घुमक्कड़ी के वो शानदार दिन: नानी के घर पर बिताई छुट्टियाँ

Tripoto

"हम तो छतों पर नींद,
और गाँवों में बचपन भूल आए हैं,
गर्मियों में अब घंटी वाली कुल्फ़ियाँ नहीं मिलती होंगी,
तारों ने टिमटिमाना छोड़ दिया होगा,
मारिओ के अब दो बच्चे भी होंगे शायद, या फिर
टॉम और जेरी ने दोस्ती कर ली होगी,
मैं आगे निकल गया या सब चले गए, नहीं पता,
जो सादगी थी, थी बहुत खूबसूरत
मेरे बचपन की उन छुट्टियों की"

- निशांत त्रिपाठी

Photo of घुमक्कड़ी के वो शानदार दिन: नानी के घर पर बिताई छुट्टियाँ 1/5 by Kanj Saurav
श्रेय: Soumitra Manwatkar

बचपन में न तो सोशल मीडिया था और न ही कोई ट्रैवल बकेट लिस्ट। फिर भी घूमने का शौक़ उतना ही था जितना आज है। बिना पैसों के, बिना किसी टूर प्लानर के, हम दोस्तों के साथ निकल पड़ते थे अपने एडवेंचर पर। कभी किसी रहस्यमयी खंडहर का पता लगाते तो कभी नदी का रास्ता नाप लेते। इस ऊधम को और बढ़ावा देती थी गर्मियों की छुट्टियाँ। जब हमारे पास महीना भर होता था खुराफ़ातों को अंजाम देने का।

साल भर हम परिवार के साथ प्लान करते कि इन छुट्टिओं में यहाँ जाएँगे, वहाँ घूमेंगे । लेकिन अंत में जाते तो नानी-दादी के घर ही थे । भले इंस्टाग्राम पे हम अपने अनोखे अनदेखी जगहों के फ़ोटोज़ शेयर नहीं कर सकते थे, पर उसकी ज़रुरत ही नहीं थी क्योंकि हम इतनी मस्ती कर रहे होते थे कि लोगों को बताने का मौक़ा ही नहीं मिलता था।

हमने बात की ट्रिपोटो के लेखकों से कि कैसी हुआ करती थीं उनकी गर्मी की छूट्टियाँ :

" ट्रेकिंग क्या होती है मुझे पता नहीं था तब। लेकिन जब नाना-नानी घर से सुबह 5 बजे निकलते तो मुझे भी साथ ले जाते। वो दूर-दूर तक जा कर लोकल लोगों से उनके मंदिरों और देवताओं का पता लगाते, और मैं उन गाँवों में खेत और सुन्दर से घर देखता । छोटी- छोटी पहाड़ियों पर बनी इन मंदिरों पर मैं खेल-खेल में चढ़ जाता और नाना-नानी धीरे-धीरे ऊपर आते। कैमरा नहीं था तब मेरे पास कि वहाँ से दिखते नज़ारों को क़ैद कर के दूसरों से बाँट सकूँ । पर आज ख़ुशी होती है सोच कर कि कैमरे से उन तस्वीरों को खींच लेता तो वो शायद इस तरह से दिल में नहीं बस पाते ।"

- कंज सौरव, राँची, झारखण्ड

Photo of घुमक्कड़ी के वो शानदार दिन: नानी के घर पर बिताई छुट्टियाँ 2/5 by Kanj Saurav
श्रेय: A.Sydis

"जयपुर की जलती गर्मियों से भागने के लिए मैं और मेरा परिवार नैनीताल जाया करते थे । वहाँ रहते थे मेरे दादाजी, जो दादाजी कम और मेरे दोस्त ज़्यादा थे । इन छुट्टिओं में ना मम्मी मुझे डाँट सकती थीं, न पापा । मेरे दादाजी मेरे साथ पूरा वक़्त बिताते । कभी हम नैनी-झील के किनारे बैठ कर प्रेमचंद की कहानियाँ पढ़ते तो कभी पहाड़ों में टहलते हुए वो मुझे देवी-देवताओं की पौराणिक कथाएँ सुनाते थे । मैं उनसे दुनिया में होती हर चीज़ के बारे में सवाल करती और वो बड़े आराम से मेरे सारे सवालों का जवाब देते । ये बचपन की यादें कभी वापस नहीं आएँगीं पर मैंने खेल-खेल में सब कुछ जो सीखा, वह हमेशा मुझे मेरे दादाजी की याद दिलाएगा ।"

- सौम्या भटनागर, नैनीताल, उत्तराखंड

Photo of घुमक्कड़ी के वो शानदार दिन: नानी के घर पर बिताई छुट्टियाँ 3/5 by Kanj Saurav
श्रेय: nomadnaturemunchkin

