ट्राम का सफर: ये गाड़ी आपको इतिहास से लेकर आज की दुनिया की सैर कराएगी!

Tripoto

कोलकाता शहर आज भी अपनी विरासत को सहजे हुए है। एक समय था जब विकास की पहली किरण इसी शहर में पहुँचा करती थी। अंग्रेजों ने हुगली तट पर बसे तीन गाँवों सुतानुटी, कलिकाता और गोविन्दपुर को अपना व्यापारिक ठिकाना बनाया जो बाद में कलकत्ता, अब कोलकाता जैसा विशाल और उन्नत शहर बन गया। पूर्वी भारत का प्रवेशद्वार कहा जाने वाला ये शहर ब्रिटिश इंडिया की राजधानी रहने के साथ-साथ पूरे देश का केंद्रबिंदु हुआ करता था। सांस्कृतिक चेतना से लेकर राजनीतिक चहलकदमी ने शहर को जहाँ समृद्ध किया तो वहीं विकास की धारा बह चली और भारत में कहीं कुछ बड़ा और विशेष हुआ तो सबसे पहले कोलकाता ही उसे महसूस किया करता था।

उन्हीं कुछ शुरुआती और युगांतकारी आविष्कार में ट्राम का नाम भी शुमार है। जब मैं पहली बार कोलकाता यात्रा पर आया तो सड़कों पर पटरियाँ दिखीं जिन पर पीली टैक्सी और बसें दौड़ रहीं थीं। मुझे कुछ अटपटा लगा कि आखिर ट्रेन की ट्रैक पर बसें क्यों दौड़ रहीं हैं। इतना असुरक्षित ट्रैक देखकर पहले तो आश्चर्य हुआ फिर लगा कि ज़रूर कुछ अजूबा है। मैं अपने गंतव्य तक जा ही रहा था तो ट्रैक से होकर ट्रामों को गुज़रते देखा जो एक रोमांचकारी अनुभव रहा।

इस विचित्र और विशेष गाड़ी के बारे में अधिक जानने की लालसा में मैंने इसकी खूब सवारी की और कई तथ्यों को जाना जिसे आपके साथ शेयर कर रहा हूँ।

ऐसे हुई ट्राम की शुरुआत

Photo of ट्राम का सफर: ये गाड़ी आपको इतिहास से लेकर आज की दुनिया की सैर कराएगी! 2/4 by Rupesh Kumar Jha
फोटो: फ्लिकर

कोलकाता भारत का अकेला ऐसा शहर है जहाँ ट्राम आज भी बड़े शान से सड़क पर चल रही है। 1873 के आसपास इस ट्राम में घोड़े लगे होते थे जो इन्हें खींचा करते थे। जानकारी हो कि 1902 में भारत में इलेक्ट्रिक ट्राम सड़कों पर दौड़ने लगीं।

कलकत्ता ट्रामवेज़ कम्पनी द्वारा इस ट्राम परिसेवा को संचालित किया जाता है। ये पूरे एशिया में सबसे पुरानी इलेक्ट्रिक ट्राम परिसेवा है जो आज भी शहर के लोगों को परिवहन सेवा दे रही है तो वहीं पर्यटकों को भी अपनी ओर आकर्षित करती है। इस शहर की पहचान और शान बन चुकी है ये ट्राम!

दो डिब्बे, दोनों अलग

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फोटो: फ्लिकर

अमूमन ट्राम दो डिब्बे वाले होते हैं जिनमें आगे के डब्बे को फर्स्ट क्लास और पीछे वाले डब्बे को सेकेंड क्लास कहा जाता है। ये आपको अंग्रेज जमाने में ले जाता है, जहाँ फर्स्ट क्लास में पंखा लगा होता है जबकि पीछे वाले सेकेंड क्लास डब्बे में पंखा नहीं लगा होता है। कहा जाता है कि फर्स्ट क्लास पहले केवल अंग्रेज यात्रियों के लिए होते थे। आज़ादी के बाद दोनों डब्बे सबके लिए खुल गए। हालांकि सुविधाओं को देखते हुए फर्स्ट क्लास का भाड़ा कुछ ज्यादा होता है।

ट्राम के दोनों डिब्बों में अलग-अलग कंडक्टर होते हैं। दोनों कंडक्टर और ड्राइवर खाकी वर्दी पहने दिखते हैं। ड्राइवर को सूचना प्रेषित करने के लिए कंडक्टर एक रस्सी से जुड़ा बेल का इस्तेमाल करते हैं। इसी से ट्राम रूकती-चलती है। यूँ तो जगह-जगह स्टॉप बनाएँ गए हैं लेकिन हाथ दिखाने मात्र से ये धीमी हो जाती है और आप आसानी से ट्राम पकड़ सकते हैं।

