त्रिउंड ट्रेक: कठिन भी नहीं आसान भी नहीं, इस सफर में मिले कई अनुभव

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Photo of त्रिउंड ट्रेक: कठिन भी नहीं आसान भी नहीं, इस सफर में मिले कई अनुभव by Rishabh Dev

पहाड़ों में अब इतना घूम लिया है कि हर जगह अपनी-सी लगती है। किसी नई जगह पर कुछ दिन के लिए रूकता हूँ तो वहाँ की गलियाँ, दुकानें और होटल याद हो जाते है। ये यात्रा का एक सर्किल ही है। इन्हीं पहाड़ों में घूमते-घूमते रोमांच जैसा कुछ हो जाता है। आप ऐसी जगह पर पहुँच जाते हैं, जहां सड़कें और क्रंकीट की इमारतें नहीं बल्कि प्रकृति की सुंदर छंटा देखने को मिलती है। ऐसी जगहों पर पहुँचना आसान नहीं होता है लेकिन कहते हैं ना कि सबसे सुंदर नज़ारों के लिए सबसे दुर्गम यात्रा करनी पड़ती है। हिमाचल प्रदेश के मैक्लॉडगंज में मैंने ऐसी ही एक दुर्गम यात्रा की।

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हिमाचल प्रदेश का मैक्लॉडगंज हर श्रेणी के यात्रियों के बीच मशहूर है। मैक्लॉडगंज से ही 9 किमी. का एक मदहोश करने वाला ट्रेक शुरू होता है। मैक्लॉडगंज समुद्र तल से 2,082 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और त्रिउंड की ऊँचाई 2850 मीटर है। त्रिउंड ट्रेक को दो जगहों से किया जा सकता है, पहला भागसू नाग झरने की तरफ़ से और दूसरा रास्ता धर्मकोट से जाता है। आपको ज़्यादा भीड़ भागसू नाग वाटरफॉल की तरफ़ से ही मिलेगी। हमने भी इसी तरफ़ से इस ट्रेक को करने का तय किया।

मैक्लॉडगंज

मैं मैक्लॉडगंज में एक हॉस्टल में ठहरा हुआ था। सुबह उठा तो देखा कि हल्की-हल्की बारिश हो रही था, लगा कि अब ट्रेक नहीं हो पा गया। जब तक मैं तैयार हुआ, तब तक बारिश ने हमारा रास्ता साफ़ कर दिया था। नाश्ता करने के बाद हम हॉस्टल से भागसू की तरफ़ निकल पड़े। हमारा प्लान ऐसा था कि त्रिउंड ट्रेक करेंगे और रात में वहीं टेंट में रूकेंगे। अगले दिन सूर्योदय देखने के बाद वापस लौट आएँगे। हमारी एक व्यक्ति से बात भी हो गई, जो 800 रुपए में हमें बेस कैंप पर टेंट की सुविधा दे रहा था। जिसमें एक रात का खाना और अगले दिन का नाश्ता भी शामिल था। हमने बात पक्की कर ली।

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मैक्लॉडगंज से भागसू वाटरफॉल 2 किमी. की दूरी पर है। हमने ट्रेक करने के लिए किराए पर लकड़ी की लाठी ले ली। ट्रेक के दौरान लाठी को हमारा तीसरा पैर माना जाता है। चलते-चलते हम भागसू के पास पहुँच गए। भागसू वाटरफॉल से पहले ही एक रास्ता ऊपर की तरफ़ जाता है। उस रास्ते पर चलते हुए हम शिव कैफ़े के पास पहुँचे। यहाँ पर भी झरने जैसा कुछ बना हुआ था। हम कुछ देर यहाँ रूके और फिर आगे बढ़ गए। जो मैक्लॉडगंज आता है वो त्रिउंड ट्रेक ज़रूर करता है। वीकेंड होने की वजह से लोगों की काफ़ी भीड़ थी।

हाफ़ प्वाइंट

हम जंगल में घुमावदार रास्ते पर चलते जा रहे थे। थोड़ी देर बाद भीड़ तितर-बितर हो गई। कुछ लोग आगे निकल गए और कुछ लोग पीछे रह गए। मौसम बढ़िया था, धूप बिल्कुल भी नहीं थी लेकिन उमस काफ़ी थी। उमस से दो चार होते हुए हम बढ़ते जा रहे थे। थकावट होने पर थोड़ी देर के लिए रूक जाते लेकिन इस ट्रेक में अभी तक थकावट जैसा कुछ नहीं था। काफ़ी देर बाद हम जंगल से निकलकर खुली जगह पर आ गए। यहाँ पर एक मैगी प्वाइंट पर रूककर हमने नींबू पानी पिया और फिर आगे बढ़ चले।

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अभी तक हम जंगलों के बीच चल रहे थे लेकिन अब रास्ता एकदम खुला था। यहाँ से हमें वो कठिन रास्ता भी दिखाई दे रहा था जिसको तय करना था और मैक्लॉडगंज भी दिखाई दे रहा था। कुछ देर बाद हम ट्रेक के हाफ़ प्वाइंट पर पहुँच गए। यहाँ पर कई सारी दुकानें और यहाँ से भी अच्छा नजारा दिखाई देता है। यहाँ पर एक जगह लिखा था, चला जा बस थोड़ा बाक़ी है। कुछ देर हाफ़ प्वाइंट पर रूकने के बाद हम आगे बढ़ चले। हम हौले-हौले बढ़ते जा रहे थे। काफ़ी लंबा और कठिन सफ़र तय करने के बाद हम ऐसी जगह पर पहुँचे, जहां से दूर-दूर तक हरियाली और बर्फ़ से ढँके पहाड़ दिखाई दे रहे थे। इस सफ़र में पहली बार इतना खूबसूरत नजारा देखने को मिला। कुछ देर मैं इस नज़ारे को देखने के लिए ठहरा रहा।

