मानसून में उत्तराखंड यात्रा... भाग 3....

Tripoto

अब तक आपने पढ़ा कि पिछले दो दिनों में देहरादून के अधिकतर टूरिस्ट स्पॉट देख लिए गए, मशहूर व्यंजन भी चख लिए गए और थोड़ी बहुत खरीदारी भी हो गयी थी । पहाड़ों पर वर्षा ऋतु भी थोड़ा पहले आ जाती है इसलिए दोनों दिन मौसम सुहाना रहा।

अगले दिन सो कर उठे तो तेज बारिश हो रही थी। एक बार तो लगा कि आज का दिन बेकार हो जायेगा। सब तैयार हुए, नाश्ता हुआ और पैकिंग कर चेकआउट की तैयारी भी हो गयी। 9 बजे होटल से बाहर निकले, गाड़ी में सामान रखा और चलने के लिए तैयार हुए। आज के प्रोग्राम में देहरादून का वन अनुसन्धान संस्थान (FRI) देखना और वापस दिल्ली जाना था। गाड़ी घुमा ली FRI की तरफ, रास्ता वही बल्लीवाला चौक और बल्लूपुर होते हुए था। FRI देहरादून से विकास नगर जाने वाली सड़क पर स्थित है। यह संस्थान भारत के प्रमुख वन अनुसंधान संस्थानों में से एक है। पूरा कैंपस लगभग 450 हेक्टेयर में फैला हुआ है और घने वृक्षों तथा विशाल मैदानों से भरा है। अंदर जाने का टिकट 25 रुपये प्रति व्यक्ति और 10 रुपये प्रति वाहन था। शायद दोनों बच्चों का टिकट नहीं लगा या बेटे का आधा लगा, अब याद नहीं। लेकिन हम दोनों और गाड़ी का कुल 60 रुपये जरूर लगा। गेट से सीधा काफी दूर अंदर जा कर विभिन्न संग्रहालय थे। बारिश होने के बावजूद काफी भीड़ थी। पूरे कैम्पस में ढेर सारे आम के पेड़ थे जो फलों से लदे हुए थे। हमने एक एक कर कुछ संग्रहालय देखे। अधिकतर का कोई अतिरिक्त चार्ज नहीं था लेकिन कुछ एक के लिए अलग टिकट लेना पड़ा। वहां विभिन्न पौधे दर्शाये गए थे। FRI में बहुत सी फिल्मों और सीरियल की शूटिंग भी होती हैं। कुछ साल पहले आयी फिल्म स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर की शूटिंग भी यहीं हुई थी। FRI देख वापस चले तो बारिश बंद हो चुकी थी। समय था 11 बजे। प्लान में कुछ ख़ास नहीं था लेकिन इतनी जल्दी दिल्ली जाने का मन भी नहीं था। इसलिए तय हुआ की पौंटा साहिब भी दर्शन करेंगे और वहीँ से यमुना नगर करनाल होते हुए दिल्ली पहुंचेगे।

गाड़ी पौंटा साहिब की तरफ घुमा ली। पहले ही शहर से बाहर आ चुके थे तो सरपट विकास नगर की तरफ चल पड़े। रास्ते में सड़क किनारे संतरे और मौसमी के जूस वाले खड़े थे। एक जगह रुक कर जूस निकलवाया और पिया। साफ़ सुथरा और ताजा जूस रिफ्रेशिंग था। कीमत 30 रुपये का एक गिलास यानि कुल 120 रुपये। फिर सेला कुई होते हुए विकास नगर पहुंचे। हरबर्टपुर पार करते ही आम का बाग़ मिला। किनारे पर गाड़ी रोक बाग़ में गए और देखा कि वो लोग डाल के पके आम बेच रहे थे। आम अच्छे थे तो 3 किलो ले लिए। 2 किलो कच्ची आमी भी ले ली। अपनी गाड़ी से यात्रा करो तो यही फायदा है। कहीं भी रुको, कुछ भी खरीदो और गाड़ी की डिक्की में रख लो। कुछ आम वहीँ टेस्ट भी कर लिए। आगे बढे तो एक छोटी बैराज थी। गरमागरम भुने भुट्टे और स्ट्रॉबेरी मिल रही थीं, लेकिन किसी का भी मन ये खाने का नहीं हुआ तो बिना रुके आगे बढ़ गए। आखिर मुंह में ताजे आमों का फ्लेवर जो था। यहाँ सड़क का एक छोटा हिस्सा ख़राब था वर्ना पूरी सड़क एक दम बढ़िया है। हरबर्टपुर से एक और रास्ता देहरादून जाता है जो सीधा देहरादून ट्रांसपोर्ट नगर और ISBT निकलता है। आगे बढे तो यमुना नदी के दर्शन हुए। दिल्ली वालों को इतनी साफ़ यमुना नदी दिखे तो विश्वास ही नहीं होता। यही हमारी फॅमिली के साथ हुआ। यमुना नदी से दाएं मुड़े तो सामने पांवटा साहिब गुरुद्वारे के प्रथम दर्शन हुए। यमुना पुल पार किया तो हम हिमाचल प्रदेश में थे। गाड़ी का एंट्री टैक्स 40 रुपये लगा। टैक्स नाका पर करते ही बाएं सड़क पर मुड़े और कुछ दूर आगे जाने पर गुरुद्वारा साहिब पहुँच गए। गाड़ी पार्किंग के बहुत बड़ी जगह थी। बारिश की वजह से पार्किंग मैदान में हल्का कीचड भी था। गाड़ी लगा अंदर गए। जूते जोड़ाघर में रखे, हाथ पैर धो कर गुरुद्वारा साहिब में पहुंचे। वहां असीम शांति थी। दर्शन कर बहुत देर वहीँ बैठे रहे। कुछ देर बाद निकले, प्रसाद लिया, बाहर आ कर दुकानों से छोटा मोटा सामान खरीदा। बच्चों को कड़े पहनवाए और चल पड़े। भगवान का बुलावा भी बस ऐसे ही आता है। कहाँ तो देहरादून से सीधा दिल्ली जाने वाले थे और कहाँ यहाँ बाबाजी के द्वारे आ पहुंचे।

