जोधपुर यात्रा.... भाग 1..

Tripoto

राजस्थान: नाम सुनते ही मन में आते हैं - अपना मस्तक तानकर खड़े हुए किले और महल, राजपूताना ठाठ बाठ, मस्तानी चाल में चलते ऊँट, रंगीले कपडे व पगड़ियां, तरह तरह के तीखे व मीठे व्यंजन और आपकी आव भगत के लिए तैयार लोग।

मेरे बचपन का एक बड़ा हिस्सा राजस्थान में बीता है। इसलिए मैं यहाँ की संस्कृति और खानपान से अच्छी तरह परिचित हूँ। लेकिन मेरी better half को राजस्थान जाने का अवसर कभी नहीं मिला था। इसलिए राजस्थान हमारी भ्रमण लिस्ट में सबसे ऊपर था।

कई दफा बनने बिगड़ने के बाद आखिर हमारी राजस्थान यात्रा का प्रोग्राम फाइनल हुआ। अक्टूबर का महीना था और हमने जोधपुर घूमने का प्रोग्राम बनाया। बेटे ने स्कूल जाना शुरू नहीं किया था इसलिए सिर्फ मुझे ही छुट्टियां लेनी थीं। अक्टूबर में राजस्थान का मौसम ठीक ठाक रहता है। न तो ज्यादा गर्मी होती है और न ही ज्यादा सर्दी। टूरिस्ट सीजन भी लगभग शुरू ही हुआ होता है इसलिए होटल, ट्रेन इत्यादि में बुकिंग की भी कोई मारामारी नहीं रहती। मैंने मंडोर एक्सप्रेस में 3rd AC में 2 सीटें दोनों तरफ की बुक करा लीं। मंडोर एक्सप्रेस रात 9:15 पर पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से चलती है और अलवर, जयपुर तथा मकराना होते हुए लगभग 625 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर सुबह 8 बजे जोधपुर पहुँच जाती है। दिल्ली से जोधपुर जाने के लिए यह सबसे convenient ट्रैन है।

तय तारीख को हम लोग शाम 8 बजे घर से निकले। ट्रेन देर से थी तो खाना घर से खा कर ही चले थे। घर से स्टेशन पहुँचने में 40 मिनट लगे। लेकिन पुरानी दिल्ली पर देर शाम को बहुत भीड़ हो जाती है। इसलिए स्टेशन के गेट से प्लेटफार्म पहुँचने में 15 मिनट लग गए। प्लेटफार्म पर पहुंचे तो ट्रेन धीरे धीरे सरकते हुए प्लेटफार्म पर लगायी जा रही थी। बेटे की यह पहली ट्रेन यात्रा थी। वो कभी ट्रेन को देखता और कभी स्टेशन की भीड़ को। हम अपने कोच में पहुंचे। सीट ढूंढ कर सामान रखा। हमारी साइड लोअर और साइड अपर सीट्स थीं। बैग को सीट के नीचे व्यवस्थित किया और प्लेटफॉर्म पर जा कर पानी की बोतल ले आया। अब ट्रेन के चलने का ही इंतजार था। बेटा खिड़की से बाहर देखता हुआ अपने सवालों की बौछार कर रहा था। "ट्रेन वापस कैसे मुड़ेगी?" "वो दूसरी ट्रेन कहाँ जा रही है?" "हम ऊपर वाली सीट पर कैसे जायेंगे?"

थोड़ी ही देर में ट्रेन सरकने लगी। देखते देखते स्टेशन पीछे छूट गया। कोच के कुछ यात्री खाना पीना करने लगे और कुछ लोग बिस्तर लगा सोने की तैयारी में थे। हमें साइड सीट्स का यही फायदा था कि जब तक चाहते सीट पर बैठ सकते थे। इन्ही सब में दिल्ली कैंट आ गया। यहाँ से भी काफी लोग ट्रेन में चढ़े। दिल्ली कैंट से चले तो टी टी जी आ गए। टिकट चेक करने के बाद हमने भी बिस्तर लगाया और बेटे को ऊपर की सीट पर लिटा दिया। भाई साहब चलती ट्रेन में आराम से झूला झूलते रहे। 10:30 तक कोच के अधिकतर लोग सो गए थे और लाइट भी बंद होने लगीं थीं। हम भी सो गए।