"नानीजी के घर से कुछ दूरी पर आम के पेड़ थे । हम हर छुट्टियों में उन खेतों में घूमा करते और पेड़ों से आम तोड़ कर खाया करते थे । सुबह से शाम हो जाती आम तोड़ते हुए । बाल्टी भर छोटे देसी आम चूसा करते, बिना काटे, बिना छीले । हर एक के लिए बाल्टी भर आम। और कमाल की बात ये की वो हजम भी हो जाते थे । अब तो केमिकल्स से पके हुए एक आम को खाने के बाद ही लगता है कि ज़्यादा न हो जाए । अब न तो वो गर्मी कि छुट्टियाँ हैं, न वो भरी बाल्टियाँ, न वो पेड़ और न ही उनका ख़्याल रखने वाले लोग ।"

- अंशुल शर्मा, पालमपुर, हिमाचल प्रदेश

"स्कूल का आख़िरी दिन, मैं ख़्यालों-ख़्यालों में तीखे मुड़ते रास्तों से होता हुआ राँची से रामगढ पहुँच गया, जहाँ रहती थीं मेरी नानी । तब गूगल नहीं हुआ करता था और न घर में कंप्यूटर। घर के बाहर अमरुद के पेड़ थे और उनसे बंधी बहुत सी गायें । मैंने उनकी रस्सियों से पेड़ों पर झूले बना लिए और चालू हो गयीं मेरी समर राइड्स । इतना बड़ा तो मैं हो गया था की चाय पीने से अब काला नहीं होता और नानी इतना खाना खिलातीं कि दुबला ना रहूँ । सुबह की चाय के बाद पास वाली नहर की घास पर मैं लेट जाता। धूप में भी नहर का ठंडा पानी पूरे माहौल को ठंडक दे देता था । मैं वहाँ पानी पीने के लिए आने वाले जानवरों को देखता और उनकी तसवीरें बनाता रहता ।"

- निशांत त्रिपाठी, रामगढ, झारखण्ड

Photo of घुमक्कड़ी के वो शानदार दिन: नानी के घर पर बिताई छुट्टियाँ 4/5 by Kanj Saurav
श्रेय: Prithvi Bohra

"अभी कुछ दिनों पहले अपनी बेस्ट-फ्रेंड के साथ ट्रिप प्लान की ताकि काम से एक ब्रेक ले सकूँ । इन छुट्टियों में स्पा जाएँगे, रिलैक्स करेंगे, जो रोज़ की थकान चेहरे पर आ गयी है उसे हटाएँगे और जी भर के स्वादिष्ट चीज़ें खाएँगे । और इसी बात ने बचपन की याद दिला दी कि कैसे जब नानी के घर गर्मियों की छुट्टिओं में जाती थी तो वो सोने से पहले मेरी घंटे भर की चम्पी करती थीं।अलग-अलग नुस्खों से मुझे और ख़ूबसूरत बनातीं मेरी नानी और खाना तो इतना खिलातीं कि मैं जब वापस आती तो और प्यारी और गोल-मोल हो जाती। उम्मीद है कि बिल्कुल बचपन वाली छुट्टियों का एक्सपीरियंस ले कर आऊँ ।

- महिमा अग्रवाल, दिल्ली

Photo of घुमक्कड़ी के वो शानदार दिन: नानी के घर पर बिताई छुट्टियाँ 5/5 by Kanj Saurav
श्रेय: Vishal Kumbhar

"दिन में छुपने के लिए नई जगह तलाशते और देर रात तक लुक्का-छिप्पी खेलते । हम नाना-नानी के सो जाने के बाद तक खेलते रहते । और जब वो आवाज़ देते की क्या हो रहा है तो चुप-चाप बिस्तर में आँख मूँद कर लेट जाते । थोड़ी देर बाद जैसे उनके खर्राटों की आवाज़ आती हम वापस खेलना शुरू कर देते ।"

- समर्थ अरोड़ा, पीतमपुरा, दिल्ली

"अपनी भतीजी को एडवेंचर पार्क में ट्रैम्पोलिन पर कूदते देखा तो बचपन की याद आ गयी । नानाजी के घर में एक स्टोर रूम होता था, वहाँ ज़मीन पर पुराने गद्दे और रज़ाईयाँ रखी रहती थीं । कमरे के एक कोने पर ज़ंग लगे हुए लोहे के पिटारे एक के ऊपर एक रखे हुए थे । मैं और मेरा भाई जब गर्मी की छुट्टियों में उनके पास रहने जाते थे तो उस कमरे में सुपरमैन जैसे केप पहन के पिटारों के ऊपर से छलांगे मार कर नीचे गद्दों पर लैंड करते थे। सालों-साल, काफ़ी बार चोट और डाँट खाने के बाद भी कूदना बंद नहीं किया। आज भी कूद ही पड़ेंगे, पर पिटारा वज़न नहीं उठा पाएगा।"

- मृणालिनी खट्टर, दिल्ली

हमें पता है कि आपके बचपन की यादें भी ऐसे खट्टे-मीठे पलों से भरी हैं जब आप नानी-दादी के घर घूमने जाते थे । क्या आप उन बीते दिनों की छुट्टियों को मिस करते हैं ? हमें नीचे कमैंट्स में बताएँ।

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