बाघ की गुफाये गुप्त काल के सर्वश्रेष्ठ उदाहरणो में से एक

Tripoto
2nd Mar 2019
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यहाँ पर एक तरफ संग्रहालय है तो दूसरी तरफ गुफाये

बाघ की गुफाये गुप्त काल के सर्वश्रेष्ठ उदाहरणो में से एक है. यह बाघ गुफाये प्राचीन ग्वालियर राज्य में विंध्याचल पर्वत श्रेणी के निकट ही नर्मदा की सहायक नदी बाघिनी से पास में 'बाघ' नामक गावं के पास स्थित है. बाघिनी नदी या बाघ ग्राम के पास होने के कारण इसका नाम ‘बाघ’ गुफा पड़ा. यहाँ पर कुल 9 विहार गुफाये है.स्थानीय लोग इन गुफाओ को पंच-पांडु ( पांच पांडव ) की गुफाओ के नाम से भी पुकारते है. वर्तमान में ये गुफाये मध्य प्रदेश राज्य के धार जिले के अंतर्गत आ गयी है. इंदौर शहर से कुल दुरी लगभग 145 किलोमीटर है, एवं सुबह जाकर शाम को वापिस आया जा सकता है. वर्त्तमान में यहाँ का रखरखाव भारत सरकार की पुरातत्व संस्था द्वारा किया जा रहा ही जो कि 25 रूपये प्रवेश शुल्क वसूलने के साथ अन्य कार्य भी देख रही है. वर्ष 1953 में भारत सरकार द्वारा बाग गुफाओं को 'राष्ट्रीय स्मारक' घोषित किया गया था । इसके संरक्षण का जिम्मा पुरातत्व विभाग को सौंपा गया था जो अपना काम आज भी कर रहा है । विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के एक रेतीले पत्थर के पर्वत पर निर्मित इन गुफाओं की कुल संख्या 9 है।

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गुफा शब्‍द का इस्‍तेमाल यहां थोड़ा सा असहज है क्‍यों कि यह गुफाएं कम और बौद्ध धर्म के मठ ज्‍यादा है। यह प्राकृतिक रूप से नहीं बल्कि मानव द्वारा निर्मित है, इंसानों ने इसे पत्‍थरों और चट्टानों को काटकर बनाया है। इसे विंध्‍य के रॉक चेहरे के रूप में काटाकर बनाया गया है। यह गुफाएं, बनावट में अंजता की गुफाओं से काफी मिलती - जुलती है। सभी गुफाएं लेआउट में एकसमान है जहां चतुष्‍कोणीय कमरे और एक छोटा सा चैंबर है, साथ ही एक प्रार्थना कक्ष भी है। इन गुफाओं की सैर कई हजार साल पुरानी पेंटिग्‍स को देखने के लिए अवश्‍य करना चाहिए।

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इन गुफाओं को सही से दिनांकित नहीं किया जा सकता है लेकिन फिर भी यह लगभग 400 से 700 ई.पू की होगी। सबसे खास बात यह है कि यह गुफाएं आज तक प्रकृति की मार से बची हुई है और इतने लम्‍बे समय होने के बावजूद भी उल्‍लेखनीय है।

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खोज -

बाघ के चित्र सौकड़ो वर्षो तक अज्ञातवास में पड़े रहे .1818 ई. में सर्वप्रथम इन गुफाओ का परिचय तथा विवरण लेफ्टिनेंट डैन्गरफील्ड ने बम्बई से प्रकाशित किया . इन गुफाओ के चित्रों का 1907-08 ई. में कर्नल सी.ई. ल्यूवर्ड ने निरीक्षण किया और पुनः यह चित्र संसार के समक्ष आये.

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सन 1920 में चित्रकार मुकुल डे ने इन चित्रों की प्रतिलिपिया तथा स्केच तैयार किये थे .पुनः 1921 में 'हाल्दर' व् नन्द लाल जैसे चित्रकारों ने भी प्रतिलिपियाँ तैयार की. इसके कुछ समय बाद सुरेन्द्रनाथकार , आप्टे , भौसले, जगताप आदि कलाकारों के दल ने भी इन चित्रों की प्रतिलिपियाँ बनाई . सन 1951 में इन्हें रास्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया.