सुबह सुबह "चाय-चाय" की आवाज से आँख खुली। समय देखा तो सिर्फ 6 ही बजे थे। एक बार और सोने की कोशिश की परन्तु डब्बे में चहल पहल शुरू हो गयी थी। अब और सोना मुश्किल ही था। बाथरूम जा कर फ्रेश हुए और चाय वाले से चाय ली। चाय बढ़िया थी। शायद दिल्ली से जितना दूर जाओ, ट्रेन की चाय उतना ही अच्छी मिलने के चांस बढ़ जाते हैं। इतनी देर में बेटा भी उठ गया। उसको बाथरूम ले गए तो हिलती ट्रेन देख वो थोड़ा घबरा गया। वापस सीट पर आकर कुछ देर तो चुप बैठा, फिर खिड़की से बाहर देखने लगा। लगभग पूरा इलाका ही सूखा था। बीच बीच में कुछ कीकर बबूल के पेड़ थे। पत्थर से बने छोटे छोटे घर थे। हमें कुछ हिरन भी दिखे। जोधपुर तक का बाकी सफर कैसे बीता पता ही नहीं चला। ट्रेन समय पर थी। जोधपुर के आउटर पर पहुंची तो सबने अपना सामान पैक करना शुरू कर दिया। ठीक 8 बजे ट्रेन प्लेटफार्म पर पहुँच गयी। ट्रेन से उतरे, स्टेशन से बाहर आये और ऑटो लिया। यहाँ के ऑटो दिल्ली के ऑटो से थोड़ा अलग हैं। चलते भी आराम से हैं और आवाज भी ज्यादा करते हैं।

जोधपुर में मेरे एक मित्र विपुल जी रहते हैं। उनसे होटल के बारे में बात हुई थी तो उन्होंने सरदारपुरा के पास ही होटल recommend किया था। बोले थे कि बिलकुल सेंट्रल में भी रहेगा, खाने पीने के लिए बहुत सी जगह हैं और उनका ऑफिस भी सरदारपुरा पुलिस स्टेशन के पास है तो अगर कोई जरूरत हुई तो वो भी नजदीक ही रहेंगे। स्टेशन से होटल पहुँचने में 10 मिनट ही लगे। जोधपुर जैसे शहर का यही फायदा है कि बहुत थोड़े से समय में एक जगह से दूसरी जगह तक पहुँच सकते हैं। होटल पहुँच चेक इन किया। हालाँकि रात भर सोये थे लेकिन चलती ट्रेन में आराम वाली नींद नहीं आती। इसलिए थोड़ी देर के लिए आराम किया। इसके बाद रूम सर्विस पर चाय और सैंडविच आर्डर किया। भूख भी लगी ही थी और बेटे को तो ज्यादा ही लगी थी। चाय पी कर तैयार होने लगे। तैयार हो होटल से बाहर आये और जोधपुर स्वीट्स पहुँच गए।

जोधपुर स्वीट्स सरदारपुरा में C रोड पर जिप्सी रेस्टोरेंट के बिलकुल पास है। इनकी मिठाइयां, नमकीन और कचौड़ियां बहुत बढ़िया हैं। हमने यहाँ एक प्याज की कचौरी, एक मिर्ची बड़ा और दो piece रबड़ी के लड्डू लिए। तीनों का नाश्ता हो गया। कुल बिल था सिर्फ 70 रुपये। यहाँ से पास ही भाटी टी स्टाल हैं। वहां पहुँच चाय पी। इलाइची अदरक की चाय पी कर मजा आ गया। इसके बाद निकल पड़े मेहरान गढ़ किले के लिए। यह किला राव जोधा ने बनवाया था। राव जोधा के नाम पर ही जोधपुर शहर का नाम पड़ा। इसके पहले मारवाड़ रियासत की राजधानी मंडोर में थी जो जोधपुर शहर के काफी पास है।

मेहरानगढ़ के किले पहुंचे। किला एक ऊंची पहाड़ी पर बना है। ऊपर से पूरे जोधपुर का बढ़िया दृश्य दिखता है। दूर तक फैला जोधपुर, किले से दिखता उम्मेद भवन, और ढेर से नीले रंग में रंगे घर। सही में ही जोधपुर के Bluecity नाम को सार्थक कर रहे थे। किले में अंदर जाने का टिकट लिया और सिक्योरिटी जांच के बाद अंदर बढ़ चले। गाइड मैं कभी लेता नहीं हूँ लेकिन यहाँ ऑडियो गाइड devices भी उपलब्ध थे। किले में चलते हुए जब पहले द्वार पर पहुंचे तो ऊंचे ऊंचे दरवाजों पर कीलें लगीं थीं। पता चला कि शत्रु सेना किले के द्वार तोड़ने के लिए हाथियों की मदद लेती थी। हाथी की टक्कर से बचने के लिए ही ये कीलें लगाई जाती थीं, ताकि हाथी जब टक्कर मारे तो कीलों से खुद ही घायल हो कर पीछे हट जाये। दरवाजे से अंदर गए तो बाएं हाथ पर सती महिलाओं के हाथों के प्रतीक चिन्ह बने थे। नमन है ऐसे वीरांगनाओं को।

