शहरी दोस्त के साथ पहाड़ों के सफर ने बदल दी ज़िंदगी

Tripoto
Photo of शहरी दोस्त के साथ पहाड़ों के सफर ने बदल दी ज़िंदगी by Aastha Raj

कहते हैं पंछियों का झुंड हमेशा एक साथ उड़ान भरता है। यह कहावत मेरी सहेली अपर्णा और मेरे लिए बिलकुल सही सिद्ध होती है। हम दोनों एक दूसरे के एकदम विपरीत हैं। एक तरफ अपर्णा कोई भी फैसला लेने में देर नहीं करती और एक तरफ मैं हर चीज़ को जाँच परख कर एक योजना के साथ आगे बढ़ती हूँ। वो बोलना बंद नहीं कर सकती और मुझे शांत रहकर सभी चीजों को समझना पसंद है। उसे शहर की भाग-दौड़ पसंद हैं और मुझे पहाड़ों की शांति।

हम दोनों का व्यक्तित्व अलग होने की वजह से हमारी पसं-नापसंद भी अलग है। पिछले सप्ताह में मैं हिमचल के एक छोटे गाँव हम्ता घूमने की सोच रही थी पर मुझे उसकी नज़रों से पता चल रहा था कि वो इस ट्रिप के लिए तैयार नहीं है। मैंने इसे एक चुनौती मानी और फैसला किया कि इस शहरी लड़की को मैं पहाड़ों का दोस्त बना कर रहूँगी।

एक खूबसूरत गाँव हम्ता/ हम्प्ता 

मनाली से 17 कि.मी. दूर हम्ता एक पहाड़ के ऊपर बसा है। हम्ता एक पवित्र जगह की तरह है जिसका दरवाज़ा अपनी खुली बाँहों से आपको स्वीकार करने को तैयार है।

हम्ता तक जाने वाला रास्ता काफी रोमांचक था। जैसे-जैसे हम सफ़र में आगे बढ़ रहे थे मैं अपर्णा की तरफ देख रही थी। इंटरनेट का ना होना उसे बहुत परेशान कर रहा था और खुली हवा की ताज़गी उसे सुकून दे रही थी। मैं मन ही मन मुस्कुरायी और सोचा ये मेरी पहली जीत है।

स्वच्छ हवा से भरे कुछ रास्तों को पार करने के बाद हम ग्लैम्प इको पहुँचे जहाँ हमें ठहरना था। हम वहाँ की खूबसूरती को निहार ही रहे थे कि तभी लीगो और सूकी, 2 पहाड़ी कुत्ते हमारी और दौड़े। शहर के बंधनों से दूर यहाँ आकर हमें अच्छा लग रहा था। पंछियों के बोलने की आवाज़ हर तरफ सुनाई दे रही थी, ठंडी हवा हमारे बालों के साथ खेल रही थी और बर्फ से ढके पहाड़ हमारी ओर देखकर मुस्कुरा रहे थे।

वीकेंड पर हमारा घर

श्रेय: सौम्याबी

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ग्लैम्प इको एक शहरी होटल से बिलकुल अलग था। खूबसूरत पहाड़ों के बीच बसा यह ठिकाना सेब की बागानों से घिरा है। यहाँ रोज़ के इस्तेमाल की सभी सुविधाएँ मौजूद हैं पर एक बड़े होटल जैसी सुविधाएँ नहीं है। यह होटल यात्रियों को शहर से दूर प्राकृतिक शांति देता है। यहाँ का वातावरण आपको घर की याद दिलाता है। हमारा कमरा एक मिट्टी के घर में था जहाँ की छत नीचे थी ताकि ठण्ड में हमें गरमाहट मिल सके।

यहाँ पहुँच कर अपर्णा ने सबसे पहले सभी मशहूर कैफ़े का पता किया। हमें पता चला की सबसे नज़दीक कैफ़े ओल्ड मनाली में है जो वहाँ से 20 कि.मी. की दूरी पर था। यहाँ सुनते ही मैंने और होटल के मालिक ने अपर्णा की आँखों में निराशा देख ली थी क्योंकि उसकी पूरी ज़िन्दगी खाने और मिठाईयों की इर्द गिर्द घुमती है। इसलिए हमारे मेज़बान के सुझाव के अनुसार हम हम्ता के इकलौते ढाबे पर पहुँचे।

हिमाचल का खाना और वहाँ के लोगों से मुलाकात

ढाबे पर हमने बहुत ही स्वादिष्ट बठुरे और आलू भरा हुआ ब्रेड पकोड़ा चटनी के साथ खाया। ढाबे के मालिक कल्ज़ान अंकल और डोल्मा आंटी ने हमारी हर तरह से खातिरदारी की ताकि हमारे छोटे से सफ़र में हमें हम्ता का स्वाद मिल सके।

