भूतिया गाँव की दिल दहला देने वाली दास्तान : वो गाँव जो गायब हो गया

Tripoto
Photo of भूतिया गाँव की दिल दहला देने वाली दास्तान : वो गाँव जो गायब हो गया 1/1 by लफंगा परिंदा
तस्वीर का श्रेय : ओल्ड इंडियन फोटोज़

डिसक्लेमर : यह कहानी मेरी नही बल्कि मेरे एक दोस्त की है जो एक पेशेवर ट्रेकर है | मैने ये कहानी मेरे दृष्टिकोण से लिखी है ताकि मुझे लिखने के साथ साथ आप को पढ़ने में भी आसानी हो |

मैं एक बढ़ती हुई एजेंसी के साथ कार्यरत पेशेवर ट्रेकर और लीडर हूँ | ये एजेंसी पूरे भारत में ट्रेक्स का आयोजन करती रहती है | हमारे द्वारा लोगों को ले जाए जाने वाले ट्रेकिंग के रास्तों में ज़्यादातर रास्ते हिमालय पर्वत शृंखला में हैं | इसके दो कारण हैं | 1. लोगों को हिमालय की प्राकृतिक सुंदरता बहुत अच्छी लगती है 2. यहाँ के रास्तों पर अच्छी तरह से चढ़ाई की जा चुकी है |

मैं पिछले तीन साल से चढ़ाईयां कर रहा हूँ और मुझे मेरी इस जीवन शैली से बहुत प्यार है | एजेंसी की तरफ से मुझे इस काम का पैसा भी अच्छा मिलता है और प्रकृति के बिल्कुल शुद्ध स्वरूप में घूमने की मेरी लालसा भी काफ़ी हद तक शांत हो जाती है | लेकिन ये ट्रेक्स चाहें जीतने भी खूबसूरत क्यूँ ना हों, एक समय ऐसा भी आता है जब आप उसी रास्ते पर हर हफ्ते चढ़ चढ़ कर ऊब से जाते हो | शायद मैं भी मेरी इस नौकरी के दूसरे साल के अंत तक इसी कारण की वजह से ऊब गया था |

जब मैने मेरी बॉस को मेरी इस मनोदशा के बारे में बताया तो उनके पास बहुत ही सरल सा जवाब था | "जाओ जा कर नई पगडंदियो की खोज करो | " उनका इतना कहना हुआ नही कि मैने अपने रोज़मर्रा के काम से एक महीने की छुट्टी ली और निकल पड़ा नई पगडंदियों और चढ़ाइयों की खोज करने |

चार दिन बाद में हिमालय पर्वतों में पहुँच चुका था | यहाँ तक पहुँचने के लिए मैने पहले एक रेलगाड़ी में सफ़र किया, फिर एक बस पकड़ी | कहीं कहीं पर तो मुझे आने जाने वाले वाहनों से लिफ्ट भी माँगनी पड़ी | पूरे दो दिन खर्च करने के बाद में हिमालय के पर्वतों में पहुँच चुका था और नये रास्तों की खोज करने के लिए तैयार था| राष्ट्रीय राजमार्ग 26 से लग कर एक छोटा सा कस्बा है जिसका नाम है शाओर | मैने अपना पहला पड़ाव यहाँ डाला | इस नये और अंजान से इलाक़े में अपने नए रास्ते की खोज करने की उम्मीद कर रहा था | सच कहूँ तो मेरा ये लक्ष्य मुझे इतना आसानी से हाथ आता नही दिख रहा था | कस्बे के चारों ओर इतना घाना जंगल था, लग रहा था मानो वाहा कोई कभी गया ही ना हो | इसलिए जब में आस पास घूम घूम कर तक भी गया, तब भी मैने उस जंगल में प्रवेश करना उचित नहीं समझा | मैं लगातार चार घंटों से चल ही रहा था और तब ही रुकता था जब मुझे अपने रास्ते में कोई मनुष्य नज़र आ जाता था | कोई इंसान दिखने पर मैं रुक जाता था ताकि उससे खाने और पीने के लिए कुछ माँग सकूँ | शाम के चार या पाँच बजे होंगे जब मैने अपने रास्ते पर गाँव की एक जवान औरत को मेरी ओर आते देखा | इस औरत के हाथों में कुछ नही था तो मैने सोचा कि इससे तो कुछ खाने पीने की गुहार लगाना व्यर्थ होगा | मगर आश्चर्य की बात तो यह है कि पास आने पर उस औरत ने ही मुझसे पूछा कि मैं कहाँ जा रहा हूँ और मुझे कुछ खाने पीने को चाहिए या नहीं | मुझे उस औरत का यह पूछना काफ़ी प्यारा व शालीन लगा और मुझे इस बात से काफ़ी प्रसन्नता भी हुई | ऊपर से उस औरत की शुद्ध हिन्दी सुन कर मैं दंग रह गया और मुझे लगा कि शायद ये औरत उत्तराखंड या भारत के उत्तरी इलाक़ों से ताल्लुक रखती है |