इसके बाद सीढ़ियां चढ़ हम मुख्य किले में पहुँच गए। बिभिन्न कक्ष, बहुत से हथियार, पालकियां, शीश महल, भोजन कक्ष इत्यादि देखे। किले के ऊपर पुरानी तोपें भी रखीं थीं। ऊपर से जोधपुर का और भी अच्छा दृश्य दिख रहा था। दोपहर का समय था लेकिन इतनी ऊँचाई पर हवा काफी ठंडी थी इसलिए गर्मी न के बराबर थी। किले का बाकी हिस्सा देखते हुए हम माँ चामुंडा के मंदिर तक पहुँच गए। चामुंडा देवी राव जोधा की कुल देवी थीं। इसलिए राव जोधा उनकी मूर्ति मंडोर से मेहरानगढ़ ले आये थे और स्थापना कर मंदिर बनवाया था। देवी के दर्शन कर मुख्य द्वार से होते हुए हम किले के बाहर आ गए।

3. जनता स्वीट्स

यहाँ से ऑटो ले जनता स्वीट्स पहुँच गए। जनता स्वीट्स नयी सड़क पर स्थित जोधपुर की सबसे प्रसिद्द स्वीट शॉप्स में एक है। मिठाइयों के अलावा यहाँ के मिर्ची बड़े, प्याज और दाल की कचोरियां, चीकू शेक, मालपुआ इत्यादि भी बहुत लोक प्रिय हैं। हमने देखा कि दुकान वालों ने स्नैक आइटम्स, जैसे समोसे, मिर्ची बड़े, कचोरियों इत्यादि के लिए एक अलग काउंटर सड़क की तरफ भी खोला हुआ था। और बहुत से लोग बाहर सड़क की तरफ खड़े हो कर कचोरियों का आनंद ले रहे थे।

हम दुकान के अंदर पहुंचे और सभी ऑप्शंस का मुआयना किया। ढेर सी मिठाइयां, अलग अलग तरह के मिल्क शेक्स, मखनिया लस्सी, ढेर तरह की नमकीन, अलग अलग स्नैक, ढोकला इत्यादि बहुत से ऑप्शंस थे। हालाँकि सुबह एक कचौरी खा चुके थे लेकिन यहाँ की कचौरी का स्वाद लेना भी बनता था। इसलिए एक कचौरी, ढोकला और 2 चीकू शेक लिए। चीकू शेक इतना हैवी था कि मुश्किल से ही ख़त्म हुआ। लेकिन स्वाद का जवाब नहीं था। और कीमत भी वाजिब थी।

बेटे ने भी ढोकला और चीकू शेक बहुत पसंद किया। हम गए तो थे मिड डे स्नैक्स के लिए लेकिन खाना लंच से भी हैवी हो गया था। लेकिन कोई दिक्कत नहीं क्योंकि अब हमें पुराने जोधपुर के बाजार में चलना ही था।

जनता स्वीट्स में बहुत से नमकीन भी थीं लेकिन हमारा प्लान चंद्र विलास नमकीन लेने का था। चंद्र विलास नमकीन भंडार भी बिलकुल ही पास था। जनता स्वीट्स से सड़क पार कर वापस नयी सड़क चौक की तरफ जाओ तो वहीँ पर यह दुकान है। दुकान सन 1947 से अपनी स्वादिष्ट नमकीन बना रही है। दुकान में पहुंचे तो ढेर से नमकीन थे। वहां का स्टाफ पूरे आग्रह से अलग अलग नमकीन हमें टेस्ट कराने लगा। लगभग सभी नमकीनों की कीमत 200 रुपये किलो थी। हमने 3 तरह की नमकीन पसंद की और आधा आधा किलो ले ली। इनमें हींग सेव, लहसुनिया सेव व एक मिक्सचर था।

5. नेशनल हैंडलूम, नयी सड़क

यहाँ से हम वापस नयी सड़क की तरफ चल पड़े। अगला काम शॉपिंग का था। जोधपुर अपने बंधेज के कपड़ों, लहरिया की सदियों और राजस्थानी कारीगरी के लिए जाना ही जाता है। 1-2 दुकानों में घूम आगे चले तो नेशनल हैंडलूम के 2 शोरूम थे। पहले एक शोरूम में गए। देखा तो यहाँ चाइना की अनेकों वस्तुओं का भण्डार ही भरा था। खिलोने, प्लास्टिक क्राकरी, किचन वेयर, और भी बहुत कुछ। पर यहाँ हमारा क्या काम। ये स्टोर छोड़ अगले शोरूम में गए। यहाँ असली राजस्थानी वस्तुएं थी। लाख की चूड़ियां, राजस्थान की सजावटी चीजें, बंधेज के कपडे, साड़ियां और भी बहुत कुछ। कीमत थोड़ी सी ज्यादा थी लेकिन मोल भाव नहीं था। मुझे तो ऐसी दुकान से सामान लेना ही सही लगता लेकिन श्रीमती जी को मोल भाव के बिना शॉपिंग कैसे पसंद आती। फिर भी एक सूट और कुछ और सामान ले ही लिया गया। बिल देने के लिए क्रेडिट कार्ड की सुविधा भी उपलब्ध थी। बिल दे बाहर आये और नयी सड़क की मार्किट घुमते हुए घंटाघर की तरफ चलते रहे।

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