पूरब के स्कॉटलैंड- मेघालय यात्रा की तैयारियाँ (Scottland of the East- Meghalaya) - Travel With RD

Tripoto
3rd Dec 2016
Photo of पूरब के स्कॉटलैंड- मेघालय यात्रा की तैयारियाँ (Scottland of the East- Meghalaya) - Travel With RD by RD Prajapati

जैसा की हम सभी जानते हैं की हमारे देश का पूर्वोत्तर हिस्सा भी कोई कम खूबसूरत नहीं है, फिर भी देश के दूसरे हिस्सों की तुलना में ये क्षेत्र काफी कम देखे व् सुने जाते हैं। राष्ट्रीय खबरों में भी न इनकी कभी चर्चा होती है.. न सुर्ख़ियों में ही ये कभी बने ही रहते हैं। अगर होती भी है तो नहीं के बराबर। अब तक पूर्वोत्तर भारत के नाम पर सिक्किम का ही दर्शन हो सका था,

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शिलोंग: एक नजर

लेकिन यह पूर्वोत्तर भारत का आठवां राज्य माना जा सकता है। बाकि के मुख्य सात राज्यों में से किसी के भी दर्शन अब तक नहीं हो पाए थे। असम से ही पूर्वोत्तर भारत की सीमाएं प्रारम्भ होती है, सड़क और रेल मार्ग से जाने के लिए असम का गुवाहाटी शहर ही पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार है। गुवाहाटी से ही बाकि सभी पूर्वोत्तर राज्यों की राजधानियां जुडी हुई हैं। भारत के इन सात राज्यों में से पहले मैंने नागालैंड जाने का सोचा था, लेकिन दिसंबर के पहले हफ्ते में वहां होने वाले हॉर्न बिल फेस्टिवल के कारण बजट होटलों की दिक्कत थी, साथ ही नागालैंड जाने के लिए अन्य राज्यों के लोगों को परमिट की भी आवश्यकता होती है, इसलिए नागालैंड छोड़ मैंने मेघालय का कार्यक्रम बना लिया। लेकिन मेघालय यात्रा शुरू करने से पहले मैं जरा पूर्वोत्तर भारत के यातायात की हल्की-फुल्की चर्चा कर लेता हूँ...

उत्तर पूर्वी भारत के ट्रेनों के बारे में... यूँ तो पूरा पूर्वोत्तर ही बेहद खूबसूरत हैं, इस कारण शुरू कहाँ से करें ये एक समस्या है। असम और मेघालय पहुंचना तो सबसे आसान है। पिछले कुछ वर्षों में रेलवे ने भी बड़े जोर-शोर से उत्तर-पूर्व के बाकि राज्यों को भी रेलमार्ग से जोड़ने का काम करना शुरू कर दिया है। अरुणाचल में भी आजकल नयी-नयी रेल सेवा बहाल की गयी है, ईटानगर के पास नहारलागुन रेलवे स्टेशन को गुवाहाटी से जोड़ा गया है। नागालैंड का बड़ा रेलवे स्टेशन दीमापुर है जो गुवाहाटी और डिब्रूगढ़ से पहले से ही भली भांति जुड़ा हुआ है। मणिपुर में भी जिरीबाम रेलवे स्टेशन से असम के सिल्चर तक पैसेंजर ट्रेन सेवा चालू की गयी है, भविष्य में इसे म्यांमार तक जोड़ने की योजना भी है। मिजोरम में रेल सेवा कोई नयी नहीं है, वहां बईरबी से सिल्चर के नजदीक कथकल तक मीटर गेज सेवा काफी पुरानी है, पर 2013 में बंद कर दी गयी थी, परन्तु फिर से अभी इस लाइन को ब्रॉड गेज बनाकर आइजोल के नजदीक सैरंग तक जोड़ने का काम चल रहा है। 2016 से बईरबी से कथकल की पैसेंजर ब्रॉड गेज सेवा चालू है, जबकि बईरबी से सैरंग मार्ग का काम 2020 तक पूरी हो जाने की उम्मीद है। त्रिपुरा में भी अगरतल्ला रेलवे स्टेशन से सिल्चर को जोड़ा गया है।

