ताड़केश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड

Tripoto
25th Jul 2020
Photo of ताड़केश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड by Rahul Saharavat
Day 1

देवभूमि उत्तराखंड की पावन भूमि पर ढेर सारे पावन मंदिर और स्थल हैं। उत्तराखंड को महादेव शिव की तपस्थली भी कहा जाता है। भगवान शिव इसी धरा पर निवास करते हैं। इसी जगह पर भगवान शिव का एक मंदिर बेहद ही खूबसूरत जगह पर मौजूद है और वह है ताड़केश्वर भगवान का मंदिर। मान्यता है कि इस मंदिर में मांगी गई हर मन्नत भगवान पूरी करते हैं। यहां हर साल लाखों श्रद्धालु न केवल देश से बल्कि विदेशों से भी आते हैं। इस मंदिर के पीछे एक बेहद रोचक कहानी छिपी है। आइए जानते हैं इस मंदिर की विशेषता के बारे में…
ताड़केश्वर महादेव मंदिर बलूत और देवदार के वनों से घिरा हुआ है जो देखने में बहुत मनोरम लगता है। यहां कई पानी के छोटे छोटे झरने भी बहते हैं। यह मंदिर सिद्ध पीठों में से एक है। यहां आप किसी भी दिन सुबह 8 बजे से 5 बजे तक दर्शन कर सकते हैं। लेकिन महाशिवरात्रि पर यहां का नजारा अद्भुत होता है। इस अवसर पर यहां विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।

मंदिर परिसर में एक कुंड भी है। मान्यता है है कि यह कुंड स्वयं माता लक्ष्मी ने खोदा था। इस कुंड के पवित्र जल का उपयोग शिवलिंग के जलाभिषेक के लिए होता है। जनश्रुति के अनुसार यहां पर सरसों का तेल और शाल के पत्तों का लाना वर्जित है। लेकिन इसकी वजह के बारे में लोग कुछ कह नहीं पाते।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, ताड़कासुर नामक राक्षस ने भगवान शिव से अमरता का वरदान प्राप्त करने के लिए इसी स्थान पर तपस्या की थी। शिवजी से वरदान पाकर ताड़कासुर अत्याचारी हो गया। परेशान होकर देवताओं और ऋषियों से भगवान शिव से प्रार्थन की और ताड़कासुर का अंत करने के लिए कहा।

ताड़कसुर का अंत केवल भगवान शिव और माता पार्वती का पुत्र कार्तिकेय कर सकते थे। भगवान शिव के आदेश पर कार्तिकेय ताड़कासुर से युद्ध करने पहुंच जाते हैं। अपना अंत नजदीक जानकर ताड़कासुर भगवान शिव से क्षमा मांगता है।

भोलेनाथ असुरराज ताड़कासुर को क्षमा कर देते हैं और वरदान देते हैं कि कलयुग में इस स्थान पर मेरी पूजा तुम्हारे नाम से होगी इसलिए असुरराज ताड़कासुर के नाम से यहां भगवान भोलेनाथ ताड़केश्वर कहलाते हैं। एक अन्य दंतकथा भी यहां प्रसिद्ध है। एक साधु यहां रहते थे जो आस-पास के पशु पक्षियों को सताने वाले को ताड़ते यानी दंड देते थे। इनके नाम से यह मंदिर ताड़केश्वर के नाम से जाना गया।

ताड़कासुर के वध के बाद भगवान शिव ने यहां पर विश्राम किया था। विश्राम के दौरान भगवान शिव पर सूर्य की तेज किरणें पड़ रही थीं। भगवान शिव पर छाया करने के लिए स्वयं माता पार्वती सात देवदार के वृक्षों का रूप धारण कर वहां प्रकट हुईं। इसलिए आज भी मंदिर के पास स्थित 7 देवदार के वृक्षों को देवी पार्वती का स्वरूप मानकर पूजा जाता है।

