याना रॉक्स: वह स्थान जहां भस्मासुर जलकर हुआ था भस्म

Tripoto
7th Oct 2023
Photo of याना रॉक्स: वह स्थान जहां भस्मासुर जलकर हुआ था भस्म by रोशन सास्तिक

तथास्तु। आज हम आपको जिस जगह लेकर जा रहे हैं, वो इसी एक शब्द की शक्ति के चलते अस्तित्व में आया था। जी हां, भगवान भोलेनाथ के मुख से राक्षस भस्मासुर के लिए निकले 'तथास्तु' शब्द की शक्ति के फलस्वरूप ही आज याना रॉक्स जैसी जगह इस धरती पर अपना वजूद रखती है। भारत के दक्षिणी राज्य कर्नाटक के उत्तरी कन्नड़ जिले में पसरे पश्चिमी घाट के बेहद घने जंगलों के बीच स्थित याना गांव में ही मौजूद है याना रॉक्स। कर्नाटक के ही एक और जग प्रसिद्ध टुरिस्ट प्लेस गोकर्ण से महज 50 किमी की दूरी पर स्थित याना रॉक्स एक ऐसी जगह है जो हर एडवेंचर प्रेमी को अपनी और आकर्षित करने का काम करती है। 

आपको बता दें कि कन्नड़ भाषा में एक कहावत है- सोक्कु इद्दरे याना, रोक्का इद्दरे गोकर्ण। इसका हिंदी में भावार्थ कुछ ऐसा हुआ कि यदि आपके पास खर्च करने के लिए बहुत पैसा है, तो गोकर्ण जाएं। और यदि आप अत्यधिक उत्साहित महसूस कर रहे हैं, तो याना जाएं। एक मिनट रुकिए... कहीं आपके दिमाग की सुई अब तक उसी बात पर तो नहीं अटकी हुई है कि शुरू में जिस तथास्तु शब्द से याना रॉक्स के अस्तित्व की कहानी के जुड़ाव का जिक्र किया गया था, आखिर उसका क्या हुआ? अगर ऐसा है तो फिर चलिए हम याना रॉक्स के बारे में बाकी चीजें जानने से पहले यही जान लेते हैं कि आखिरी इस अजीबोगरीब चट्टान का जन्म कैसे हुआ।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भस्मासुर नामक एक राक्षस ने भगवान शिव की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न कर दिया। और फिर बदले में उनसे एक ऐसा वारदान मांगा जिसके जरिए वो जिस किसी के सिर पर अपना हाथ रख दे, वो वहीं जलकर भस्म हो जाए। भगवान भोलेनाथ ने अपने स्वभाव के अनुरूप बिना ज्यादा कुछ सोचे 'तथास्तु' बोल भी दिया। फिर क्या था, वरदान पाकर भस्मासुर का दिमाग खराब हो गया और उसने भगवान शिव जी द्वारा दिए गए वरदान की शक्तियों को उनपर ही आजमाने की ठान ली। और वह दौड़ पड़ा शिव जी के सिर पर हाथ रखकर उन्हें भस्म करने के लिए। इस बात से शिव जी घबराकर तुरंत ही वहां से भाग खड़े हुए। उनके पीछे-पीछे भस्मासुर भी दौड़ने लग गया। इस भाग-दौड़ के दौरान ही शिव जी ने भगवान विष्णु से मदद मांगी और खुद याना गांव के जंगलों में आकर छिप गए।

भगवान विष्णु ने शिव जी को भस्मासुर से बचाने के लिए एक बहुत बढ़िया युक्ति लगाई और वह मोहिनी के रूप में भस्मासुर के सामने प्रकट हो गए। मोहिनी पर मोहित होकर भस्मासुर सब कुछ भूलकर अपनी शादी की बात करने लग गया। मोहिनी रूप में विष्णु जी ने विवाह के लिए उन्हें नृत्य में हराने की शर्त रख दी। जिसे बिना कुछ सोचे समझे भस्मासुर ने स्वीकार भी कर लिया। मोहिनी जैसे-जैसे नृत्य करती थी ठीक वैसे-वैसे ही भस्मासुर भी करता गया। और इसी बीच मोहिनी ने चालाकी से एक स्टेप में आपका एक हाथ अपने सिर पर रख दिया। मोहिनी के सम्मोहन में खोए भस्मासुर ने भी ठीक यही किया और फिर वह अपने वरदान के चलते अपने ही हाथों जलकर भस्म हो गया। और भस्मासुर के भस्म होने से याना गांव परिसर में इतना ज्यादा राख फैला कि यहां पर मौजूद सभी चूना पत्थर की चट्टानों का रंग काला पड़ गया।