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निर्माण काल -

बाघ गुफाओ के अजन्ता गुफा के संख्या 1 व् 2 के समकालीन माना जाता है. इन गुफाओ का निर्माण काल विभिन्न विद्वानों ने पाचवी शती से सातवी शती के मध्य बताया है. कई विद्वानों ने बाघ गुफा के सम्बन्ध में लेख लिखे ,इनमे डब्ल्यू इरिस्किन , ई इम्पे , कर्नल सी. डी. लुआर्ड, असित कु, हाल्दर तथा श्री मुकुल डे आदि ने बाघ गुफाओ पर लेख प्रकाशित किये .

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गुफा की बनावट –

पहली गुफा 'गृह गुफा' कहलाती है। दूसरी गुफा 'पांडव गुफा' के नाम से प्रख्यात है। यह बाकी सब गुफाओं से अधिक बड़ी और अधिक सुरक्षित प्रतीत होती है। तीसरी गुफा का नाम 'हाथीखाना' है। इसमें बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए कोठरियाँ बनी हुई हैं। चौथी गुफा को 'रंगमहल' कहा जाता है। पाँचवी गुफा बौद्ध भिक्षुओं के एक स्थान पर बैठकर प्रवचन सुनने के लिए बनाई गई थी। पाँचवी और छठी गुफा आपस में मिली हुई हैं तथा इनके बीच का सभा मंडप 46 फुट वर्गाकार है।

सातवीं, आठवीं और नौवीं गुफाओं की हालत ठीक नहीं है और वे अवशेष मात्र ही नजर आती हैं। इन गुफाओं की एक विशेषता यह भी है कि इनके अंदर जाकर इतनी ठंडक का अहसास होता है जैसे आप किसी एयरकंडीशन कक्ष में आ गए हों। गुफाओं के अंदर कई जगह से पहाड़ों से प्राकृतिक तरीके से पानी भी रिसकर आता रहता है। ये गुफाएँ कई शताब्दी पुरानी हैं।

लेकिन इनका काल निर्धारण आज भी नहीं हो पाया है। इतिहासविद इन्हें अजंता से पुराना तो नहीं मानते लेकिन यह जरूर मानते हैं कि यहाँ के भित्ति चित्रों में अंकित मनुष्यों की वेश-भूषा व अलंकार आदि से इनका समय वही निश्चित होता है जो अजंता की पहली और दूसरी गुफाओं का है। विख्यात इतिहासविद और पुराविद श्री कुमार स्वामी ने इन्हें पाँचवी शताब्दी का माना है।

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गुफा चित्र संख्या व् इनके नाम-

बाघ में गुफाओ की संख्या 9 है किन्तु 7 गुफाओ के चित्र पूर्ण रूप से नष्ट हो चुके है. गुफा संख्या 4 व् 5 में ही कुछ चित्र शेष है पर वे भी क्षत-विक्षत अवस्था में है

पहली गुफा का नाम 'गृह' दूसरी का 'पंच पांडु' तीसरी का 'हाथीखाना' चौथी का 'रंगमहल' पाचवी का 'पाठशाला' छठी , सातवी , आठवी व् नवी गुफाओ मार्ग अवरुद्ध होने से इनका कोई नाम नही रखा जा सका .

