किस्सों और रहस्यों से भरा हुआ है उज्जैन का महाकालेश्वर!

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Photo of किस्सों और रहस्यों से भरा हुआ है उज्जैन का महाकालेश्वर! 1/1 by Rupesh Kumar Jha
श्रेयः फ्लिकर

भारत अपनी प्राचीनता को लेकर दुनियाभर में फेमस है। यहाँ संस्कृति की जड़ें बेहद गहरी हैं जो कि सात समंदर पार के लोगों को भी आकर्षित करती हैं। खासकर आध्यात्मिक यात्राओं के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक अनेक ऐसे स्थान हैं जो आपको रोमांचक अनुभव देती है। देश के विभिन्न भाग में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग अपनी दिव्यता और सनातन महत्व के कारण दर्शनीय हैं। इनमें मध्यप्रदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर रहस्यों को लेकर चर्चा में बना रहता है। वैसे तो सालभर यहाँ यात्री आते हैं लेकिन विशेष पर्वों पर भीड़ बढ़ जाती है धार्मिक यात्रा करनी हो या साहसिक और रोमांचकारी यात्रा, उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर आपके लिए फिट बैठ सकता है। मुझे पूरा विश्वास है कि इसके रहस्यमयी किस्सों को जानकर आप खुद को रोक नहीं पाएँगे।

औघड़ शिव की बात निराली

ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव सबसे सरल देवता हैं लेकिन उनमें जो विशालता है, उसे जिसने महसूस कर लिया वो जगत को अच्छी तरह समझ लेता है। उज्जैन में शिव के औघड़ स्वरूप की आराधना होती है जो कि अपने आप में अनोखा है। शिव के इस रूप में पूजने के पीछे की कहानी बेहद रोचक है। भूत-पिशाच को नचाने वाले, शरीर पर भष्म लेप लगाने वाले औघड़ शिव भक्तों के बेहद प्रिय हैं। पूरी सृष्टि शिव से उत्पन्न होकर शिव में विलीन होता है। उज्जैन प्राचीन काल से ही धार्मिक नगरी के रूप में प्रसिद्ध है जहाँ भगवान शिव काल भैरव के रूप में मौजूद हैं। भस्म को सृष्टि का सार बताया गया है जिसे महाकाल के शरीर पर लगाकर उनकी पूजा की जाती है।

चिता की भस्म से आरती

उज्जैन के राजा महाकालेश्वर शिव यहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं। इनकी आरती चिता के भस्म से की जाती है, उससे पहले भस्म से उनका शृंगार किया जाता है। सुबह तड़के 4 बजे ताजा जले चिता की राख से महाकाल की पूजा की जाती थी। लेकिन एक असाधारण घटना होने की वजह से इस प्रथा को बदल दिया गया। अब उपले की राख से महाकाल का अभिषेक किया जाता है। लेकिन ऐसा कब से शुरू हुआ ये कहना मुश्किल है। बताया जाता है कि चिता की कमी की वजह से एक बार पुजारी ने अपने जीवित पुत्र को ही आग के हवाले कर दिया और उसके राख से पूजा कर डाली। इस घटना के बाद ही इस प्रथा को बंद कर दिया गया। भस्म आरती के बारे में एक दिलचस्प तथ्य ये है कि लोग अपने जीवनकाल में ही रजिस्ट्रेशन करा लिया करते थे जिससे कि मरने के बाद महाआरती में उनके भस्म का इस्तेमाल हो सके। फिलहाल यहाँ मुर्दे की भस्म की जगह गाय के गोबर के उपलों से बनी भस्म से शिव का शृंगार होता है।

बंद कमरे में होती है भस्म आरती

महाकालेश्वर मंदिर में आरती के समय कपाट बंद हो जाते हैं और केवल मंदिर के पुजारी ही बाबा का शृंगार करते हैं। इस समय अन्य भक्तजन कक्ष के बाहर खड़े होकर देखते हैं। आजकल बंद कमरे में आरती की पूरी प्रक्रिया को रिकॉर्ड भी किया जाता है। जानकारी के लिए बता दूँ कि आरती के वक्त शिवलिंग को भस्म से पूरी तरह नहला दिया जाता है। अंत में शिवलिंग पर भगवान शिव का चेहरा बनाया दिया जाता है और फिर मंदिर के पट को खोला जाता है।

