चितकुल: हिमाचल के इस आखिरी गाँव में छिपे हैं कई राज़ और कहानियाँ 

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चितकुल भारतीय नक़्शे के अंतिम छोर पर स्थित है जहाँ यात्रियों के कदम रुक जाते हैं। पहाड़ों से घिरा ये सुदूर गाँव हिमाचल के किन्नौर जिले में पड़ता है। यहाँ का शांत वातावरण प्रकृति प्रेमियों को बेहद आकर्षित करता है। लेकिन अगर आप यहाँ थोड़े दिन टिकते हैं तो आपको बड़ा ही भयानक और दिलचस्प कहानियाँ सुनने को मिलेंगी। स्थानीय लोगों से बातचीत करते हुए आपको कई ऐसी बातें पता चलेंगी जो आपकी जिज्ञासा बढ़ाती जाएँगी। ये छोटा सा शहर पहाड़ी चोटियों और बास्पा नदी के संगम पर मौजूद है।

यहाँ कुछ रहस्य, मिथक और कहानियाँ के बारे में मुझे पता चला जो मैं आप लोगों से शेयर किए बिना नहीं रह सकता!

Photo of चितकुल: हिमाचल के इस आखिरी गाँव में छिपे हैं कई राज़ और कहानियाँ  1/1 by Rupesh Kumar Jha

पौराणिक, बौद्ध और हिंदू धर्म का अनुपम मिश्रण

हिंदू और बौद्ध धर्म किन्नौर में मौजूद ही नहीं हैं, बल्कि वे आपस में घुल-मिल गए हैं। इतिहास की ओर देखें तो पता चलता है कि दोनों धर्मों ने किन्नौर में बुशहर के राजा के शासन को मज़बूत करने का काम किया है। हिंदुओं का मानना है कि बुशहर के राजघराने कृष्ण के पौत्र प्रद्युम्न के वंशज हैं। बौद्ध सिद्धांत के अनुसार, बुशहर के राजा मृत्यु के बाद गुरु लामा या दलाई लामा के रूप में फिर से जन्म लेते हैं।

किन्नौर ज़िले के गाँव में एक मंदिर के साथ-साथ एक गोम्पा होना काफी आम है और स्थानीय लोग सुबह दोनों समय उनका सम्मान करते हैं। परंपराएँ शुरुआत में पूरी तरह से विकृत थीं और मानव बलि काफी आम बात थी। आजकल हर मंदिर में एक उठा हुआ मंच है जो अब पशु बलि के लिए उपयोग किया जाता है। यह क्षेत्र बाद में उत्तराखंड में धौलाधारों के पार बद्रीनाथ और गंगोत्री के करीब होने के कारण हिंदुत्व से प्रभावित हुआ। वास्तव में कमला किले में बद्रीनाथ मंदिर है जो सांगला से चितकुल जाने के रास्ते में है जहाँ हर तीन साल में एक मेला लगता है और यहाँ से शुरू होने वाला जुलूस मूर्ति को गंगोत्री ले जाता है। बौद्ध प्रभाव होने का एक कारण ये भी है कि इस क्षेत्र में भटकते चरवाहे और व्यापारिक समुदाय चरांग दर्रे के पार तिब्बत तक आवाजाही करते हैं।

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यहाँ देवी-देवताओं का इतना महत्व क्यों हैं?

पुराने समय में लगभग 121 पीढ़ियों पहले ठाकुर (मुखिया) चितकुल के पास कामरू गाँव में सत्तासीन हुए और बुशहर के राजा बन गए। किन्नौर इस राज्य का महज एक हिस्सा था। देवता इतना महत्वपूर्ण इसलिए हो गए क्योंकि राजा ने तब अपना राज्य बुशहर साम्राज्य की राजधानी सराहन की देवी भीमकली को सौंप दिया था और खुद एक सेवक के रूप में कार्य करते रहे। यह अत्यंत धार्मिक लोगों पर अधिकार बनाए रखने का एक तरीका भी था।