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फोटो: फ्लिकर

बता दें कि पर्यटकों के लिए एक डिब्बेवाली अत्याधुनिक एसी ट्राम भी शुरू की जा चुकी है। जिसके माध्यम से आप पूरे शहर का दौरा कर सकते हैं। देश-विदेश के पर्यटक इसमें सवार होकर कोलकाता शहर और उसकी विरासतों को देखते हैं।

इको फ्रेंडली और किफायती

कोलकाता ट्राम परिसेवा बिजली से संचालित होती है लिहाजा पर्यावरण के लिए भी ये नुकसानदेह नहीं है। साथ ही इसके मेंटिनेंस के खर्चे भी कोई ज्यादा नहीं हैं। हालांकि कई जगहों पर स्पीड के मामले में ये पिछड़ती नजर आती है। मेट्रो और अन्य स्पीड वाहन के आने से इसके परिचालन में चुनौतियाँ आने लगी है। गौर करने वाली बात ये है कि ट्राम पर्याप्त स्पीड में चलने वाली गाड़ी है लेकिन मुख्य सड़क से ओपन ट्रैक गुज़रने के कारण अन्य वाहन उसके ट्रैक पर जाम लगाए रहते हैं। लिहाजा ट्राम की सवारी बाधित होकर समय भी ज्यादा लेती है। नीचे दिए वीडियो को जरूर देखें जो ट्राम की गति को दिखाती है-

ट्राम में दुर्घटना के आसार भी बेहद कम होते हैं लेकिन कई कारणों से इस परिसेवा को बंद करने की सलाह भी दी जाती है। लेकिन शहर की संस्कृति में लम्बे समय से घुलमिल गई ये सवारी गाड़ी आज भी अस्तित्व को लेकर जद्दोजहद कर रही है। इसे बंद करने से बेहतर है, इसको और उन्नत करके आधुनिक बनाई जाए।

स्मरणिका - कोलकाता ट्राम म्यूजियम

ट्राम की सवारी अब एक धरोहर के रूप में कराई जा रही है। ट्राम पहले से बहुत कम हो गए हैं और इस हिसाब से इसके रूट में भी भारी कटौती कर दी गई है। ये एक घाटे में चलने वाली परियोजना बनकर रह गई है। जाहिर है इस पर जितना ध्यान देने की ज़रूरत है, नहीं दी जाती है। बहरहाल धर्मतल्ला में इसको लेकर म्यूजियम भी बना दिया गया है। ट्राम के इतिहास को जानने के लिए ये एक बेहतरीन जगह है।

दिलचस्प बात है कि साल 1938 में बनी एक पुरानी ट्राम को सजाकर म्यूज़ियम में तब्दील कर दिया गया है। इसमें ट्राम के 150 वर्षों के इतिहास को समेटकर लोगों के लिए रखा गया है। बता दें कि इस म्यूज़ियम की शुरुआत 19 सितम्बर 2014 को किया गया। ट्राम के पहले डिब्बे को कैफेटेरिया और दूसरे डब्बे को जानकारियों से भरा गया है। कोलकाता यात्रा पर आएँ तो इस म्यूज़ियम का दौरा ज़रूर करें।

चलते-चलते यूँ ही...

ट्राम भले ही अब अपने बेहतरीन दौर में नहीं है लेकिन आज भी इसको लेकर लोगों में आकर्षण बना हुआ है। पर्यटक तो इसे खासकर देखने आते ही हैं बल्कि यहाँ के लोग भी अपने दैनिक यात्राओं में इसका इस्तेमाल चाव से करते हैं। हाँ, कहीं अगर जल्दी पहुँचना हो और आप ट्राम में सवार हुए हैं तो फिर ट्रैफिक में अटके रह सकते हैं। हालांकि सरकार और ट्राम कम्पनी अपनी ओर से इसे दुरुस्त करने की कोशिश में दिख रही है।

लोग इस पर सोच रहे हैं कि आखिर बदली परिस्थिति में ट्राम को सड़कों पर बनाए रखने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है। इसी कड़ी में टूरिस्टों के लिए विशेष ट्राम के अलावे अत्याधुनिक ट्रामों को भी सड़कों पर उतरा गया है।

चलते-चलते बता दूँ कि अभी आने वाले कुछ साल ट्राम कोलकाता की सड़कों पर बने रह सकते हैं। इधर आने की प्लानिंग करें तो ट्राम के लिए अलग से समय निकालकर आएँ ताकि पिछले डेढ़ सौ सालों की इस विरासत को जान सकें, पहचान सकें।

आप ट्राम के विषय में अगर कुछ और जानकारी रखते हैं तो ज़रूर कमेन्ट कर बताएँ।

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