उसने कहा कि उसका गाँव केवल 10 मिनट की दूरी पर है | मैं उसके साथ उसके गाँव की ओर चल पड़ा | राह में चलते चलते मैने उसे अपनी कोई नयी चढ़ाई खोजने की योजनाओं के बारे में बताया जिसे सुन कर उसने मुझे अपने घर में रात बिताने का न्यौता दे डाला | मुझे ये सुन कर थोड़ा अजीब लगा | मैने उससे कहा कि मैं पहले उसका घर देख लूँ, फिर रात बिताने का निर्णय लूँगा |

आख़िरकार हम उसके गाँव पहुँच ही गये | गाँव का नाम था पिंदान | वाकयी में उसका गाँव केवल 10 मिनट की दूरी पर ही था | सच कहूँ तो इतनी दूर दराज का गाँव होते हुए भी पिंदान काफ़ी साफ सुथरा और इतना अच्छा लग रहा था कि एक बारगी तो यकीन ही नहीं हो रहा था | जाहिर है कि मैने किसी तरह की कोई शिकायत नहीं की | एक घंटे बाद मैने उस औरत (जिसका नाम ताना था ) के घर में बैठ कर भर पेट भोजन किया और उसके 17 जनों के परिवार में सभी से दोस्ती कर ली | उनके साथ कुछ समय बिताने के बाद मुझे लगा कि ये लोग वाकयी में काफ़ी अच्छे है तो मैने इन्हीं के साथ रात बिताने का निश्चय कर लिया |

शाम के करीब सात बजे ही थे की हम सबने गाँव में दूर से आती ढोल नगाड़ों की आवाज़ सुनी |

"ये क्या हो रहा है? " मैने पूछा |

"आज की रात वार्षिक उत्सव की है | " ताना के दादा जी ने बताया |

"कैसा त्यौहार ?"

"आज मानसून के मौसम के शुरू होने का पहला दिन है | आज के दिन हम गाँव के सबसे बलशाली सांड़ की बलि देते हैं | "

"सबसे बलशाली सांड़ की ही क्यूँ? "

"जैसे बरसात आने से पूरी ज़मीन उपजाऊ हो जाती है, उसी प्रकार गाँव के सबसे बलशाली सांड़ की बलि देने से पूरे गाँव में उर्वरता फैल जाती है | यह सब के लिए शुभ रहता है | "

"क्या मैं आ सकता हूँ? "

"हाँ क्यूँ नहीं! गाँव के हरेक व्यक्ति को इस उत्सव में सम्मिलित होना ज़रूरी है | "

मेरे अनुमान के अनुसार गाँव की दशा को देखते हुए ये पूरा समारोह काफ़ी भव्य लग रहा था | पूरे समारोह के दौरान ताना मेरे पास आई और खड़ी रही | उसने मुझे सभी रस्मों का मतलब समझाया।

"और क्यूंकी आज की रात पूर्णिमा की रात भी है, तो ये इस समारोह को और भी ख़ास बना देती है | आज रात हम सब लोग सांड़ के माँस की दावत उड़ाएंगे | क्या तुम माँस खाते हो ? "

ताना ने मुझसे पूछा |

"बिल्कुल | मुझे गाय का माँस बहुत पसंद है | मगर मुझे गौमान्स चखे बहुत समय हो गया है क्यूंकी आज कल शहरों में इस मुद्दे पर काफ़ी राजनीतिक विवाद चल रहे हैं | इस कारण अब हमें गाय का माँस मिलना बंद हो गया है | "