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गुफ़ाओं का विवरण

बाघ की गुफ़ा संख्या 1 से 9 तक में कक्ष, स्तम्भ, लम्बे बरामदे, कोठरियाँ, शैलकृत स्तूप, बुद्धप्रतिमा, बोधिसत्व, अवलोकितेंर मैत्रेय, नदी देवियों आदि का अंकन है। बाघ की गुफ़ा संख्या 2, 3, 4, 5, एवं 7 में भित्तिचित्र हैं, गुफ़ा में 6 दृश्यों का अंकन है। बाघ गुफ़ाओं के चित्रों की शैली अजंता के समान है तथा ये अजंता के समकालीन है। बाघ गुफ़ाओं के भित्तिचित्रों में फूल, पक्षी व पशुओं का चित्रण विशेष महत्त्वपूर्ण है। बाघ गुफ़ाओं के अलंकरण अजंता जैसे नहीं हैं किंतु यहाँ कमल की झुरमुट वासली बेल में वहाँ से अधिक प्रवाह हैं। ये भित्तिचित्र अजंता के समान चूने की गच (पलस्तर) पर बने थे। वर्तमान में बाघ गुफ़ाओं के समस्त भित्तिचित्र नष्ट हो चुके है। ये चित्र गुप्तकालीन 5-6 वी शती ई. के है। सन् 1921 में तत्कालीन ग्वालियर राज्य के पुरातत्त्व विभाग द्वाराप्रतिष्ठित कलाकारों श्री ए.के. हालदार, नंदलाल बोस आदि के द्वारा ग्वालियर स्टेट के संरक्षण में इनके चित्रों की अनुकृतियॉ कैनवास पर तैयार की गई थीं। सन् 1927 में इंडिया सोसाइटी ने इनका मोनोग्राम प्रकाशित किया था। वर्ष 1938 में एस.कचडोयिन द्वारा भी केनवास पर बाघ पेंटिग बनायी गई। इन्हीं आकृतियों को इस वीथी में प्रदर्शित किया गया है।

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गुफ़ा संख्या 2 का सर्व प्रसिद्ध चित्र पद्मपाणि बुद्ध का है। इस चित्र में मुखाकृति सौम्य है तथा आभूषण व पुष्पों से शरीर के भाग संसज्जित है। अर्ध निर्मीलित पलकों ने मुख की सौम्यता को द्विगुणित कर दिया है। श्नृत्य एवं संगीत दृश्यबाघ की गुफ़ा संख्या 4 जो रंगमहल नाम से विख्यात है, की प्रतिकृति है। इसमें सुंदर अल्प वस्त्र धारण किए नर्तकियों को घेरा बनाकर नृत्य करते हुए अंकित किया गया है। इन युवितयों के केशविन्यास तथा रंग बिरंगे वस्त्र लम्बी बाँहों तथा फूलकढ़ी कमीजों को स्पष्टता से उकेरा गया है। ये युवतियाँ विभिन्न वाद्य यंत्र लिए हुए नृत्य कर रही हैं। इनमें एक मृदंगा बजा रही है तथा तीन युवतियों हाथ में छोटे-छोटे डंडे लेकर नृत्य कर रही हैं तथा शेष तीन कांस्य थाल बजा रही हैं। इस दृश्य का समग्र प्रभाव अत्यंत ह्यदयग्राही है। नवयुवतियों के वस्त्र, केश विन्यास, वाद्य यंत्र तत्कालीन वैभव के प्रतीक हैं।

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गुफ़ा संख्या 4 में अंकित राजकुमार का चल समारोह दृश्य तत्कालीन ऐश्वर्य का सुदंरतम उदाहरण है। इस दृश्य में राजकुमार हाथी पर सवार है तथा 6 हाथियों एवं 3 घोड़ों एवं समारोह में चल रहे विभिन्न व्यक्तियों को बारीकी से उकेरा गया है। दृश्य के पीछे चैत्यगृह का अंकन भी हुआ है। गुफ़ा संख्या 4 में ही एक समूह चित्रण में मात्र एक महिला को हाथ में वीणा लिए अंकन शेष है। वीणा को देखकर सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि इस समूह के अन्य सदस्यों के हाथ में भी विभिन्न वाद्य रहे होंगे। गुफ़ा संख्या 2 के चित्रों में बुद्ध धर्मचक्र प्रवर्तक मुद्रा में, उपदेश देते बुद्ध एवं बोधिसत्व के प्रभामण्डल सहित हैं। गुफ़ा संख्या 4 अन्य चित्रों की अनुकृतियों में आकाश में संगीत, दृश्य, हाथी एवं घोड़ों के चित्र, संगीत दृश्य तथा लता वल्लरी व रेखाचित्रों को प्रदर्शित किया गया है।

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