ट्रेकिंग के लिए निकल रहे हैं? साथ में कॉमन सेंस ले जाना मत भूलना!

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ट्रेकिंग पर जाने की वैसे तो कोई उम्र नहीं होती, लेकिन जवान होते ही कुछ रोमांचक करने का जुनून भी पहाड़ों की तरफ भेज देता है |

कारण कोई भी हो, हम आपके ट्रेकिंग करने के खिलाफ नहीं है | बस चाहते हैं कि आप अपनी खुद की सहूलियत के लिए ट्रेकिंग पर जाने से पहले कॉमन सेंस के साथ ये पढ़ लें :

1. नए जूते पहन कर चढ़ाई ना करें

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साल 2017 में मैं उत्तराखंड में हर की दून ट्रेक करने गया था | जयपुर से सांकरी जाने के सफ़र में मैंने लगातार जूते पहने हुए थे तो बस में सीट पर बैठे मैंने अपने ट्रेकिंग शूज़ खोल दिए | बस में से जूते कौन पार करके लेके गया, ये तो पता नहीं मगर मुझे सांकरी से नए जूते खरीदने पड़े |

नए जूते नयए होते हैं तो एक बार पहनते ही आराम देते हैं, मगर लंबी दूर चलने पर ही पता चलता है कि जूता काट कहाँ से रहा है | नया जूता पहनकर कुछ दूर चलने के बाद मुझे पैर में बड़ा दर्द होने लगा | जूता खोल कर देखा तो पैरों की अलग-अलग उंगलियों पर मोटे-मोटे छाले हो गये थे | छाले एक-दो घंटे में ठीक नहीं होते | इन्हें ठीक होने में पूरे 2 से 3 दिन का समय लगता है | नए जूते पहन कर ट्रेकिंग करने में मैंने अपनी हालत तो खराब की ही, साथ ही ट्रिप भी खराब कर ली | अगर आपके ट्रेकिंग वाले पुराने जूते ना मिलें तो नए जूते पहन कर ट्रेकिंग ना करें|

2. चढ़ाई से पहले पेट-भर कर ना खाएँ

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साल 2016 में खीरगंगा की चढ़ाई से पहले भुंतर आता है जहाँ से आगे बस नहीं जाती | भुंतर उतर कर मुझे बहुत तेज़ भूख लगी थी तो सोचा क्यों ना किसी ढाबे पे हल्का-फूलका नाश्ता किया जाए |

जैसे ही ढाबे की कुर्सी पर बैठा, कि लज़ीज़ पहाड़ी खाना बनते हुए आती खुश्बू से दिमाग़ खराब हो गया | नाश्ता करने का प्लान बदल गया | एक के बाद एक डिशेज़ मँगवाने लगा | थुक्पा, मोमोज़, अंडा मैगी और भी ना जाने क्या-क्या | मगर अब जब इन सबसे पेट भर गया था तो रकसैक उठा कर बाहर जाने का मन नहीं कर रहा था | यूँ लग रहा था कि बस अभी तकिया लगा कर सो जाऊँ | मगर सोने का मतलब था रात को भुंतर में ही रुकना | इसके लिए मैं तैयार नहीं था | तो मैनें भरे पेट के साथ ही भारी- भरकम रकसैक उठा कर ट्रेक पर चलना शुरू किया |

कुछ सौ मीटर ही चला था कि शरीर ने जवाब दे दिया | पेट में इतना दर्द हो रहा था जैसे किसी ने शॉटगन से गोली मार दी हो | कुछ घंटे बस्ता छोड़ कर ट्रेक पर ही बैठ गया | जब खाना पचने के बाद पेट थोड़ा हल्का महसूस हुआ तो फिर बैग उठा कर धीरे-धीरे चलना शुरू किया | जो ट्रेक 5 घंटे में आसानी से किया जा सकता था उसे पूरा करने में मुझे 8 घंटे लग गये | और शारीरिक तकलीफ़ हुई वो अलग |

