साथ घूमकर तय किया अजनबी रूममेट से बेस्ट फ्रेंड बनने का सफर

Tripoto
Photo of साथ घूमकर तय किया अजनबी रूममेट से बेस्ट फ्रेंड बनने का सफर by Rishabh Dev

यात्राओं से मैंने बहुत कुछ सीखा है और बहुत कुछ पाया है। मैंने शहरों को कुछ अलग नजरिए को देखा है, मैं जब पहाड़ों में होता हूँ तो वहाँ की शांति नहीं, वहाँ के शोर को सुनने की कोशिश करता हूँ। इसलिए मुझे सोलो ट्रिप पर जाना पसंद है। अकेले सफर की अपनी आज़ादी होती है, अगर चलना है तो चलते जाओ और जब लगे  ठहराव ज़रूरी है तो ठहर जाओ। लेकिन कभी-कभी लगता है इस सफर में एक साथ होना चाहिए जो उस खूबसूरत सफर को यादगार बना सके। ऐसे ही एक सफर पर अपने एक दोस्त के साथ गया था और जब लौटे तो हमें एक दूसरे से लगाव हो गया था। पता नहीं वो किसका जादू था, उस सफर का या उस दोस्त के साथ का।

अजनबी सफर की शुरुआत

मैं दिल्ली में नौकरी कर रहा था, नौकरी करते-करते उकताना आम-सी बात है। उससे बाहर निकलने का मैंने एक तरीका निकाला था, घूमते रहो! जब भी ऑफिस से छुट्टी होती, मैं अपना बैग पैक करता और कहीं भी घूमने निकल जाता। इस बार जब मैं जयपुर के सफर से लौटा तो देखा कि मेरे फ्लैट में एक लड़की रहने आई थी। मेरे बगल वाला कमरा उसका था। मैं अपने ऑफिस जाता और वो अपने ऑफिस। हमारी कम ही मुलाकात होती और कम ही बात होती। जब भी नजरें टकराती ‘हाय-हैलो’ से बात शुरू होती और ‘हाय-हैलो’ पर ही खत्म हो जाती।

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मैं अपने डैली रूटीन पर था। जब भी टाइम मिलता, मैं कहीं ना कहीं निकल जाता। इसी बीच मैं कोलकाता, इलाहाबाद जैसे शहरों की यात्रा कर आया था। मैं जब भी उस लड़की को देखता था, मुझे वो परेशान-सी लगती थी। एक दिन जब मैं ऑफिस से आया तो देखा कि वो लड़की रो रही है। मैं उसके पास गया और उसकी वजह पूछी। उसने बताया कि नौकरी में काम बहुत है, परेशान हो रही हूं और छोड़ने का मन कर रहा है। तब मैंने बिना सोचे-समझे बोल दिया, कहीं घूमने चलें? ये सुनते ही उसने ‘हाँ’ कह दी, शायद उसे भी इस शहर से, काम से दूर जाना था।

मैंने उसी रात उससे कहा, मेरी एक शर्त है। उसने हैरानी से पूछा, क्या? मैंने कहा कि मैं हाई-फाई जगह पर नहीं रूकता। जहाँ भी जाएँगे लोकल बस से जाएँगे और सस्ती जगह पर खाना खाएँगे। वो हंसी और हाँ में सिर हिला दिया। जब मैं जाने लगा तब उसने हंसकर कहा, "सुनो! अब तो हम दोस्त हो गए हैं, अपना नाम तो बता दो।" हमने हंसते-हंसते एक-दूसरे को अपना नाम बताया। उसका नाम था, शीनू। काफी सोच-विचार के बाद जिस जगह को चुना, वो थी पटनीटाॅप। इस जगह पर मैं हमेशा जाना चाहता था लेकिन ये पता नहीं था कि इतने जल्दी जाऊँगा और किसी के साथ जाऊँगा ये तो बिल्कुल नहीं सोचा था। कुछ दिन प्लान करके हमने अपने सफर की तैयारी कर ली।

पठानकोट

रात को हम दिल्ली से बस में बैठे और पठानकोट के सफर पर निकल पड़े। काफी रात तक हम बातें करते रहे। हम एक-दूसरे के बारे में कुछ नहीं जानते थे, इसलिए बताने को बहुत कुछ था। उसने अपने स्कूल टाइम से लेकर दिल्ली तक की पूरी कहानी बता दी और मैंने अपने सफर के कई किस्से उसे सुनाए। कुछ ही घंटों में, मैं उसके स्कूल के दोस्त, उसके पूरे परिवार को जानने लगा था।

ऐसी ही बात करते-करते कब आँख लग गई, पता ही नहीं चला। जब आँख खुली तो बस पंजाब की सड़कों पर घूम रही थी। कुछ ही देर में सुबह हुई और हम पठानकोट पहुँच गए। पठानकोट में घूमना नहीं था, ये तो बस एक पड़ाव था। हमें तो यहाँ से पटनीटाॅप के सफर पर निकलना था। यहाँ हमने पंजाबी ढाबे पर खाना खाया और फिर निकल पड़े कटरा की ओर। कटरा वो जगह है, जहाँ से वैष्ण देवी के दर्शन के लिए चढ़ाई करनी पड़ती है। लेकिन हम पटनीटाॅप के लिए निकल पड़े।