यहाँ से निकले तो दोपहर हो चुकी थी। धूप बढ़ गयी थी और शहर में ट्रैफिक भी काफी था। यह शहर दो इंडस्ट्रियल towns, सिरमौर और सेलाकुई के पास है इसलिए बहुत सारे ट्रक शहर से हो कर गुजरते हैं। शहर पार कर यमुना नगर वाले चौक पर आ पहुंचे। यहाँ से एक सड़क दाएं नाहन हो कर चंडीगढ़ चली जाती है। (इस सड़क पर एक बार ड्राइविंग कर चुका हूँ। बहुत ही शानदार रोड है।) चौक से दूसरी सड़क सीधा यमुना के साथ साथ चलते हुए यमुना नगर की तरफ जाती है। इसी चौक के पास होटल ग्रैंड रिवेरा पर रुक कर खाना खाया। बहुत से परिवार यहाँ लंच के लिए रुके थे। भीड़ होने की वजह से टाइम लगा पर खाना बढ़िया था। कीमत में थोड़ा सा ज्यादा भी था। खाना खा कर चले तो सड़क का नजारा ही बदल गया। हम कलेसर राष्ट्रीय उद्यान से गुजर रहे थे। सड़क के दोनों तरफ इतना घना जंगल था कि जमीन पर कतरा भर धूप भी नहीं आ पाती थी। रास्ता हल्का सा पहाड़ी है लेकिन गाड़ी एक सामान गति से चली जाती है। ट्रैफिक न के बराबर ही था। रास्ते में एक जगह ढेर सारे बन्दर दिखे तो गाड़ी धीमे कर ली। यह जंगल लगभग 30 मिनट तक रहा। इस बीच हम हिमाचल छोड़ हरियाणा में आ चुके थे। कुछ देर बाद यमुना नगर पहुंचे। अब तो शायद यहाँ बाई पास बन चुका है परन्तु पहले शहर के अंदर से ही हो कर आना पड़ता है। यहाँ से गाड़ी में पेट्रोल डलवाया और करनाल के लिए बढ़ चले। सड़क सिंगल लेकिन बढ़िया थी। हालाँकि ट्रैफिक बढ़ गया था। पहाड़ों से प्लेन में आते ही गर्मी और प्रदूषण भी बढ़ गया था। करनाल के पास दिल्ली चंडीगढ़ मार्ग पर आ पहुंचे। यहाँ से तो स्पीड बढ़ ही जानी थी लेकिन हमारे साथ उल्टा ही हो रहा था। गाडी चलाने का मन ही नहीं था। देखा तो बाक़ी तीनों लोग सोये हुए थे और इसीलिए मुझे भी आलस आ रहा था। करनाल पार कर नीलकंठ ढाबा पर रुके। अब इसे ढाबा कहना सही नहीं होगा क्युंकि अब तो ये एक मिनी फ़ूड कोर्ट है। बहुत से देशी विदेशी फ़ास्ट फ़ूड आउटलेट्स हैं, हालाँकि इनका देसी खाना शानदार है। यहीं पर हमने ब्रेक लिया। चाय पी और पकौड़े खाये। इस बीच मैंने 5 मिनट का पावर नैप भी ले लिया। छोटा सा ब्रेक बहुत रिलैक्सिंग रहा। यहाँ से चले तो अगले 3 घंटे में घर आ पहुंचे।

इन 3 दिनों में 5 प्रदेश और 4 शहरों को घूम चुके थे लेकिन कहीं भी थकावट नहीं हुई। कुल गाड़ी चली 640 किलोमीटर और पेट्रोल लगा लगभग 3000 रुपये का। कुल टोल टैक्स और पार्किंग लगभग 500 रुपये लगे। दो रात के होटल का खर्चा रुपये 4000 और खाने पीने का शायद रुपये 2000 लगा। बाकी खरीदारी अलग रही। 4 लोगों का कुल खर्च हुआ लगभग 10000 रुपये। यानि प्रति व्यक्ति प्रतिदिन खर्च रहा 800 रुपये लगभग।

आप भी तीसरे दिन के फोटो देखिये। मिलते हैं अगले यात्रा वृतांत में।

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