याना गांव के जंगलों में करीब 3 किमी इलाके में 60 लाइम स्टोन की चट्टानें हैं और सबका ही रंग एकदम किसी कालिख़ की तरह काला है। इनपर चढ़ी काले रंग की परत को लोग भस्मासुर के भस्म का ही हिस्सा मानते हैं, इसलिए लोगों द्वारा इसे हाथ नहीं लगाए जाने की भी बात कही जाती है। वैसे इन 60 चट्टानों में से सबसे प्रसिद्ध और पर्यटकों को लुभाने का काम मुख्यतः दो चट्टानें ही करती हैं। पहला भैरवेश्वर शिखर और दूसरी मोहिनी शिखर। जैसा कि नाम और कहानी से ही समझ आ जाता है कि भैरवेश्वर शिखर का नामकरण भस्मासुर के नाम से हुआ। और मोहिनी शिखर का नाम भगवान विष्णु के मोहिनी रूप के चलते रखा गया। एक-दूसरे के ही समीप मौजूद भैरवेश्वर शिखर की ऊंचाई जहां 120 मीटर है, वहीं मोहिनी शिखर 90 मीटर तक ऊंचा है।

भैरवेश्वर शिखर से जुड़ी एक और बात ऐसी है जो इसे और ज्यादा खास बना देती है। दरअसल मान्यता यह है कि भस्मासुर से बचने के लिए भगवान शिव जी इस चट्टान के अंदर मौजूद गुफा में आकर ही छिप गए थे। इसलिए गुफा के अंदर ही भगवान शिव जी का स्वयंभू शिवलिंग भी मौजूद है। चट्टान से रिसते पानी के जरिए  प्राकृतिक रूप से शिवलिंग पर जलाभिषेक की क्रिया लगातार जारी रहती है। इस अलौकिक नजारे के दर्शन तो पहले सिर्फ याना गांव और आसपास के ग्रामीण लोगों को ही नसीब होते थे। लेकिन सोशल मीडिया के चलते अब दूर-दूर से लोग भगवान शिव के इस स्वरूप के दर्शन करने आने लगे हैं। यहां स्थानीय लोग गुफा में मौजूद इस शिवलिंग को गंगा उद्भव कहते हैं। वैसे गुफा में आप देवी दुर्गा के चंडिका अवतार की मूर्ति भी देख सकते हैं।

यहां आने के लिए आप यातायात के किसी भी साधन का इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर आप हवाई यात्रा के जरिए जल्द से जल्द याना रॉक्स तक पहुंचना चाहते हैं तो आपको अपने शहर से हुबली हवाई अड्डे तक के लिए फ्लाइट पकडनी होगी। इसके बाद आप यहां से बस के जरिए करीब 135 किमी सफर तय कर याना गांव पहुंच जाओगे। कोई अगर ट्रेन से सफर करने की सोच रहा है तो उसके पास 2 ऑप्शन उपलब्ध होंगे। पहला और बेहतर विकल्प तो यह होगा कि वो अपने शहर से कुमटा रेलवे स्टेशन तक की टिकट करवा ले।

दूसरा और आखिरी विकल्प यह कि अगर आपके रूट में कुमटा न आता हो तो आप हुबली रेलवे स्टेशन तक की यात्रा कर सकते हैं। दोनों में फर्क इतना है कि हुबली रेलवे स्टेशन से आपको याना गांव तक पहुंचने के लिए 140 किमी की लंबी यात्रा करनी पड़ेगी। और वहीं कुमटा रेलवे स्टेशन से यह यात्रा सिमटकर महज 30 किमी की ही रह जाती है। बाकी सड़क मार्ग के जरिए जाने की योजना बना रहे लोगों को अपने शहर से पहले गोकर्णा आना होगा और यहां से याना गांव तक जाने के लिए 50 किमी का सफर करना होगा।