पटनीटाॅप

पटनीटाॅप जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जिले का बेहद खूबसूरत हिल स्टेशन है। सर्दियों के समय यहाँ अच्छी संख्या में पर्यटक आते हैं। ऐसे ही खूबसूरत हिल स्टेशन पर हम जा रहे थे। कटरा से पटनीटाॅप का रास्ता बेहद खूबसूरत है। सुंदर पहाड़ और मनमोहने वाली घाटियाँ, घना जंगल सबकुछ बेहद सुंदर था। हम रास्ते में ही थे जब सूर्यास्त हो रहा था, क्या शानदार नजारा था? ऐसा लग रहा था वो नज़ारा रूक जाए और घंटों हम उसी को देखते रहें।

हम जब पटनीटाॅप हिल स्टेशन पहुँचे तो काफी रात हो गई थी। हमने होटल पहले से ही बुक किया था तो सीधे होटल जा पहुँचे। बैग रखा और रात की छटा में सड़क पर घूमने निकल आए।

यहाँ आकर मैं तो खुश था ही, मैं देख रहा था कि शीनू भी बहुत खुश नज़र आ रही है। उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि इस सर्द मौसम में उसके शरीर से एक पुराना खंडहर ढह गया और खुशी की चादर ओढ़ ली हो। रात के अंधेरे में हम बातें करते हुए चले जा रहे थे। एक जगह एक छोटी-सी दुकान मिली, जहाँ हमने गर्मा-गर्म चाय पी। मैं आमतौर पर चाय नहीं पीता लेकिन सफर के दौरान चाय की चुस्कियों का मज़ा ही कुछ और होता है। उस रात हमारा होटल लौटने का मन नहीं हो रहा था। लेकिन जब उस दुकानवाले ने बताया कि रात को यहाँ बाघ भी आता है तो उस डर से हम वापस अपने होटल में दुबक गए। रात को बातें करते-करते सो गए।

सर्द और खूबसूरत सुबह

सुबह नींद कुछ ज्यादा ही जल्दी खुल गई। बालकनी में आया तो मैं खुशी से चिल्ला पड़ा। हमारे सामने एक खूबसूरत घाटी थी और सामने बर्फ से लदे हुए पहाड़। जैसा मैंने फिल्मों में देखा था, वैसा ही कुछ अपने सामने देख रहा था। शीनू अब भी सो रही थी, मैंने उसे जगाया। वो आधी नींद में ही बोली, इतनी जल्दी जागकर क्या करेंगे? मैंने उसकी आंखें अपने हाथों से बंद की और बालकनी में ले गया। वो हाथ हटाने को जिद कर रही थी, जब मैंने हाथ हटाया तो कुछ सेकंड तो हक्की-बक्की रह गई।

फिर क्या था? वो उछलकूद करने लगी और मैं हंसे जा रहा था। हम वहीं बालकनी मे बैठकर सूर्योदय का इंतजार करने लगे और जब सूरज की पहली किरण पड़ी तो ऐसा लगा कि इससे खूबसूरत कुछ नहीं हो सकता। यात्राएँ अद्भुत और कठिन होती हैं लेकिन जाने क्यों ये यात्रा मुझे बेहद सरल और मज़ेदार लग रही थी। पहली बार मुझे किसी का साथ अच्छा लग रहा था और इस सफर को एंजाॅय कर रहा था।

पहाड़ों पर सुबह-सुबह का नाश्ता मैगी और चाय ही होती है। इसी के साथ हमारी भी सुबह अच्छी हो गई। हम पटनीटाप को इत्मीनान से नापने निकल पड़े। हम इस हिल स्टेशन पर सड़कों से दूर जंगल में आ गए। यहाँ यूकेलिप्टस और देवदार के लंबे-लंबे पेड़ थे। जिनकी वजह से धूप पूरी तरह से धरती तक नहीं आ पा रही थी। यहाँ हम घंटों तक घूमते रहे और बातें करते रहे। यहाँ देवदार के जंगलों के बीच हमने काफी वक्त बिताया। पास में एक पार्क था जहाँ हमने झूला झूला और उसी उल्टे झूले में उसने मुझे थैंक्यू कहा और मैंने भी मुस्कुराकर ‘शुक्रिया’ कहा।

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हम दिल्ली लौट आयए और फिर से अपनी पुरानी जिंदगी जीने लगे। लेकिन अब मेरी फ्लैटमेट मेरी सबसे अच्छी दोस्त भी बन गई थी। उस सफर के बाद मुझे समझ आया कि ‘जिंदगी की खुशी अकेले में नहीं, साथ में है। खुशी दोगुनी हो जाती है, जब आप किसी के साथ अपनी खुशी को बाँटते हैं’। मैं अब भी सोलो ट्रिप पर जाता हूँ लेकिन अब सफर के दौरान, सफर के पहले साथ चलने वाले साथियों की खोज में रहता हूँ।

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