"ये तो बहुत अच्छी बात है | फिर तो तुम्हे बड़ा मज़ा आएगा | "

हमने प्रत्यक्ष रूप से तो सांड़ की बलि चढ़ाते हुए नहीं देखा मगर मुझे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता था | मैने एक बात पर ज़रूर गौर किया कि मैं और ताना बाकी गाँव वालों से दूर एकांत में एक चट्टान पर बैठे काफ़ी देर से बातें कर रहे थे | अचानक मुझे ये बात बड़ी अजीब सी लगी क्यूंकी मेरी समझ के अनुसार गाँव के लोग अपनी औरतों के मामले में काफ़ी कट्टर रूढ़िवादी विचारधारा वाले होते है | ऐसे में मैं यहाँ बैठा इस सुंदर सी कुँवारी कन्या के साथ मज़े से लंबी बातचीत किए जा रहा हूँ | ज़ाहिर है कि मुझे इस बात से कोई दिक्कत नहीं थी |

उस रात पूरे गाँव में मिल कर दावत का मज़ा लिया | हम सब लोग बंबू से बनी एक बड़ी सी छत के नीचे बैठ गये और जम कर खाने का आनंद लिया | सच कहूँ तो यहाँ खाया हुआ माँस मेरी ज़िंदगी का सबसे स्वादिष्ट माँस था | मैने ऐसा कोई भी व्यंजन पहले कभी भी नहीं चखा था | चूँकि रात्रि भोज के समय खाने वालों की संख्या करीब 200 थी और भोजन में केवल एक सांड़ था तो हम सब के हिस्से में काफ़ी थोड़ा तोड़ा माँस आया | मगर मैने चुपके से माँस का एक बड़ा टुकड़ा चुरा लिया तो मुझे काफ़ी खुशी तो हो ही रही थी साथ ही बहुत विशेष भी महसूस हो रहा था |

मेरे सोने का इंतज़ाम ताना के दादा जी के कमरे में किया गया था | "क्या मुझे आज की रात तुम्हारे दादा जी के बिस्तर पर बितानी पड़ेगी ?"

"नहीं नहीं, दादा जी तो पहले से ही कहीं और सो चुके हैं | " ताना ने जल्दी से उत्तर दिया |

"क्या तुम्हें यकीन है ? वैसे मैने समारोह में भी उन्हें कहीं नहीं देखा | पूरे जश्न में वो कहाँ थे ? "

"अरे, वो तो अंदर थे | "

"लेकिन हम सबने तो अंदर ही खाना खाया था, मैने तो उन्हें वहाँ भी नहीं देखा | "

"चिंता मत करो, देर हो गयी है | अब तुम सो जाओ | "

"अच्छा शुभ रात्रि "

ताना का व्यवहार मुझे थोड़ा अजीब तो ज़रूर लगा मगर चूँकि मैं बहुत थका हुआ था तो इस बात चीत के बाद में सीधा सोने चला गया |

अगली सुबह सूरज चमक रहा था और ऐसे दिन को देख कर तो मानसून के मौसम की शुरुआत बिल्कुल नहीं लग रही थी | मगर फिर भी, इतना अच्छा मौसम देख कर मुझे बड़ी खुशी हो रही थी |

चूँकि मुझे जल्दी ही अपना रास्ता पकड़ना था इसलिए मैने फटाफट अपनी सुबह जके नित्य कर्म निबटाए और स्नान कर लिया | नाश्ते के समय ताना मुझे फिर से मिली | नाश्ता भी एकदम भरपेट था |

सब कुछ निबटा कर अब मेरे निकालने का समय हो चला था | विदा लेते हुए ताना की माँ ने एक छोटी सी कठोर लकड़ीनुमा चीज़ तोहफे में दी |

"ये क्या है? " मैने पूछा |

"ये हमारी ओर से एक यादगार तोहफा है जो इस पूरे सफ़र में तुम्हे सौभाग्य देगा | "

"धन्यवाद | मुझे मेरी यात्रा में भाग्य की ज़रूरत तो ज़रूर पड़ने वाली है | वैसे ताना, तुम्हारे दादाजी कहाँ है? जाते हुए मैं उन्हें भी अलविदा कहना चाहूँगा | "