इस तरह जब आप याना गांव तक पहुंच जाएंगे तब अपनी आंखों से देखने के बाद आपको एहसास होगा कि यहां सिर्फ याना रॉक्स ही नहीं है देखने के लिए। कर्नाटक के सबसे स्वच्छ और भारत के दूसरे सबसे स्वच्छ गांव याना का मौसम इतना ज्यादा नम है कि हरियाली के मामले में दुनियाभर में इस गांव का नाम टॉप लिस्ट में शामिल है। इसलिए याना गांव से याना रॉक्स तक घने जंगलों से गुजरते वक्त ठंडक से भर देने वाले माहौल में करीब घंटे भर का ट्रेक आपको थकाऊ की बजाय बहुत ज्यादा खुशनुमा लगता है। और आप बस यहां-वहां हरे-भरे नजारे देखते, पंक्षियों की मीठी-मीठी आवाज सुनते हुए याना रॉक्स तक कब पहुंच जाते हैं आपको पता ही नहीं चलता है। यहां पहुंचकर आपको समझ आता है कि चुना पत्थर की चट्टानों के चेहरे पर कालिख को देखकर ही लोगों ने याना रॉक्स का संबंध भस्मासुर के भस्म होने वाली कहानी से जोड़ा होगा।

याना रॉक्स की काली गुफाओं में आप प्रकृति की बेजोड़ खूबसूरती को आंखों में कैद करने और उसकी अति प्राचीनता पर दिमाग से प्रश्न करने के साथ ही यहां पर मौजूद स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन कर उपर्युक्त बातों के मोह से मुक्त होकर मन की गहराइयों में डूबने जैसा आध्यात्मिक काम भी कर सकते हैं। यहां सुकून के कुछ पल बिताने के बाद अगर आपका मन सफर में थोड़े से एडवेंचर को और एड करने का करे तो फिर बिना देर किए आप याना गुफा से महज 10 किमी की दूरी पर स्थिति विभूति वाटरफॉल जा सकते हैं। एक कच्ची सड़क के जरिए यहां पहुंचने पर आपको करीब 30 फीट के ऊंचाई से 4 स्टेप्स में एक झरना दिखाई देगा। झरने से बहता दूध सा सफेद अपनी एक जगह इकट्ठा हरे जंगल के बीच नीले रंग का प्राकृतिक कुंड का निर्माण करता है। इसके ठंडे पानी में स्नान करने से आपके तन और मन दोनों की ही थकान गायब हो जाएगी।

अब सवाल अगर यह हो कि आपको किस मौसम में यहां आना चाहिए, तो फिर इसका कोई एक जवाब नहीं हो सकता। क्योंकि इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि आपको याना रॉक्स को किस रंग में देखना है। क्योंकि मौसम के मिजाज के अनुसार ही याना रॉक्स और इसके आसपास मौजूद परिसर की प्रकृति भी बदल जाती है। यदि आपको बहुत ज्यादा ही एडवेंचरस ट्रिप करनी है तो फिर आप मॉनसून के मौसम में यहां आ सकते हैं। आसमान से बरसते पानी से भीग जाने के बाद याना रॉक्स की खूबसूरती के साथ ही इसकी भयावहता भी बढ़ जाती है। साथ ही आसमान से होती बेहिसाब बारिश के चलते जंगल के जरिए याना रॉक्स तक पहुंचने का रास्ता भी बेहद दुर्गम और जोखिम भरा हो जाता है। लेकिन कहते है ना कि मुश्किल जितनी ज्यादा होती है मजा भी उतना ही ज्यादा आता है।

अगर आपको एडवेंचर तो करना है लेकिन उसके लिए जान जोख़िम में डालने जितना लेवल नहीं क्रॉस करना तो फिर अक्टूबर से फरवरी के इन चार महीनों में आप यहां अपने परिवार तक के साथ भी आ सकते हो। क्योंकि तब बरसात के हाल में ही अलविदा कहने के चलते हरियाली भरपूर होती है और साथ ही हद से ज्यादा बारिश से जंगल के किसी हिस्से में फंस जाने की आशंका भी कोसों दूर होती है। बाकी अगर आपका मन गर्मियों की छुट्टियों में आने का हो तो भी किसी तरह का संकोच नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि समुद्र किनारे से थोड़ा सटा होने के चलते यहां उमस तो होती है लेकिन जंगल इतना घना है कि आपके शरीर को गर्मी में भी ठंडी का एहसास यहां की बहती हवाएं कराती रहेंगी। कुल मिलाकर मौसम कौन सा भी हो कोई फर्क नहीं पड़ता। मायने तो बस यह रखता है कि यहां आने का आपका मन कब है।

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