ये तो था ताड़केश्वर महादेव मंदिर के बारे में विस्तृत जानकारी हम यात्रा शुरू करते है । बेहद ही खूबसूरत जगह की जो वास्तव में प्रकृति की अनमोल धरोहर है।
हमारी यात्रा शुरू होती है सुबह के 5 बजे हमारे यहाँ से लगभग 160 km की दूरी हम 5 दोस्त और 3 बाइक के साथ शुरू होता है एक बेहद खूबसूरत सफर मानो ऐसा सफर जिसके बाद लगता है कि जैसे भोलेनाथ के चरणों मे बिताकर आये कुछ पल । शब्दो मे बयां न होने वाला सफर जिसकी अनुभूति स्वंय की यात्रा से ही सम्भव है। हम सभी दोस्त में (राहुल) नितिन, राजू,वरुण,और नितिन द्वितीय हम सभी ने अपनी बाइको से सफर शुरू किया अपने जरूरत के समान के साथ और निकल पड़े एक बेहद खूबसूरत सफर पर
हमने अपनी यात्रा को अपने कस्बे भोकरहेड़ी (मुज़फ्फरनगर)उत्तर प्रदेश से स्टार्ट किया और बिजनोर होते हुए नजीबाबाद से निकलकर हम पहुच गए कोटद्वार लगभग 125 km की दूरी हमने तय कि 4:30 घण्टे में उसके बाद हम पहुचे सिद्धबली मंदिर जो कि हनुमानजी का बहुत प्रशिद्ध मंदिर हैं मान्यता है कि जो यहाँ पर नारियल के साथ गुड़ का भोग लगाते है  उनकी सारी मनोकामना पूर्ण होती है। हमने घण्टो लाइन में लगकर ऊपर पहाड़ की चोटी पर स्थित मंदिर परिसर में सिद्धबली हनुमानजी के दर्शन किये। और उसके बाद मंदिर परिषर में साल के सभी दिन भण्डारा चलता रहता है। जहाँ पर हजारों लोग अन्न ग्रहण करते है। बरसात के मौसम में वहाँ का नजारा बड़ा ही दिल को सकून देने वाला होता है । उसके बाद हम पहुचे वापस कोटद्वार अपने रूम में जो कि हमने कोटद्वार में ही लिए थे जिनका किराया भी सस्ता ही था लगभग 1 रूम का किराया 500 रुपये हमने रात को एंजॉय किया और रात्रि विश्राम भी...... उसके बाद अगले दिन निकल पड़े बाबा भोलेनाथ ताड़केश्वर के दर्शन के लिए....

Day 2

यहाँ से लगभग 35 km पर स्थित है एक छोटा सा बहुत सुंदर हिल स्टेशन लैंसडाउन जो कि आर्मी केंट भी है। और बहुत सुंदर रास्ता जो पहुँचता है लैंसडाउन
वही से बीच मे से लगभग 20 km चलने के बाद वहाँ से ताड़केश्वर के लिए रास्ता जाता है और लगभग 25 km चलने के बाद हम पहुच जाते है बादलो को छूते हुए जिसे तुम सिर्फ कल्पनाओं में देख सकते हो । इसका आनन्द लेने के लिए तुम्हे पहुँचना होगा वही पर रास्ते बहुत खूबसूरत है।
रास्ते मे तुम्हे मिलेंगे बरसात के मौसम में बहुत से झरने जो कि आपको कोटद्वार से ताड़केश्वर तक हर 4-5km पर देखने को मिलेंगे जिन्हें देखकर आप रुककर उनका आनंद लेना चाहेंगे और चाहेंगे उन्हें अपने कैमरे में कैद करने अपनी पिक्चर के साथ जिन्हें आज की भाषा मे सेल्फी कहा जाता है। और इन्ही के साथ वादियों का मज़ा लेते हुए हम पहुच गए ताड़केश्वर मंदिर पर यहां पर ज्यादा कुछ खाने पीने को नही मिलता न ही यहाँ पर स्टे करने के लिए कोई व्यवस्था है । बस थोड़ी सी जगह है जहां पर 10-12 गाड़ियों की खड़ी करने की पार्किंग है और बस 1 दुकान जहाँ से आप प्रशाद ले सकते हो

वही पर हमने अपनी बाइकें पार्क की और भोले नाथ का जयकारा लगाकर चल दिये नीचे जंगल के बीच जो कि लगभग 1km की ट्रेकिंग है नीचे की और थोड़ा सँकरा रास्ता और कुछ सीढिया जो कि मंदिर परिषर पर जाती है वहाँ का मौसम इतना खुशनुमा था कि मानो स्वर्ग में उतर आये हो।वहां हमने लाइन में लगकर दर्शन किये उस पवित्र जगह के जहाँ जाने की सोचने मात्र से मन को शांति मिलती है। चारो तरफ पहाड़ियों के बीचों बीच बना मंदिर और आसमान को छूते पेड़ जो मन को शांति देते है । अगर आप मंदिर परिसर में रुकना चाहते है अर्थात रात्रि विश्राम करना चाहते है तो आपको वहाँ सिर्फ सर ढकने के लिए छत मिल सकती है गर्म कपड़े नही और अगर आप खाने की इच्छा रखते है तो आपको खाने के लिए सब्जी आटा साथ ले जाना पड़ेगा और उसी के साथ कुछ गर्म कपड़े हमारे पास उचित साधन नही थे तो इसलिए हमें शाम के समय वापस आना पड़ा लैंसडाउन जहाँ पर हमने 2 रूम लिए एक धर्मशाला में जो कि बहुत ही बढिया थी रूम साफ थे और सभी सुविधा के साथ हमने भोजन किया और रात्रि विश्राम करने की बाद अगले दिन सुबह हम निकल पड़े वापस अपने घर की तरफ और शाम तक आ पहुचे ।
मानो आप घूमने के शौकीन है और धर्मिक भी तो एक बार जरूर जाइये बाबा ताड़केश्वर के धाम ........

Day 3
Photo of ताड़केश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड by Rahul Saharavat
Photo of ताड़केश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड by Rahul Saharavat
Photo of ताड़केश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड by Rahul Saharavat
Photo of ताड़केश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड by Rahul Saharavat