यहाँ के पुजारी मात्र एक धोती पहने रहते हैं क्योंकि यहाँ किसी अन्य वस्त्र धारण करने की पूरी पाबंदी है। चूंकि महाकालेश्वर भगवान शिव श्मशान के साधक हैं, इसलिए भस्म को उनका आभूषण माना जाता है। भक्त ज्योतिर्लिंग पर चढ़े भस्म को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। लोगों में विश्वास है कि इससे रोग-दोष से मुक्ति मिलती है।

ऐसे भगवान महाकाल उज्जैन पधारे

पुराणों के अनुसार, उज्जैन भगवान शिव को बेहद प्रिय था। इस नगरी में उनके कई भक्त निवास करते थे। एक समय यहाँ दूषण नाम के एक राक्षस का आतंक काफी बढ़ गया था। भक्तों ने उसके आतंक से बचने के लिए शिव की आराधना की। भक्तों की पुकार पर भगवान शिव धरती को फाड़ कर महाकाल के रूप में प्रकट हुए और उस राक्षस का वध किया। इसके बाद भक्तों ने भगवान शिव से हमेशा के लिए उज्जैन में निवास करने की प्रार्थना की और तभी भगवान शिव वहाँ महाकाल ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए।

उज्जैन के राजा हैं महाकालेश्वर

महाकालेश्वर को उज्जैन का राजा माना जाता है और इसलिए राजाओं को यहाँ आना वर्जित है। ऐसी मान्यता है कि अगर राजा इस नगरी में रात में ठहरने की जहमत उठाते हैं तो उनका राजपाट हाथ से निकल जाता है। कहा जाता है कि बाबा महाकाल की शरण में रहने के लिए सिंधिया राजघराने ने उज्जैन में कालीदेह महल बनवाया था। सिंधिया महाराज जब भी उज्जैन आते वे इसी महल में ठहरा करते थे। प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री आज भी रात के वक्त उज्जैन में नहीं ठहरते। देश-विदेश के भक्त अकाल मृत्यु को टालने और मोक्ष पाने की इच्छा से उज्जैन आकर दर्शन करते हैं।

कुछ ज़रूरी बातें

रुद्र सागर झील की तट पर स्थित महाकालेश्वर मंदिर में कुम्भ सहित शिवरात्रि आदि पर्वों पर अधिक भीड़ होती है। आप चाहें तो सालभर में कभी भी आ सकते हैं। आरती में शामिल होने के लिए आप ऑनलाइन बुकिंग भी कर सकते हैं। पहचान पत्र साथ रखना ना भूलें, जिसे देखने के बाद ही आपको आरती में शामिल होने दिया जाता है। महाकालेश्वर मंदिर के अलावा उज्जैन में गड़कालिका मंदिर, हरसिद्धि मंदिर, मंगलनाथ मंदिर, श्री राम जानकी मंदिर, काल भैरव मंदिर, राम घाट, सांदीपनि आश्रम आदि जगहों पर ज़रूर जाएँ।

कब और कैसे पहुँचें

वैसे लोग सालभर यहाँ आते रहते हैं लेकिनअक्टूबर से मार्च तक सर्दियों के मौसम में यहाँ की यात्रा के लिए बेहतरीन समय है।  उज्जैन सड़क, रेल और हवाई मार्ग से जुड़ा हुआ है। इंदौर का महारानी अहिल्या बाई होल्कर एअरपोर्ट सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा है, जहाँ से महाकालेश्वर की दूरी 56 कि.मी. है। रेल से यात्रा करनी हो तो उज्जैन शहर में उज्जैन सिटी जंक्शन, विक्रम नगर और चिंतामन (मीटर गेज) तीन प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं, सड़क से इंदौर होते हुए आसानी से उज्जैन पहुँच सकते हैं।

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