सड़क मार्ग के बारे: जैसा कि मैं बता चूका हूँ कि गुवाहाटी पूर्वोत्तर भारत का प्रवेश द्वार है, इस कारण पूर्वोत्तर भारत के किसी भी शहर चाहे ईटानगर, या आइजोल, शिलांग या अगरतल्ला, गुवाहाटी होकर ही जाना पड़ता है। गुवाहाटी रेलवे स्टेशन के पास से पूर्वोत्तर के इन सभी शहरों के लिए छोटी-बड़ी गाड़ियां एवं बसें उपलब्ध हैं।

हवाई मार्ग के बारे: पूर्वोत्तर भारत के दो सबसे बड़े एयरपोर्ट हैं- गुवाहाटी एयरपोर्ट एवं डिब्रूगढ़ एयरपोर्ट। दोनों भारत के अधिकतर बड़े महानगरों से सीधे जुड़े हुए हैं। इसके अलावा छोटे एयरपोर्ट शिलांग, दीमापुर, इम्फाल, आइजोल, सिलचर, अगरतल्ला आदि में भी हैं, लेकिन इनका जुड़ाव सिर्फ कोलकाता या दिल्ली से ही है।

मेघालय में मेरा कार्यक्रम मुख्यतः राजधानी गुवाहाटी से शिलोंग की दूरी कोई अस्सी-नब्बे किमी रही होगी, रास्ते शानदार थे। मेघालय तो वैसे भी अपनी स्वच्छता के लिए जाना जाता है। दोनों तरफ हरियाली भरपूर थी, बांस के खड़े-खड़े लाखों पेड़ अपना सौंदर्य बिखेर रहे थे, और ठण्ड होने के कारण कोहरा भी था। टेढ़े-मेढ़े पहाड़ी रास्ते शुरू हुए। सड़क पर बादलों के होने के एहसास ने मुझे मेघालय शब्द के मतलब का भी एहसास करा दिया- मेघालय यात्रा की शुरुआत: जैसा की मैं पहले बता चुका हूँ की आरम्भ में मेरा नागालैंड जाने का कार्यक्रम था। लद्दाख से लौटने के बाद अगस्त 2016 में नागालैंड के बारे खूब रिसर्च करना शुरू किया। दिसंबर में जाना था, लेकिन उस वक़्त वहां हॉर्न बिल फेस्टिवल देखने के लिए देश-विदेश से काफी संख्या में लोग आया करते हैं। इसके लिए छह महीने पहले तक सारे बजट होटल बुक हो चुके होते हैं। जो बचे-खुचे होटल थे, उनका किराया ढाई से तीन हजार रूपये तक था। इस कारण मैंने नागालैंड यात्रा का विचार त्याग कर मेघालय चुन लिया। शिलांग तथा भारत के सबसे अधिक वर्षा वाले स्थान चेरापूंजी का था। जाना तो गुवाहाटी होकर ही था, इसलिए एक दिन वहां भी रुकना था। चेन्नई-डिब्रूगढ़ एक्सप्रेस जो टाटानगर होकर गुवाहाटी जाती है, उसमें मेरा आरक्षण 3 दिसंबर 2016 का था। यह ट्रेन टाटानगर सुबह के साढ़े तीन बजे पहुँचने वाली थी, पर ये समय जरा सा पेचीदा था, क्योंकि इस समय घर से स्टेशन तक जाने के लिए न कोई ऑटो मिलती न बस। इसलिए रात के बारह बजे ही स्टेशन पर आकर धरना दे दिया। तीन घंटे तक वेटिंग हॉल में झपकियां लेने के बाद ट्रेन अपने नियत समय पर ही आयी, गुवाहाटी के लिए सफर शुरू हो गया। टाटानगर से गुवाहाटी लगभग चौबीस घंटे का ट्रेन सफर था, इतना ही समय टाटा से दिल्ली का भी लगता है। गुवाहाटी से