिर हैं।मान्यता है कि इस मंदिर के दर्शनों के बिना अमरनाथ की कथा ही नहीं, बल्कि अमरनाथ यात्रा भी अधूरी है, कहा जाता है कि भगवान शिव माता पार्वती को अमरनाथ की गुफा में जो अमरता की जो कथा सुनाई थी उसकी शुरूवात इसी स्थान से हुई थी।यह मंदिर जम्मू में स्थित हैं।यह पवित्र स्थान जम्मू से 235 किमी दूर पुंछ जिले के राजापुर मंडी में स्थित है। इस मंदिर की देखभाल यहां रहने वाले मुस्लिम परिवार तथा सीमा सुरक्षा बल के जवान ही करते हैं।क्योंकि इसके आसपास कोई हिन्दू घर नहीं है।यह सभी अन्य शिव मंदिरों से पूरी तरह से भिन्न है, मंदिर की चारदीवारी पर लकड़ी के काम की नक्काशी की गई है जो सदियों पुरानी बताई जाती है। यहां श्रावण पूर्णिमा के दिन बहुत विशाल मेला लगता है।इस मंदिर का शिवलिंग प्राकृतिक रूप से नहीं बना है बल्कि सफेद पत्थर से बना है।यह मंदिर जम्मू क्षेत्र के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है।

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8. नंगली साहिब गुरुद्वारा, जम्मू

नंगली साहिब गुरुद्वारा जम्मू में स्थित हैं। यहां जाने के लिए आपको जम्मू से अखनूर रोड अथवा मुगल रोड से होकर जाना पड़ता है। कहा जाता हैं कि बुड्ढा अमरनाथ जी के दर्शनों के उपरांत वापसी में शिरोमणि डेरा श्री संतपुरा गुरुद्वारा नंगली साहिब के दर्शन भी अवश्य करने चाहिएं।इतिहास इस बात का साक्षी है कि शेरे-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह सन् 1814 ईस्वी में और राजा गुलाब सिंह जी दो बार ठाकुर भाई मेला सिंह जी से मिलने इसी गुरुद्वारा साहिब में आए थे।इस गुरुद्वारा का निर्माण ठाकुर भाई मेला सिंह जी ने सन् 1803 ईस्वी में करवाया था।यह गुरुद्वारा सन् 1947 में एक अग्निकांड से जल गया था और फिर महंत विचित्र सिंह जी द्वारा इसका पुनर्निर्माण करवाया गया।इस ऐतिहासिक मंदिर ने जम्मू और कश्मीर में सिख धर्म के प्रचार में एक महान भूमिका निभाई है। इसलिए राज्य का सिख समुदाय इस पवित्र डेरे से काफी जुड़ा हुआ है।सिख और हिंदू भक्तों की नियमित यात्रा के अलावा, राज्य के सभी कोनों से सिख यहां हर साल बैसाखी की पूर्व संध्या पर प्रसाद और पूजा करने के लिए इकट्ठा होते हैं।

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