एक और कारण ये है कि परंपरागत रूप से देवता इतने महत्वपूर्ण हैं क्योंकि राजा कभी भी अपने राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों की यात्रा नहीं कर सकते थे, इसलिए वे देवताओं को 100 से अधिक लोगों के साथ भेजते और इससे दूरस्थ लोगों में भी राजा और क्षेत्र को लेकर एकता की भावना कायम हुई।

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चितकुल के स्थानीय देवी-देवता

किन्नौर के प्रत्येक गाँव का अपना स्थानीय देवता होता है और चितकुल मति देवी को समर्पित है। इस गाँव में देवता को समर्पित तीन मंदिर हैं। ऐसा कहा जाता है कि मति देवी ने अपने परिवार के सदस्यों के साथ इस गाँव में पहुँचने से पहले एक कठिन यात्रा की थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, कामरू के पड़ोसी गाँव के प्रमुख देवता भगवान बद्रीनाथ उनके पति हैं। सांगला के नाग देवता और रक्षाम के शमशेर देवता उनके भतीजे हैं।

उत्पत्ति का रहस्य

किन्नौर जिले के अन्य शहरों के लोगों के विपरीत, चितकुल के मूल निवासियों और रक्षाम और सांगला के गाँवों में मंगोलियाई विशेषताओं का कोई निशान नहीं है। लम्बे और बेहद गोरे, कुछ शोधकर्ताओं ने पूर्वी तिब्बत के खंबा जनजाति से इनको जोड़ा है तो वहीं कुछ उन्हें उत्तरी हिमालय के निवासियों से जोड़ते हैं लेकिन सटीक उत्पत्ति को लेकर रहस्य कायम है।

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इतिहास की मौखिक परंपरा

किन्नौर का इतिहास एक अजीब मौखिक परंपरा के माध्यम से संरक्षित है। गोर्च्स की पीढ़ी पारंपरिक रूप से ऐतिहासिक कथाओं को सुनाने में माहिर हैं। त्योहारों के दौरान वे विभिन्न तरीकों से संरक्षित मौखिक इतिहास का बखान करते हैं और सांस्कृतिक उत्सव मनाते हैं। इन इतिहास कथाओं में गाँवों की देवी-देवताओं के मिथकों का वर्णन भी शामिल है।

यात्रा की योजना

कैसे पहुँचा जाए?

चितकुल पहुँचने का बेहतरीन तरीका है कि दिल्ली से शिमला के लिए रात में चलनेवाली बस ली जाए जो आपको सुबह के वक़्त टुटीकंडी बस स्टॉप तक पहुँचाती है। शिमला से आप चितकुल के लिए टैक्सी ले सकते हैं। आप शिमला से सांगला के लिए बस भी ले सकते हैं जो सुबह 7 बजे निकलती है और शाम को आपको सांगला में छोड़ती है। आपको सांगला से चितकुल तक स्थानीय टैक्सियाँ या फिर लिफ्ट भी मिल जाती है।

कहाँ ठहरें?

चुनने के लिए बहुत सारे लोकल होमस्टे हैं जो ऑनलाइन मौजूद नहीं हैं। अरुण होमस्टे और किन्नौर हाइट्स दो अच्छी जगहें हैं। इस शहर में एक जोस्टेल भी है, अगर आप हॉस्टल में रहना चाहते हैं। हालांकि, यदि आप एक लक्जरी आवास सुविधा की तलाश कर रहे हैं, तो समा रिसॉर्ट्स आपके लिए परफेक्ट हो सकता है।

कहाँ खाना खाएँ?

चितकुल में सभी होमस्टे और होटल ताज़ा तैयार किए गया होमफूड देते हैं। ज़ोस्टेल रेस्तरां में भोजन भी उपलब्ध है जहाँ आप खाने का भरपूर आनंद ले सकते हैं।

यात्रा का बेहतरीन समय

मार्च से अक्टूबर तक चितकुल जाने का सबसे अच्छा समय है। हालांकि, इस क्षेत्र में मॉनसून के समय यात्रा से बचना अच्छा रहेगा।

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