कोरोना के बाद कोलकाता गई तो इस शहर को कुछ इस तरह पाया

Tripoto
Photo of कोरोना के बाद कोलकाता गई तो इस शहर को कुछ इस तरह पाया by Deeksha Agrawal

कल क्या पता किनके लिए आंखें तरस जाएंगी? एक समय था जब गुलज़ार साहब के ये शब्द बेमतलब से लगते थे। सोचती थी ऐसा क्या ही घटेगा की इंतज़ार इतना लंबा होगा? फिर 2020 आया और अपने साथ एक ऐसी बीमारी लाया। जिसका न कोई इलाज है और न ही कोई दवा। इससे बचना है तो सैनिटाइज करिए और दूरी बनाकर रखिए। ये ज़िन्दगी है साहब, ये किसी के लिए नहीं रुकती फिर ये छोटा सा वायरस क्या चीज़ है? खैर फिर भी महीनों तक घर पर ही रही। काम भी घर से ही किया लेकिन कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें घर पर रहकर नहीं किया जा सकता। इसलिए जब सरकार ने ट्रैवल करने की थोड़ी छूट दी। मैं निकल पड़ी उन सभी रुके हुए कामों को पूरा करने।

पहला दिन

कोलकाता में ये मेरा पहला दिन था। रात के सफर के बाद थोड़ी थकान लग रही थी और हो भी क्यों न? रात की नींद की अहमियत अब धीरे-धीरे समझ आने लगी थी। सिर भारी लग रहा था और आंखें थी जो खुलने का नाम नहीं ले रहीं थीं। नींद ने मुझ पर कुछ ऐसा जादू कर दिया था कि बस मन कर रहा था जल्द से जल्द होटल पहुँच कर सो लूं। समय कम था और काम बहुत ज़्यादा। दो दिन की ट्रिप में मैं कोलकाता को फिर एक बार जी भरकर महसूस कर लेना चाहती थी। इसलिए नींद को किनारे कर मैंने पहले काम खत्म करना ठीक समझा। स्टेशन से निकलकर होटल पहुँचने के लिए मैं बस या ट्राम लेना चाहती थी।

कोलकाता में कदम रखते ही मैं उसके पुरानेपन को खोज रही थी। जिससे मुझे पहली नजर का प्यार हुआ था लेकिन काफी समय इंतज़ार करने के बाद भी जब बस नहीं मिली तो मैंने न चाहते हुए भी पास खड़े व्यक्ति से पूछ लिया। पता चला बाकी शहरों की तरह यहाँ भी बसें बंद हैं। ऐसा लगा मानो मेरे बहुत सारे सवालों का जवाबों वाला सपना उनसे बात करके खत्म हो गया। मैंने फोन निकाला, टैक्सी बुक की और अपने होटल की तरफ बढ़ गई। रास्ते भर मैं उसी पुरानी भीड़ की एक झलक पाने के लिए गाड़ी की खिड़की से टकटकी लगाए बैठी थी।

मुझे पता था अब सड़कों पर वहीं पुराना शोर सुनने को नहीं मिलेगा। ऐसा लग रहा था कि मानो सिटी ऑफ जॉय कहे जाने वाले इस शहर पर किसी ने एक पर्दा ढंक दिया था। मैं बस उस पर्दे को उठाना चाहती थी। कोलकाता की वही तस्वीर एक बार फिर देख लेना चाहती थी लेकिन फिलहाल ये मुमकिन नहीं था। कितना ज़रूरी होता है जिन्दगी का दिख जाना। ये बात कोलकाता की बेजान सड़कों को देखने के बाद समझ आई।

होटल में ज़्यादा देर रुकने का मन नहीं था लेकिन कुछ शुरुआती काम जरूरी होते हैं। मेरे पास सामान ज़्यादा नहीं था। केवल एक बैग था। मैंने बैग को कंधे पर उठाया और होटल की लॉबी में जा पहुँची। दरवाजे पर कोई इंसान तो नहीं मिला लेकिन एक नोटिस चिपका मिला। कृपया अंदर आने से पहले अपने हाथ सैनिटाइज करना न भूलें। मैंने पास रखी बोतल से हाथों को सैनिटाइज किया और रिसेप्शन पर अपनी बारी का इंतजार करने लगी। काउंटर पर भीड़ नहीं थी। मेरे आगे केवल दो-तीन लोग ही रहे होंगे लेकिन काउंटर से दूरी कुछ ज़्यादा लग रही थी। काउंटर पर मैंने फोन से कोड स्कैन किया और थर्मल स्कैनिंग करवाई।

नहा-धोकर होटल से निकली तो देखा मेरा स्वागत एक ठंडी हवा के झोंके से हुआ। मैंने कहा चलो कुछ तो अच्छा हुआ इस खुशियों के शहर में। अगस्त का महीना था और पेड़ों पर नए फूल आने शुरू हो गए थे। पूरा इलाका कदंब के फूलों की महक से खुशनुमा हो उठा था। मैंने भी सोचा कोलकाता से फिर एक मुलाक़ात करने के लिए इससे अच्छा समय और क्या हो सकता है?

