मणीकरण गुरुद्वारे में बिताई एक रात ने मुझे आस्तिक बना दिया!

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अमृतसर में इनके गुरुद्वारे स्वर्ण मंदिर के बारे में तो सबने सुना ही होगा, मगर क्या अपने मणिकरण के बारे में भी सुना है ? हिमाचल में गुरुद्वारा मणिकरण साहिब परिसर में ही एक कुंड है, जहाँ आप स्नान कर सकते हो। मैनें न सिर्फ यहाँ के कुंड में स्नान किया है, बल्कि इस गुरुद्वारे में एक रात भी बितायी है। यूँ तो मैं नास्तिक था, मगर यहाँ बितायी उस रात ने मुझे परमात्मा की शक्ति और इंसानी एकता के बारे में नए सबक सिखा दिए।

हिमाचल के मणिकरण गुरुद्वारे के बारे में काफी सुना था, मगर कभी देखा नहीं था। जाने का काम भी कभी नहीं पड़ा क्योंकि धार्मिक इंसान मैं था नहीं। गुरुद्वारों में ग्रन्थ साहिब की सेवा करते हुए मैं देख चूका था, तो लगा कि मणिकरण में भी ऐसा ही कुछ होता होगा।

मगर एक रात मुझे मणिकरण साहिब ने बुला ही लिया।

उस रात मुझे रसोल से ट्रेक करके उतरते हुए काफी देर हो गयी थी। सोचा था, किसी तरह कसोल पहुँच जाऊँ, फिर वहाँ से कुल्लू की बस ले लूँगा। कसोल जाकर पता चला कि बस तो यहाँ से निकल चुकी है मगर कसोल से 4 कि.मी. दूर मणिकरण में रुकी है। अगर मैं आधे घंटे में वहाँ पहुँच जाऊँ तो बस में बैठ सकता हूँ।

ट्रेकिंग के बाद कसोल तक आने में हालत खराब हो गयी थी, ऊपर से अँधेरा, कंधों पर रकसैक और भूख के मारे पेट पीठ को चिपका जा रहा था। मगर सोचा था कि कुल्लू स्टैंड से कुछ खा-पी लूँगा और फिर अगर बस मिली तो ठीक, नहीं तो स्टैंड के पास ही कमरा ले कर सो जाऊँगा, ताकि तड़के फ़टाफ़ट चंडीगढ़ की बस पकड़ सकूँ।

मरता-पड़ता बैग घसीटता जैसे तैसे मणिकरण स्टैंड पहुँचा तो देखा कि बस खड़ी है। प्लान अंजाम ले रहा था। दौड़ कर बस तक पहुँचा तो देखा कि बस में एक भी मुसाफिर नहीं है। पूरी खाली।

कहाँ गए सारे लोग ?

खाली बस के पास खड़े ड्राइवर ने बताया कि बस खराब होने से उसमें बैठी सवारियों को मिनी बसों में एडजस्ट किया गया था और मिनी बसें भी जा चुकी हैं।

अब क्या करें ? कहाँ जाएँ ?

कसोल में तो रुकने की जगहें पता थी, पर अब यहाँ मणिकरण में कहाँ रुकूँ ? कहाँ खाना मिलेगा ? कहाँ नहाऊँगा ? कहाँ सोऊँगा ? भूख-प्यास, निराशा और थकान में डूबा मैं और कुछ सोच ही नहीं पा रहा था। मुझे पसोपेश में पड़ा देख सरदारजी खुद ही बोल पड़े।

"आप आगे से मुड़के गली में चले जाओ। पुल पार करोगे तो वहाँ गुरुद्वारा दिखेगा। वहाँ सुस्ता लेना। लंगर प्रसादी ले लेना। "

डूबते को तिनके का सहारा। मैं भारी क़दमों से गुरूद्वारे की तरफ चला। मंदिर-गुरुद्वारे में जाने क्या ताकत है, इंसान अपनी सारी दुःख-परेशानी भूल जाता है। मैनें गुरुद्वारे में घुसने से पहले अपने सिर पर मफलर बाँध लिया।

अंदर घुसते ही जूते उतारने वाली जगह कोई सरदार जी सेवा दे रहे थे। उन्होंने कीचड़ से सने मेरे ट्रेकिंग शूज़ ले लिए और बड़े ध्यान से उसे एक किनारे सरका दिया। पास में लगे नल से हाथ मुँह धो कर मैं आगे बढ़ गया।

बैग एक तरफ रख कर मैं गुरुद्वारे के एक ओर बने बड़े से कमरे में घुस गया तो देखा कि लोग कतार में बैठे गरमा-गरम दाल-रोटी का लंगर खा रहे थे। देखा-देखी मैं भी बैठ गया। एक सरदारजी ने मेरे आगे साफ़ थाली रख दी। दुसरे ने उसमें गाढ़ी दाल परोस दी। तीसरा मेरे हाथों में मोटी -मोटी रोटियाँ पकड़ा गया। चौथा थाली के एक किनारे आम का अचार रख गया।