पहले एक स्टेशन है कोकराझार। यह स्टेशन कुछ नक्सली किस्म के गतिविधियों और लूट-पाट के लिए कुख्यात है, ऐसा सुना था। लेकिन अगले दिन सुबह के अँधेरे में ही यह स्टेशन कब निकल गया कुछ पता न चला। कामाख्या मंदिर के पास भी एक स्टेशन है, पर हमें गुवाहाटी मुख्य स्टेशन पर ही उतरना था क्योंकि शिलोंग की सवारी गाड़ियां वहीँ से मिलती हैं। भारत के तीन पूर्वोत्तर राज्यों नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश एवं मिजोरम में भारत के अन्य राज्य के निवासियों को भी जाने के लिए इनर लाइन परमिट (Inner Line Permit) की जरुरत पड़ती है। यह परमिट या तो ऑनलाइन या कोलकाता, दिल्ली, गुवाहाटी या सम्बंधित राज्य के हेड ऑफिस से प्राप्त किया जा सकता है। सुबह के पांच बजे से पहले ही ट्रेन गुवाहाटी पहुँच गयी। प्लेटफार्म पर उतरते ही कुछ एजेंट हमारे पीछे पड़ गए। एक ने पूछा "कहाँ जाना है?" मैंने कहा "शिलोंग, कितना भाड़ा लगेगा?" उसने कहा "ढाई सौ रूपये". इगनोर कर आगे बढ़ा। एक दूसरा एजेंट फिर पीछे पड़ा. उसने दो सौ बीस मांगे. मैंने कहा दो सौ दूंगा। वो मान गया। बाहर आकर उसने गाड़ी दिखाया, मैं बैठ गया। कुछ यात्री और आये। गाड़ी निकलने के पहले फिर से एजेंट आया, कहा "पैसे निकालिए, टिकट कटाना पड़ेगा।" बहुत जिद करने लगा। एक काउंटर की ओर इशारा भी कर रहा था। मूड तो नहीं था पहले पैसे देने का, सुबह पांच बजे और कोई दूसरी गाड़ी भी नहीं थी। पैसे दे दिए। गाड़ी तो चल पड़ी, लेकिन उसने टिकट-विकट कुछ भी न दिया। गुवाहाटी से चालीस-पचास किमी आगे जाने के बाद एक पेट्रोल पंप पर बाकी कुछ यात्रियों से एक सौ सत्तर रूपये के हिसाब से वसूले गए। मैंने कहा, "किसी को दो सौ, किसी को एक सौ सत्तर क्यों?" ड्राईवर ने कहा, "जिसे पैसे दिए हो, उससे ही बात करो।" अब समझ में आया की उस एजेंट ने कैसे हमें उल्लू बनाया. गुवाहाटी में भी ऐसा होता है....मेघों का आलय यानि बादलों का घर। जैसे-जैसे धूप निकलती गयी, कोहरा छंटता गया। सिर्फ एक ही बार गाडी रुकी औरतीन घंटे में हम शिलोंग पहुँच गए। यहाँ होटल पहले से बुक न की थी, क्योंकि नेट पर सारे महंगे ही थे, सस्ते वाले नेट पर ऑनलाइन बुकिंग के लिए उपलब्ध न थे। सिर्फ उनका लिस्ट था। खैर, इधर उधर छान-बिन के पश्चात् शिलोंग के पुलिस बाजार इलाके में कुछ सात-आठ सौ के रेंज में कुछ होटल मिले, उन्हीं में से एक को चुन लिया। कुछ देर बाद शिलोंग लोकल भ्रमण का कार्यक्रम शुरू हुआ। तो अगले पोस्ट में आपको शिलोंग शहर का एक चक्कर लगवाता हूँ।

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