कालीघाट मंदिर और कॉलेज स्ट्रीट

ऑफिस से काम खत्म करने के बाद सबसे पहले मैं कालीघाट मंदिर गई। वहाँ दुकानें खुली मिल गईं। वहाँ से कुछ फूल खरीदे और मंदिर चली गई। मंदिर में पुजारी धोती की जगह पीपीई किट पहने दिखाई दिए। वापसी में दुकानवाले को डलिया लौटाते हुए बात करने लगी। दीदी खरीदार कम हैं। लेकिन क्या करें मजबूरी है। दुकान नहीं खोलेंगे तो खाएंगे क्या,उसने कहा। मेट्रो अब भी बंद थी इसलिए फिर एक बार टैक्सी ली। कालीघाट मंदिर से इंडियन कॉफी हाउस जाने का सोचा। 

मैंने ये रास्ता इसलिए भी चुना। जिससे मुझे विक्टोरिया मेमोरियल की एक झलक मिल जाए। एक समय था जब ये इलाका भी रिक्शा और ऑटो से गुलजार रहता था लेकिन आज वहाँ एक मायूसी थी। कुछ कहानियाँ कभी पूरी नहीं होती। कुछ आलस की वजह से और कुछ में कहानी इतनी लंबी खिंच जाती है कि उससे अधूरा छोड़ देना ही बेहतर लगता है। कोलकाता की खाली सड़कें उन्हीं अधूरी कहानियों के कोरे पन्ने की तरह लग रहीं थीं। जिसका कुछ हिस्सा तो जी लिया था पर कुछ हिस्सा छूट गया था।

इंडियन कॉफी हाउस में भी कुछ वैसा ही माहौल था। कैफे खुला ज़रूर था पर आम दिनों में होने वाली भीड़ नदारद थी। खाली पड़ी कुर्सियों और टेबलों को देख ऐसा लग रहा था जैसे कोलकाता मुझे किसी तरह का धोखा दे रहा था। अब सूरज ढलने लगा था। नींद पूरी ना होना एक बोझ जैसा लगने लगा था। कॉलेज स्ट्रीट की खाली गलियों से होते हुए बाहर आई तो आसमान सुर्ख हुआ पड़ा था। आम दिनों में इस समय हावड़ा ब्रिज पर गाड़ियों का मेला लगा रहता था पर जिस शहर का शोर संगीत जैसा लगता हो उसकी शांति मुझे खाए जा रही थी इसलिए मैं वापस होटल की तरफ बढ़ गई।

दूसरा दिन

सुबह उठना मुझे हमेशा से पसंद रहा है। ट्रिप पर भी ऐसा ही करने की कोशिश करती हूं। सुबह का स्वाद महसूस करती रहती हूं। कोलकाता में ये मेरी दूसरी और इस ट्रिप की आखिरी सुबह थी। शाम की वापसी की टिकट थी इसलिए मेरे पास आज ज़्यादा समय नहीं भी था। मैंने सामान बांधा, होटल से चेक आउट किया और पार्क स्ट्रीट की तरफ निकल पड़ी। सोचा वहीं नाश्ता करके आस पास में टहल लूंगी। अगर आप पार्क स्ट्रीट गए हैं तो यहाँ रहने वाली रौनक से अनजान बिल्कुल नहीं होंगे। पिछले दिन के एकांत को देखकर मैं समझ चुकी थी आज भी वैसा ही होने वाला है।

पार्क स्ट्रीट पहुँची तो बहुत देर तक अलग-अलग जगहों के नामों को देखती रही। किसी बड़े रेस्त्रां में जाने का मन नहीं था इसलिए एक बहुत ही छोटे से कैफे में चली गई। इस कैफे से न कोई खास सुंदर नज़ारा दिखाई दे रहा था और न ही ये बहुत फेमस था। ये बस एक कोने में पड़ा हुआ सा था। लगभग खाली ही समझिए। कैफे में मुझे मिलाकर कुल 4 लोग थे। मैंने खाना ऑर्डर किया और डायरी लिखने बैठ गई। कोलकाता की ये शांति मुझे काट रही थी। वो सारी बातें जिन्हें पहला अनदेखा कर देती थी।

आज सभी मेरे सामने अजीब सी शांति बनकर तैर रहीं थीं। मेरे पास वक़्त था इसलिए मैंने लिखना शुरू किया। लिखने की दो बातें मुझे बहुत पसंद हैं- एक अकेलेपन में भी आपको बात करने के लिए कोई मिल जाता है और दूसरा लिखने के आगे बाकी सारी आवाज़ें फीकी पड़ जाती हैं। आज मैं उन्हीं शांत पड़ी आवाज़ों से निकलने के दरवाज़े की खोज में थी। मैं लगातार लिख रही थी और पता ही नहीं चला कब में दोपहर के 2 बज गए। कुछ देर में मेरी फ्लाइट थी।

इंसानों का दिखना कितना महत्वपूर्ण होता है ये कोलकाता की खाली सड़कें देखकर समझ आया। उस समय ये बातें अजीब लगती थी, भीड़ देखकर घबराहट होती थी लेकिन आज ये सूनापन लंबी रात की तरह लग रहा था। बहुत दिनों के बाद घर से निकली ज़रूर थी पर इस शांति का स्वाद तकलीफ़ दे रहा था।

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