भरपेट खाना खा के मुझे नींद के झोंके आने लगे। शरीर में इतनी हिम्मत भी नहीं बची थी कि बैग उठा कर पुल पार करूँ और रात को सोने के लिए कोई कमरा ढूँढ सकूँ। फिर भी मरता क्या न करता। रात को सोना तो था ही। तो बैग उठाया और जूतों के स्टैंड की तरफ चल दिया।

सरदार जी से जूते लिए तो जूतों पर से कीचड़ साफ़। जूते एकदम साफ़। सरदारजी को धन्यवाद दिया और पुछा कि पास में कमरा कहाँ मिलेगा ? सरदारजी बोले कि प्राइवेट कमरा चाहिए तो पुल पार करके बाज़ार में जाओ। अगर गद्दे पर सो सकते हो तो गुरुद्वारे में भी रुक सकते हो।

इतना सुनना था कि मैनें जूते वापिस सरदारजी को दे दिए। पास के कमरे में अपनी आईडी जमा करवाई, पर्ची ली और रज़ाई लेकर पहली मंज़िल पर चल दिया।

बड़े से हॉल में गद्दे ही गद्दे लगे थे। कुछ लोग पहले से दीवार में लगे सॉकेटों में चार्जर घुसाए लेटे हुए थे। मैनें भी एक साफ़ सी जगह देख कर लेट लगा दी। बैग का तकिया बनाया और रज़ाई में दुबक पर सो गया।

ऐसी मीठी नींद पहले कभी नहीं आयी थी।

सुबह गुरबाणी सुनकर आँख खुल गयी। देखा लोग तौलिये ले कर बाहर जा रहे हैं। नित्य कर्म से निवृत्त होकर मैनें भी तौलिया निकाला और ठंडे पानी से नहाने के लिए खुद को दिमागी रूप से तैयार करने लगा। बाहर देखा तो गरम पानी के कुंड से भाप निकल रही थी।

दरअसल मणिकरण में गरम पानी के कई सोते हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार मणिकरण कुंड में पार्वती की मणि गिर गयी, जिसे शेषनाग अपने मुँह में दबा कर पाताल ले गया। शिव के क्रोधित होने पर शेषनाग ने फुफकार मारी और मणि ऊपर की ओर उछाल दी। इस फुफकार की वजह से मणिकरण के कुंड में पानी गरम रहने लगा।

सिख धर्म की कहानी के मुताबिक़ गुरु नानकदेव जी अपने चेले बन्दा मर्दाना के साथ यहाँ से गुज़र रहे थे। भूख लगने पर उन्होंने बन्दा मर्दाना को पास से लंगर के लिए राशन मांग कर लाने को कहा। फिर रोटी बनाकर नानक देव ने मर्दाना को पास से कोई भी पत्थर उठा कर लाने को कहा। जहाँ से बन्दा ने पत्थर उठाया, वहाँ से गर्म पानी की धारा फूट पड़ी।

वैज्ञानिकों की बात मानें तो यहाँ का पानी सल्फर के पत्थरों से छन कर आने की वजह से गर्म हो जाता है।

डुबकी लगाते हुए मैनें यहाँ के कुंड में बड़े-बड़े पतीले पड़े देखे। पूछने पर पता चला कि इनमें लंगर के लिए दाल और चावल पक रहे हैं। कुंड में ही बर्तन दाल कर चाय भी बनायी जाती है।

अगर रात को गुरुद्वारा न होता तो मेरी हालत क्या होती, मैं ही जान सकता हूँ। गुरुद्वारे में आकर मुझे गरमा-गरम खाना मिला। फिर सोने के लिए गद्दे और ओढ़ने के लिए रज़ाई मिली। फिर सुबह उठा कर नहाने के लिए गरम पानी का कुंड मिल गया। फिर सुबह के लंगर में परांठे और चाय मिल गयी। जाते हुए आईडी वापिस ली और जूते पहने। जूते एकदम साफ़।

मेरी इतनी सेवा के बदले मुझसे एक रूपया भी नहीं माँगा गया। एक ही धर्म से जुड़े इंसानों ने एक ऐसा माहौल तैयार कर दिया जहाँ हरेक को उसका धर्म पूछे बिना ये सब सुविधाएँ दी जाती हैं। ऐसी धर्म निरपेक्षता और ऐसी इंसानियत और कहाँ देखने को मिलगी।

अगर इसे ही धर्म कहते हैं तो मैं नास्तिक क्यूँ हूँ। अगर इसे ही धर्म कहते हैं तो मैं तो एक रात में ही भक्त बन गया हूँ।

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