"वो अभी कहीं गये हुए हैं | मगर फ़िक्र मत करो, वो अब हमेशा तुम्हारे साथ रहेंगे | "

"ओह अच्छा, आप की खातिरदारी के लिए धन्यवाद| अब मुझे चलना चाहिए | "

और इस तरह मैं फिर अपने रास्ते पर निकल पड़ा | मेरा दिल व आत्मा दोनों खुशी से भर चुके थे और इस खुश मिजाज़ गाँव की खूब सारी कहानियाँ अपने झोले में लिए मैं अपने रास्ते पर निकल पड़ा |

अगले पाँच दिन तक में पहाड़ों में ही घूमता रहा | अजोग और पूर्ति नाम के आस पास के दो गाँव देखे | कुछ अन्य गाँवों में रुका भी | चेनाब के किनारे सफलतापूर्वक चढ़ाई करने के बाद भी मुझे ये महसूस हुआ कि यहाँ की ज़मीन और चढ़ाई का स्तर एक नये ट्रेकर के लिए कुछ ज़्यादा ही मुश्किल है | इसलिए मैने राज्य में किसी दूसरी जगह पर कोई सुविधाजनक और सामान्य स्तर के ट्रेक की खोज करने का निश्चय किया | इसलिए मैने मार्गराओं जाने का मन बनाया जहाँ जाने के लिए मुझे उसी रास्ते पर वापिस जाना था जहाँ से मैं आया था | इस बात से मैं काफ़ी खुश था क्यूंकी वापिस जाने का मतलब था कि पिंदान गाँव फिर से मेरे रास्ते में आएगा और मैं एक बार और इस गाँव को देख सकूँगा |

दो दिन बाद में फिर से उसी रास्ते पर चल रहा था जहाँ मुझे ताना मिली थी | वहाँ से मैने वो रास्ता पकड़ लिया जहाँ से मैं ताना के साथ उसके गाँव की ओर गया था |

जंगल में भटकते भटकते आधा घंटा बीत चुका था मगर पिंदान गाँव का अभी तक कोई अता पता नहीं था | मुझे लगा कि मैं शायद रास्ता भूल गया हूँ तो मैने वापिस पीछे पक्की सड़क पर जा कर किसी आने जाने वाले से मदद लेने की सोची | शाम घिर ही चुकी थी | कुछ देर इंतज़ार करने के बाद मैने दूर से अपनी जुगाड़ नुमा गाड़ी पर मेरी ओर ही आते देखा | मैने उसे रुकने का इशारा किया |

"सुनिए, क्या आप मुझे पिंदान की ओर जाने वाला रास्ता बता सकते हैं ? "

"क्या?"

"पिंदान| यहाँ से 10 मिनट की दूरी पर जो गाँव है | "

"क्षमा करें भैया, मुझे इस नाम से कोई भी गाँव नहीं पता है | और वैसे भी शाम के समय तो आप को यहाँ होना ही नहीं चाहिए | "

"क्या बात कर रहे हो ? आज से एक हफ्ते पहले में यहाँ एक लड़की से मिला था जो मुझे अपने गाँव ले गयी थी | उसका गाँव यहाँ से मुश्किल से आठ सौ से नौ सौ मीटर की दूरी पर होगा | लेकिन अब मुझे ढूँढने पर भी उस गाँव की ओर जाने वाला रास्ता नहीं मिल रहा है | "

वह आदमी अब चिंतित लग रहा था।

"अंधेरा घिर रहा है बाबू | आज की रात आप हमारे गाँव में रुक लीजिए | सुबह होने पर अपने पिंदान की खोज में निकल लेना | " उस आदमी ने मुझे सलाह दी |

शाम के सात बज चुके थे तो मैने उसकी सलाह मान ली | इस समय तो उस आदमी की सलाह मानना ही मुझे सही लग रहा था |

मैं उस आदमी के जुगाड़ पर बैठ गया | मात्र एक किलो मीटर की दूरी पर जाते ही वह आदमी फिर बोल पड़ा|

"क्या आप को ताना नाम की कोई लड़की मिली थी ? " उस आदमी ने मुझ से पूछा |

"जी हाँ, क्या आप उसे जानते हैं ?"