श्रेय: सौम्याबी

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अगले दिन वो पूरे दिन हमारे लिए हिमाचल की स्पेशल डिश सिद्दू बनाने में लगे हुए थे। सिद्दू एक प्रकार की ब्रेड है जिसके अन्दर अखरोट डाल कर उसे भाप से पकाया जाता है। हमने वहाँ बैठ कर खाना खाया और खाने के साथ हमें शुद्ध घी दिया गया था जो उनकी अपनी गाय के दूध से बना था। वो व्यक्ति जिसे मशहूर कैफ़े में जाना और क्लब में पार्टी करना पसंद है उस अपर्णा को इस साधारण खाने का आनंद लेता देख मुझे भी बहुत आनंद आ रहा था।

Day 2

इसके बाद आई एक ऐसी चुनौती जिससे सभी शहर के लोग दूर भागते हैं, पैदल यात्रा! हमें खरीदारी करने के लिए ओल्ड मनाली जाना था और कैब की कमी के कारण कुछ दूर पैदल चलना था। मैं पहाड़ों में ही पली बढ़ी हूँ इसलिए मेरे लिए ये मुश्किल नहीं था पर अपर्णा को कच्ची सड़कों पर जूझता देख कर मुझे बहुत हंसी आ रही थी। बिलकुल ऐसा कोई जादू नहीं हुआ था कि उसे चढ़ाई करने में मज़ा आने लगे पर उसे खुश करने के लिए मैंने उसकी हजारों तस्वीरें खींची।

श्रेय: सौम्याबी

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हमें चढ़ाई करने में 3 घंटे लग गए, उसके बाद हमने किसी से लिफ्ट भी ली और फिर एक ऑटो भी बुक किया, तब जाकर हम ओल्ड मनाली पहुँचे। हम ना तो तुरंत किसी मेट्रो ट्रेन में जा सकते थे ना ही दिल्ली की तरह उबर लेकर जा सकते थे फिर भी ये सफ़र हमारी ट्रिप का सबसे रोमांचक हिस्सा था।

ओल्ड मनाली

श्रेय: सौम्याबी

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जब हम ओल्ड मनाली पहुँचे तो अपर्णा वहाँ की भीड़ और शहर से परेशान हो गई थी और मुझे एहसास हो गया था कि एक शहर की लड़की को मैंने शांति और पहाड़ी गाँव से प्यार करना सिखा दिया था।

सेथन में रोमांच

अगले दिन जीप में पीछे बैठकर हम सेथन गाँव की तरफ निकले। वहाँ का इलाका जंगलों से भरा था और हल्की बारिश भी शुरू हो गई थी, पर फिर भी मुझे और मेरी शहरी दोस्त को इतना मज़ा आ रहा था जितना ज़िन्दगी में पहले कभी नहीं आया।

हमने वहाँ के हरे मैदान देखे, सेथन गाँव की औरतों से बातचीत की और पांडुरोपा की खूबसूरती में खो गए।

जैसे ही सोमवार आया वो डर मन में फिर से आने लगा जो हर सोमवार को आता है। अपर्णा हम्ता छोड़कर दिल्ली नहीं लौटना चाहती थी। मुझे ये एक उपलब्धि लग रही थी। शायद कोई भी पहाड़ों की भव्यता से दूर नहीं रह सकता है। चाहे आप अपनी ज़िन्दगी में कितने भी व्यस्त हों सिर्फ पहाड़ ही आपको रोक कर इस बात को शक्ति देते हैं की आप अपने आप को समझ सकें और हर छोटी बड़ी चीज़ को भरपूर जीयें।

श्रेय: सौम्याबी

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हम ट्रिप से वापस आ गए थे और हमने एक दूसरे को वादा किया कि हम हमेशा एक दूसरे को अपने कम्फर्ट ज़ोन से निकलने में मदद करेंगे। वैसे भी ज़िन्दगी का मज़ा वहीं से शुरू होता हैं जहाँ कम्फर्ट ख़त्म होता है।

इसलिए इस आप भी चुनौती लीजिये और अपने सबसे अच्छे दोस्त के साथ ट्रिप प्लान कर  निकल जाइए नए सफर पर।

अगर आपके पास भी अपने दोस्तों के साथ की गई ऐसी रोमांचक यात्रा की कहानी है तो यहाँ क्लिक कीजिए और लिख डालिए अपना अनुभव।

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