3. हो सके तो अकेले ना चढ़े

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सोलो ट्रैवेलिंग करना अब एक 'फ़ैड' बन गया है | यानी अब लोग अकेले घूमने जाने से कतराते नहीं हैं | मगर ट्रेकिंग एक ऐसी इकलौती एक्टिविटी है जिसे दोस्तों के साथ किया जाए तो  मज़ा और भी ज़्यादा तो आता ही है, साथ ही हिफ़ाज़त भी रहती है | जब भी आप इंसानों की बस्ती से दूर जंगलों में जाएँगे, तो ख़तरा तो सिर पर मंडराएगा ही | आपमें से कई सोच रहे होंगे कि हम तो अकेले ट्रेकिंग करते हैं, इसमें क्या दिक्कत है ? अगर आप अकेले ट्रेकिंग करके वापिस लौटे हैं तो मैं आपको लकी मानूँगा | क्योंकि  जंगलों में ट्रेकिंग के दौरान कई ट्रेकर लापता भी हुए हैं | अब चाहे उन पर जंगली जानवर का हमला हुआ हो, या असामाजिक तत्वों का, नुकसान उन्हीं का हुआ है | अकेले ट्रेकिंग करने जा कर आप इस तरह का ख़तरा ना लें | अगर अकेले घूमने निकलें ही हैं तो ट्रेकिंग की ट्रेल पर आगे जाने से पहले किसी ग्रुप के पीछे या साथ हो लें | नए लोगों से दोस्ती भी हो जाएगी और आप महफूज़ भी रह पाएँगे |

4. कार्ड/ ई-वॉलेट के भरोसे ना रहें

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पहाड़ों में फ़ोन सिग्नल तो आते नहीं है, ऐसे में ई-वॉलेट कैसे काम करेंगे, ज़रा सोचिए | अगर आप ए.टी.एम. के भरोसे भी रहते हैं तो कई जगह मात खा जाएँगे |

एक बार केदारकंठ पीक की ओर जाते हुए मेरे सारे पैसे ख़त् हो गए | मगर मेरे पास एटीएम में पैसा पड़ा तो है, सोच कर मैं आगे बढ़ता रहा | रास्ते में जो कुछ भी एटीएम आए, उनमें से कई में पैसे नहीं थे, तो कई "आउट ऑफ सर्विस" थे | जेब में एक भी पैसा नहीं, अब रात को सोने का, खाने पीने का जुगाड़ करूँ तो करूँ कैसे ?

शुक्र है पहाड़ी लोगों की ज़िंदादिली और खुशमिजाज़ी का | रात को सोने के लिए जिस सज्जन की धर्मशाला में गया, उन्होंने मुझे अपना अकाउंट नंबर दे कर कहा कि नीचे उतरो और वक़्त मिले तो पैसे डलवा देना |

नीचे उतर कर मैंने पहली फुरसत में उन सज्जन के पैसे बैंक में डलवाए जिन्होनें मुझ पर विश्वास करके रात को सोने को छत और खाने को खाना दिया | मगर किसी से उधार लेना बड़ा अजीब लगता है | मनमर्ज़ी की कोई चीज़ खरीद भी नहीं पाते | इसलिए पहाड़ों में घूमने जाते वक़्त अपने साथ रोकडा हमेशा रखें |

5. बैग में ज़रूरी फर्स्ट-एड का सामान रख लें

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ट्रेकिंग करने जाते वक्त शायद आपको ऐसा लगे कि बैग जितना हल्का रहे उतना अच्छा है | मगर ट्रेकिंग गैर ज़िम्मेदार लोगों के लिए नहीं है | हो सकता है आपको बीहड़ जंगल में डायरिया हो जाए | इंसान को भूख उतना जल्दी नहीं मारती जितना जल्दी पानी और इलेक्ट्रोलाइट की कमी मार देती है | आपके बैग में ओ.आर.एस के पैकेट होने चाहिए |

ट्रेकिंग करते हुए पैरों में छाले पड़ सकते हैं | बैग में ब्लिस्टर प्लास्टर होना चाहिए | अगर बैग में बेयर स्प्रे रख सकें तो खुदको और महफूज़ महसूस करेंगे | निहायती निहत्थे इंसान में आत्म-विश्वास भी कम होता है|

तो बस इन बातों का ध्यान रखें और निकल पड़ें अपने अगले सफर पर!

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