त्रिउंड बेस कैंप

ट्रेक करने के दौरान हमें लगता है कि हम बहुत चल गए हैं लेकिन ऐसा होता नहीं है। बाद में पता चलता है कि हम अभी तो थोड़ा ही चले हैं। इसलिए ट्रेक के दौरान गाइड में मोटिवेशन देने के लिए बोलते हैं कि चलते रहो, बस थोड़ा बाक़ी है। वो थोड़ा बाक़ी काफ़ी होता है। हम एक पहाड़ को चढ़ रहे थे तो दूसरा पहाड़ सामने आ जा रहा था। ट्रेक के दौरान शरीर से ज़्यादा दिमाग़ पर ज़ोर पड़ता है। अगर आप हिम्मत हार जाएँगे तो शरीर भी आपका साथ नहीं देता है और अगर आप हिम्मत नहीं हारते हैं तो ट्रेक कितना भी कठिन हो, आप उसे आख़िरकार कर ही लेंगे।

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लगभग 4-5 घंटे के सफ़र के बाद हम आख़िरकार त्रिउंड बेस कैंप पहुँच गए। यहाँ पर कुछ कंपनियों के कच्चे घर जैसे बने हुए थे और एक खाने की दुकान थी, जिससे कुछ ख़रीदा जा सकता है। हमने अपने टेंट वाले को खोजा और घास पर एक जगह टेंट लगवा लिया। ट्रेक के दौरान या ऐसी जगहों पर सब कुछ थोड़ा महँगा मिलता है। यहाँ पर पानी भी महँगा था। भूख तो लगी ही थी इसलिए पहले मैगी और फिर पराँठा खाया। यहाँ से बर्फ़ से ढँका जो नजारा दिखाई दे रहा था, वो वाक़ई में बयां करना मुश्किल है। घास के मैदान में बहुत सारी पहाड़ी भेडें भी थीं, जो अपनी भूख मिटा रहीं थीं। हमने एक जगह पर बैठकर सूर्यास्त का सुंदर नज़ारा देखा। रात को खाना खाने के बाद टेंट में गए और कुछ ही देर में नींद आ गई।

त्रिउंड पीक

अगले दिन सुबह-सुबह नींद खुली तो देखा कि सूर्योदय होने में काफ़ी वक़्त है। मैंने जल्दी से जूते बांधे और लाठी लेकर त्रिउंड पीक की तरफ़ निकल पड़ा। मैंने देखा कि ज़्यादातर लोग बेस कैंप पर ही रूके हुए थे। मेरा तो ऐसा था कि अब जब यहाँ तक आ गया हूँ तो त्रिउंड पीक तक ज़रूर आऊँगा। मैं अपने तेज़ कदमों से आगे बढ़ने लगा कि लेकिन थोड़ी की चढ़ाई में थकावट होने लगी। मुझे मैक्लॉडगंज से बेस कैंप तक जितनी थकान नहीं हो रही थी, उससे ज़्यादा थकान यहाँ चलने पर हो रही थी।

त्रिउंड पीक।

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मैं बस सूर्योदय से पहले पीक तक पहुँचना चाहता था। धीरे-धीरे बढ़ते हुए एक पहाड़ को चढ़ गया। पहाड़ चढ़ने के बाद पता चला कि एक लंबा रास्ता है जिसको अभी तय करना है। अच्छी बात ये थी कि ये रास्ता सीधा था, कोई चढ़ाई नहीं थी। त्रिउंड पीक के नीचे कम से कम 50 टेंट लगे हुए थे उसमें लोग रूके हुए थे। हो सकता है कि धर्मकोट से जो लोग आए होंगे, वो यहाँ रूकें हैं। मैं सूर्योदय से पहले त्रिउंड पीक पर पहुँच गया। यहाँ पर भगवान शिव का एक छोटा-सा मंदिर जैसा बना हुआ है। जिसमें भगवान शिव की मूर्ति और शिवलिंग रखी हुई है। पीक पर ही एक बड़ा-सा घर जैसा कुछ बना हुआ है, जिसके चारों तरफ़ बाड़ लगी हुई है। मैक्लॉडगंज से इतनी ऊँचाई पर आने के बाद भी मोबाइल में नेटवर्क आ रहे थे। यहाँ पर बैठकर मैंने सूर्योदय देखा। इसके बाद वापसी का सफ़र शुरू किया।

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सूर्योदय को देखने के बाद कुछ देर बाद त्रिउंड बेस कैंप पहुँच गया। टेंट से अपना पूरा सामान समेटा और फिर नाश्ता किया। इसके बाद नीचे उतरने का रास्ता शुरू हो गया। धीरे-धीरे चलते हुए हम पहले हाफ़ प्वाइंट पर आए। लगभग 3-4 घंटे के बाद हम जब मैक्लॉडगंज पहुँचे तो हमारे पैरों की बैंड बज चुकी थी। हॉस्टल पहुँचने के बाद हमने पूरा दिन आराम किया। मैक्लॉडगंज का त्रिउंड ट्रेक इस तरह पूरा हुआ। इस खूबसूरत सफ़र की यादें ताउम्र रहेंगी।

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