"व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता | क्या वो आप को गाँव के किसी समारोह में ले गयी थी जहाँ सांड़ की बलि दी जा रही थी ? "

" अरे हाँ, मैं उसी गाँव की बात कर रहा हूँ | इसका मतलब है कि आप भी उस गाँव को अच्छी तरह से जानते हैं | है की नहीं? "

"हाँ, मैं ऐसे गाँव को जानता हूँ | और मैं अकेला ही नहीं, इस इलाक़े में रहने वाले बहुत से लोग ऐसे गाँव को जानते हैं | पर देखिए, अब वो गाँव कहीं है ही नहीं | "

"आप का क्या मतलब है भैया?"

"मैं सच कह रहा हूँ बाबू | यहाँ ऐसा कोई गाँव है ही नहीं, मगर कई लोग बताते हैं कि वो इस गाँव में जा चुके हैं | "

"क्यूँ बातें बनाते हो भैया |"

"बाबू जी आप खुद ही सोचो कि मैं आप से झूठ क्यूँ बोलूँगा | इसीलिए मैं आप को अपने साथ उस जगह से निकाल लाया | नहीं तो अंधेरा घिरने के बाद अगर मैं आप को वहाँ अकेला छोड़ कर चला आता तो ना जाने आप के साथ क्या होता | "

" ये बात मेरी समझ से तो परे है | अरे भाई मैने उस गाँव में रात गुज़ारी है | खूब सारे लोग थे उस गाँव में |"

" हाँ, मैं जानता हूँ | कई लोगों ने यही कहानी सुनाई है | मुझे ये तो नहीं पता कि ये क्यों और कैसे होता है मगर ये बात ज़रूर पता है कि ऐसी घटनाएँ साल के इस समय पर ही होती हैं | मैं व्यक्तिगत रूप से कम से कम 4 लोगों को जानता हूं जो उस गाँव का दौरा कर चुके हैं, इसलिए मुझे पहले से ही पता है कि आप ने उस गाँव में क्या अनुभव किया होगा | "

"भैया कृपा करके मुझे डराना बंद करो।"

" मैं आप को डरा नहीं रहा बल्कि आप को समझाने की कोशिश कर रहा हूँ बाबू जी | आप मेरे साथ मेरे अपने गाँव चलिए और चैन से रात में सोइए | आप का दिमाग़ ठीक हो जाएगा | "

इतनी बातें करने के बाद मुझे कुछ भी ठीक महसूस नहीं हो रहा था | मुझे अपने कानों पर विश्वास होना बंद सा हो गया था | मगर मैने जैसे तैसे इस बारे में सोचना बंद कर दिया | वैसे तो ये कोई सपना नहीं था | मैं जानता था कि उस रात मैने जो भी देखा, सुना और महसूस किया वो काफ़ी असली था |

"वैसे क्या आप उस लड़की के दादा जी से मिले थे ? "

" अरे हाँ, मगर सिर्फ़ पहली रात को कुछ ही देर के लिए | उसके बाद में उनसे कभी नहीं मिल पाया | "

"मैं समझ सकता हूँ | गाँव के जिस सबसे बलशाली सांड़ की बात आप कर रहे हैं वह सांड़ असलियत में उस लड़की का दादा ही है जिसे गाँव के लोग हर मानसून के मौसम से पहले कुर्बान कर देते हैं | "

इतना सुनना था कि मेरा तो दिमाग़ ही खराब हो गया |

उस आदमी ने आगे बताया " जाते समय उस गाँव के लोग अतिथि को एक सख़्त और सफेद लकड़ीनुमा वस्तु उपहार स्वरूप देते हैं | वह लकड़ी के टुकड़े जैसी वस्तु और कुछ नहीं बल्कि उस बूढ़े आदमी की हड्डी होती है | अब वो हड्डी आप को नही मिलेगी चाहे आप ने उसे कितना ही संभाल कर रखा हो | "

आदमी की बात सही थी | मेरे बहुत ढूँढने पर भी मुझे वो यादगार तोहफा कहीं नहीं मिला | कोई अचरज की बात नहीं कि ताना के दादा हमेशा मेरे साथ रहेंगे |

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